बैतूल (ईएमएस)। बैतूल जिले के ससुंद्रा चेकपोस्ट पर हुआ ताज़ा हंगामा अब एक दिलचस्प मोड़ ले चुका है, जहां सच और आरोप दोनों आमने-सामने खड़े होकर एक-दूसरे को देख रहे हैं। शुरुआत में मामला अवैध वसूली और मारपीट का बताया गया, लेकिन जांच ने कहानी का स्क्रिप्ट ही बदल दिया। अब सामने आया है कि जिस ट्रक ड्राइवर ने दो किलोमीटर लंबा जाम लगाकर सिस्टम को आईना दिखाने की कोशिश की, उसके अपने ही कागज़ ‘एक्सपायरी डेट’ पार कर चुके थे। नेशनल परमिट खत्म, पीयूसी खत्म, लेकिन आत्मविश्वास फुल! यही था उस ड्राइवर का फॉर्मूला, जो कार्रवाई से बचने के लिए हाईवे को ही पार्किंग बना बैठा। सवाल ये है कि जब कागज़ ही वैध नहीं थे, तो हंगामा किस बात का था, नियमों का या पकड़े जाने का? इधर परिवहन विभाग भी कम दिलचस्प नहीं है। उनका कहना है कि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ, लेकिन जनता का अनुभव कुछ और ही कहानी कहता है। क्योंकि मध्यप्रदेश के कई रूट्स पर ‘चेकिंग’ अब ‘कलेक्शन’ का पर्याय बन चुकी है। रीवा से लेकर हनुमना तक, चेकपोस्ट बंद कागज़ों में हैं और खुले मैदान में चालू। ड्राइवरों का दर्द भी कम नहीं है। उनका कहना है कि वर्दी में कम और ‘सेटिंग’ में ज्यादा लोग मिलते हैं। नियमों की किताब कम, रेट कार्ड ज्यादा चलता है। विरोध करो तो पिटाई, चुप रहो तो कटाई। ऐसे में जब कोई ड्राइवर हिम्मत दिखाता है, तो उसका अतीत भी खंगाल लिया जाता है। मजेदार बात ये है कि दोनों पक्ष खुद को सही बता रहे हैं। विभाग कहता है “ड्राइवर गलत था”, और ड्राइवर समुदाय कहता है “सिस्टम ही गलत है।” सच शायद दोनों के बीच कहीं ट्रैफिक में फंसा हुआ है। इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर वही पुराना सवाल खड़ा कर दिया है, क्या सड़क पर चलने वाले वाहन ही चेक होते हैं या सिस्टम की भी कभी जांच होगी? फिलहाल तो हालात यही हैं कि कागज़ भी फेल हो रहे हैं, आरोप भी फेल हो रहे हैं, लेकिन सिस्टम हर बार पास हो जाता है।