लेख
22-Mar-2026
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वर्ष 1937, पूर्वोत्तर तिब्बत का एक छोटा सा खेत। जौ, आलू और मुर्गियों के बीच नन्हा ल्हामो थोंडुप मुस्कुरा रहा था। गरीबी और कठिनाइयों के बीच भी उसका चेहरा जीवन और खुशी से दमक रहा था। यह वह क्षण था जब एक बच्चे की मासूम मुस्कान में छुपी थी भविष्य की करुणा, साहस और मानवता की अद्वितीय शक्ति। कुछ महीनों से एक खोज दल उस घर की निगरानी कर रहा था। दिव्य संकेतों और विभिन्न आध्यात्मिक प्रमाणों के आधार पर यह पाया गया कि यही बच्चा चौदहवें दलाई लामा होंगे। जब उन्हें पुराने दलाई लामा की वस्तुएँ दी गईं, तो उन्होंने सरल भाव से कहा, “ये मेरे हैं, ये मेरे हैं।” उस छोटे-से बच्चे की सरलता और सच्चाई ने पहले ही संकेत दे दिए थे कि वह आने वाले वर्षों में न केवल तिब्बत के लिए, बल्कि पूरी मानवता के लिए करुणा और शांति का प्रतीक बनेंगे। नन्हे ल्हामो थोंडुप को करुणा के बोधिसत्व अवलोकितेश्वर (तिब्बती में चेनरेज़िग) का अवतार माना गया। बौद्ध मान्यता के अनुसार, वे अवलोकितेश्वर के मानवीय रूप हैं, जो मानवता की सेवा के लिए बार-बार पुनर्जन्म लेते हैं। खोज के महज चंद दिनों बाद ल्हामो थोंडुप को मठ भेज दिया गया। वहाँ के पर्वत, घाटियाँ, जंगली याक, गधे और हिरण उन्हें मंत्रमुग्ध कर गए। यह वही धरती थी, जिस पर वे आने वाले वर्षों में आध्यात्मिक और लौकिक नेतृत्व करेंगे। 1940 में उन्हे 13वें दलाई लामा के अवतार के रूप में मान्यता मिली। उनका औपचारिक राज्याभिषेक हुआ और उन्हे आध्यात्मिक नाम तेनज़िन ग्यात्सो मिला।उन्होंने करुणा, ज्ञान और प्रज्ञापारमिता पर आधारित गहन बौद्ध शिक्षा ग्रहण की। नववयस्क होते ही, 15 वर्ष की उम्र में, नवंबर 1950 में, ल्हामो थोंडुप आधिकारिक रूप से छह मिलियन तिब्बतियों के लौकिक और आध्यात्मिक नेता के रूप में सिंहासन पर आसीन हुए। यह वह समय था जब तिब्बत अपने सीमाओं पर चीनी आक्रमण का सामना कर रहा था। तिब्बत की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने संयुक्त राज्य अमेरिका, ग्रेट ब्रिटेन और नेपाल में मिशन भेजे। लेकिन वैश्विक स्तर पर कोई भी प्रयास तिब्बत को बचाने में सफल नहीं हो सका। अकेले तिब्बत को कम्युनिस्ट चीन की पूरी ताकत का सामना करना पड़ा। 1950 में चीन ने तिब्बत पर आक्रमण किया और पीपुल्स लिबरेशन आर्मी (PLA) की सैन्य कार्रवाई के माध्यम से तिब्बत पर अपना नियंत्रण स्थापित किया। चामदो की निर्णायक लड़ाई में PLA की जीत ने तिब्बत के नेताओं को 1951 में बंदूक की नोक पर सत्रह सूत्री समझौते पर हस्ताक्षर करने के लिए मजबूर किया गया। इस समझौते ने तिब्बत को औपचारिक रूप से चीन का हिस्सा घोषित कर दिया और दलाई लामा के ऐतिहासिक शासन को समाप्त कर दिया। 1954 में दलाई लामा ने चीन में एक वर्ष बिताया, और इसके बाद 1956 में भारत में पांच महीने अतिथि के रूप में रहे। इन यात्राओं ने उन्हें वैश्विक दृष्टिकोण और नेतृत्व की व्यापक समझ दी। उन्होंने राजनीतिक, सामाजिक और प्रशासनिक कार्यप्रणालियों का अध्ययन किया, और इससे उनके दृष्टिकोण में गंभीर बदलाव आया। 1959 में, जब 14वें दलाई लामा को एक चीनी जनरल ने छलपूर्वक नृत्य मंडली के प्रदर्शन में आमंत्रित किया, तिब्बती जनता ने उनके आवास को घेरकर उन्हें अपहरण से बचाने का प्रयास किया। भविष्यवाणी और साहस के सहारे, महज 23 वर्ष की उम्र में, उन्होंने सैनिक वेश धारण करके चुपके से भारत की सीमा पार की। तत्कालीन भारत सरकार ने उन्हें और तिब्बती शरणार्थियों को आश्रय प्रदान किया। इस निर्णय ने तिब्बत के अस्तित्व और उनके संघर्ष के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका नेतृत्व केवल तिब्बतियों के लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के लिए प्रेरणा बन गया। भारत आने के बाद उनके कंधों पर लगभग एक लाख शरणार्थियों की जिम्मेदारी थी। उन्होंने स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक विकास के लिए कई संस्थानों की स्थापना की और तिब्बती बौद्ध धर्म की परंपराओं को संरक्षित एवं पुनर्जीवित किया। 1959 में भारत आने के बाद ही उन्होंने तिब्बती शासन प्रणाली में गहन बदलाव लाने का कार्य शुरू किया। उनकी उपस्थिति और करुणामय दृष्टिकोण प्रवासी तिब्बतियों के लिए शक्ति और सांत्वना का स्रोत बने। उन्होंने तिब्बत की स्वायत्तता और स्वतंत्रता के बीच संतुलन स्थापित किया। परम पावन न केवल मानवता और धर्म के लिए समर्पित हैं, बल्कि पृथ्वी और प्रकृति के संरक्षण के प्रति भी। उन्होंने तिब्बती पठार को एशियाई नदियों का स्रोत बताते हुए इसे शांति और संरक्षण का क्षेत्र बनाने का आह्वान किया। दलाई लामा को 1989 में नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दलाई लामा का योगदान केवल आध्यात्मिक नेतृत्व तक सीमित नहीं है। उन्होंने तिब्बती राजनीतिक और प्रशासनिक व्यवस्था में बड़े लोकतांत्रिक सुधार लागू किए। सबसे महत्वपूर्ण पहल यह रही कि उन्होंने अपनी राजनीतिक शक्ति का त्याग कर उसे अपने लोगों के बीच लोकतांत्रिक प्रक्रिया के माध्यम से वितरित किया। यह कदम विशेष रूप से उल्लेखनीय है क्योंकि यह तब हुआ जब तिब्बत चीन के कब्जे में था। निर्वासन में रहते हुए उन्होंने तिब्बती समुदाय के लिए चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राजनीतिक नेतृत्व चुनने की व्यवस्था की, जिससे निर्वासित तिब्बतियों में लोकतांत्रिक भावना को बल मिला। आज तिब्बती समुदाय में चुनावी प्रक्रिया चल रही है। वर्तमान कैबिनेट का पांच साल का कार्यकाल इस मई में समाप्त हो रहा है, और सिक्योंग पेनपा त्सेरिंग को लोगों ने 60% से अधिक वोटों के साथ निर्विरोध चुना है। भारत में दलाई लामा सुरक्षित हैं। उन्होंने अपने जीवन का अधिकांश समय भारत में बिताया। वे गर्व के साथ स्वयं को “भारत का पुत्र” कहते हैं और भारत को अपनी कर्मभूमि मानते हैं। उनका जीवन केवल आध्यात्मिक नेतृत्व का प्रतीक नहीं, बल्कि लोकतंत्र, त्याग, करुणा और भारत के प्रति प्रेम का जीवंत उदाहरण भी है। उन्हें केवल आध्यात्मिक गुरु के रूप में नहीं बल्कि करुणा के प्रतीक और भगवान बुद्ध के अवतार के रूप में पूजा जाता है। वर्तमान में तेनज़िन ग्यात्सो (14वें दलाई लामा) के रूप में प्रतिष्ठित हैं और मैकलोडगंज (हिमाचल प्रदेश) में निवास कर रहे हैं। गत सप्ताह 11 मार्च 2026 को, तेनशुक 2026 के अंतर्गत मैकलोडगंज के थे-कचेन चोएलिंग मंदिर में उनकी लंबी आयु के लिए प्रार्थना आयोजित की गई जिसमें हज़ारों बौद्ध भिक्षु, भिक्षुणियाँ और अनुयायी शामिल हुए। इस अवसर पर देश-विदेश से आए हजारों अनुयायियों और 24 तिब्बत सहायता समूहों ने हिंदी और तिब्बती भाषा में प्रार्थनाएँ कीं। अखिल भारत रचनात्मक समाज और भारत तिब्बत मैत्री संघ (महिला शाखा) की सक्रिय सदस्य होने के नाते मुझे भी इस आयोजन में सम्मलित होने का अवसर मिला। कार्यक्रम की शुरुआत अरुणाचल प्रदेश के रूपा और कलाकटांग के साधकों द्वारा चोड़ प्रथा से हुई, जिसमें दलाई लामा के दीर्घायु की प्रार्थना की गई। नामग्याल मठ के भिक्षुओं ने मंत्रों का पाठ किया और कोर ग्रुप के वरिष्ठ सदस्यों ने बुद्ध के शरीर, वाणी और मन का मंडल प्रस्तुत किया। कार्यक्रम में कोर ग्रुप फॉर तिब्बतन कॉज़—इंडिया के प्रतिनिधियों ने उन्हें उनके निवास के गेट पर स्वागत किया, तत्पश्चात वे मंदिर प्रांगण में सिंहासन पर बैठे। दलाई लामा के दो गुरुजनों द्वारा रचित प्रार्थना दीर्घायु का गीत हिंदी और तिब्बती में पढ़ी गई। कार्यक्रम में तिब्बती और भारतीय झंडे उनके सम्मुख रखे गए, तथा कोर ग्रुप के कार्यकारी सदस्यों ने उन्हें काता (रेशमी शॉल) भेंट की। तत्पश्चात कोर ग्रुप के राष्ट्रीय संयोजक रिनचिन खांडू ख्रिमे ने सभा को संबोधित किया और दलाई लामा के जीवन से प्रेरणा लेने की बात कही। समारोह में उन्हें करुणा रत्न भेंट किया गया, जिसमें सुनहरे बोधि पत्ते पर धर्मचक्र और शिक्षण मुद्रा में हाथ अंकित था। अरुणाचल प्रदेश की महिलाओं ने राज्य की प्रमुख छह जनजातियों के लोक परंपराओं और पोशाकों के साथ नृत्य और गायन प्रस्तुत किया। उसके बाद तमिलनाडु के कलाकारों ने देवी काली को समर्पित शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुत किया। 400 से अधिक तिब्बत समर्थक समूहों के सदस्य कार्यक्रम में सम्मिलित हुए और सभी ने दलाई लामा के समक्ष अपना सम्मान व्यक्त किया और आशीर्वाद ग्रहण किया। कार्यक्रम के समापन पर दलाई लामा अपने निवास लौट गए, और उपस्थित सभी को मुस्कुराते और हाथ हिलाते हुए अभिवादन किया। आयोजन समाप्ति के पश्चात कोर ग्रुप-इंडिया के संयोजक आर.के. खिर्मे ने मीडिया को संबोधित करते हुए बताया कि तिब्बत समर्थक समूह तिब्बत के लिए संघर्ष का समर्थन करते हैं, और उन्होंने कहा कि इस आयोजन का उद्देश्य इसके पक्ष में जनमत को जुटाना है। बौद्ध धर्म के शिक्षक लामा सोनम वांगडी ने कहा कि दलाई लामा की आध्यात्मिकता और मानवता की शिक्षाएं वर्तमान समय में बहुत महत्वपूर्ण हैं जब दुनिया भर में युद्ध, संघर्ष और वर्चस्व की लड़ाई चल रही है। तिब्बत मुक्ति आंदोलन का उद्देश्य चीन की दमनकारी नीतियों के बावजूद तिब्बत की संस्कृति, भाषा और धार्मिक स्वतंत्रता को बनाए रखना है। इस आंदोलन में दुनिया भर के तिब्बत समर्थक संगठन और व्यक्तियों ने सहयोग किया है। दलाई लामा हमेशा अहिंसात्मक विरोध और संवाद के माध्यम से संघर्ष की वकालत करते रहे हैं। आज भी, दलाई लामा न केवल तिब्बतियों के लिए बल्कि पूरी मानवता के लिए शांति, करुणा और सहिष्णुता का संदेश फैलाते हैं। उनका जीवन और उनका आंदोलन हमें यह सिखाता है कि कठिनाइयों और अन्याय के सामने भी धैर्य, साहस और अहिंसा के मार्ग पर चलकर बदलाव लाया जा सकता है। यकीनन निर्वासन कभी आसान नहीं होता साथियों।अपने घर, अपने शहर और अपने देश को छोड़कर एक अनजानी भूमि में आना अत्यंत साहस और बलिदान मांगता है। हर कदम खतरे से भरा होता है, हर मोड़ अनिश्चितता से। फिर भी तिब्बती लोग चीनी कैद से बचकर भारत में स्वतंत्र जीवन पाने के लिए अपने प्राणों की परवाह किए बिना यात्रा करते है। दुनिया भर में रह रहे तिब्बती शरणार्थी परम पावन दलाई लामा जी के नेतृत्व में अपने देश की स्वतंत्रता और गरिमा के लिए तिब्बती मुक्ति आंदोलन चला रहे हैं। निसंदेह दलाई लामा तिब्बती संस्कृति, धर्म और राष्ट्रीय पहचान का अवतार हैं। जब तक दलाई लामा सुरक्षित हैं, तिब्बत सुरक्षित है। हालांकि दलाई लामा की दीर्घायु और उनके पुनर्जन्म के भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। चीन का कहना है कि कि दलाई लामा के पुनर्जन्म का निर्णय चीन के कानूनों का पालन करके किया जाना चाहिए। उसके पास रखे सोने के कलश से ही अगले दलाई लामा का नाम निकलेगा और अगला दलाई लामा चीन की सीमा के अंदर ही पैदा होगा। दरअसल इतिहास में दलाई लामा चुने जाने के कई तरीके अपनाए गए हैं जिसमे एक तरीका है स्वर्ण कलश से निकाला गया एक नाम। वह कलश आज चीन के कब्जे में है और उसका दुरुपयोग करने की साजिश की जा रही है। 14वें दलाई लामा 90 वर्ष की आयु पर कर चुके है। वह 600 वर्षों के इतिहास में सबसे लंबे समय तक जीवित रहने वाले दलाई लामा हैं,जो निर्वासन में होने के बावजूद बेहद सक्रिय और स्वस्थ हैं। परम पावन 14वें दलाई लामा ने अपने पुनर्जन्म को लेकर स्पष्ट किया है उनका पुनर्जन्म तिब्बती समुदाय के निर्णय पर निर्भर है। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि मेरा जन्म एक स्वतंत्र दुनिया में होगा। ईएमएस/22/03/2026