नई दिल्ली(ईएमएस)। केरल विधानसभा चुनाव के लिए बिगुल फूँकने के साथ ही कांग्रेस के भीतर उम्मीदवारी को लेकर जबरदस्त खींचतान शुरू हो गई है। 9 अप्रैल को होने वाले मतदान से पहले दिल्ली में कांग्रेस नेतृत्व के बीच भारी हलचल देखी गई। मल्लिकार्जुन खड़गे के आवास पर रात 10:30 बजे शुरू हुई केंद्रीय चुनाव समिति की बैठक तड़के 2:30 बजे तक चली। इस हाई-वोल्टेज ड्रामे की मुख्य वजह राहुल गांधी की नाराजगी थी, जिन्होंने केरल के उम्मीदवारों की शुरुआती सूची पर रोक लगाते हुए पूरी प्रक्रिया पर फिर से मंथन करने का निर्देश दिया। राहुल गांधी ने स्पष्ट कर दिया है कि अब टिकटों का बंटवारा महज सिफारिशों के आधार पर नहीं, बल्कि डेटा ड्रिवन पॉलिटिक्स के तहत होगा। उन्होंने मांग की कि हर सीट पर जातीय समीकरण, सर्वे रिपोर्ट और जमीनी फीडबैक को आधार बनाया जाए। इस कड़े रुख के कारण कई दिग्गजों के चुनावी अरमानों पर पानी फिर गया है। राहुल गांधी ने साफ निर्देश दिया है कि कोई भी मौजूदा लोकसभा सांसद विधानसभा चुनाव नहीं लड़ेगा। इस फैसले से के. सुधाकरन और शफी परम्बिल जैसे कद्दावर नेताओं को बड़ा झटका लगा है। नेतृत्व का तर्क है कि सांसदों के चुनाव लड़ने से अनावश्यक उपचुनाव का बोझ बढ़ता है और मुख्यमंत्री पद के चेहरे को लेकर भ्रम पैदा होता है। टिकट वितरण की इस खींचतान में गुटबाजी भी हावी नजर आई। चर्चा है कि सूची में के.सी. वेणुगोपाल गुट का दबदबा रहा है, जिन्हें करीब 60 प्रतिशत सीटें मिली हैं। वहीं, रमेश चेन्निथला और वी.डी. सतीशन के गुटों को भी प्रतिनिधित्व दिया गया है। कांग्रेस ने इस बार सोशल इंजीनियरिंग पर दांव लगाते हुए 92 में से 52 टिकट 50 साल से कम उम्र के युवाओं को दिए हैं। हालांकि, महिला प्रतिनिधित्व को लेकर पार्टी के भीतर ही बगावत के सुर तेज हो गए हैं। 92 उम्मीदवारों में केवल 9 महिलाओं को जगह मिलने पर प्रवक्ता शमा मोहम्मद ने सार्वजनिक रूप से नाराजगी जाहिर की है। सत्ता की वापसी की कोशिश में जुटी कांग्रेस के लिए अब इस अंदरूनी असंतोष और गुटबाजी से निपटना एक बड़ी चुनौती बन गया है। वीरेंद्र/ईएमएस/21मार्च2026