युद्ध अमेरिका इजरायल और ईरान के बीच में चल रहा है। लेकिन इसका बड़ा असर भारत पर पडना शुरू हो गया है। आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार भारत को 15 से 20 लाख करोड रुपए का फटका लगना तय है। भारत सरकार अपनी अर्थव्यवस्था को कैसे संभालेगी, इसको लेकर राजनीतिक और आर्थिक स्तर पर चिंता बढ़ रही है। सारी दुनिया में कच्चे तेल के दाम बड़ी तेजी के साथ बढ़ाना शुरू हो गए हैं। युद्ध शुरू होने के पहले 65 डॉलर प्रति बैरल कच्चे तेल के दाम थे, जो अब बढ़कर 100 से 120 डॉलर प्रति बैरल हो गए हैं। इसी तरह डॉलर के मुकाबले जो रुपया 91 और 92 के बीच में झूल रहा था, वह 93 पार कर गया है। जल्द ही 100 के स्तर छूने की बात हो रही है। भारत लगभग 85 फ़ीसदी तेल और गैस आयात करता है। कच्चा तेल और गैस महंगी होने का असर डालर और परिवहन लागत के कारण भारत में अन्य देशों की तुलना में ज्यादा होगा। तेल की कीमत बढ़ने और डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरने से लगभग 60000 करोड रुपए का अतिरिक्त फटका भारत को लगने जा रहा है। जब भी कच्चे तेल के दाम बढ़ते हैं, डॉलर के मुकाबले रुपया गिरता है। ऐसी स्थिति में इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स, मशीनरी, दवाइयां, केमिकल और खाद के दाम बढ़ते हैं। सरकार को महंगी दर पर खाद का आयात करना पड़ता है। सब्सिडी और कीमतें बढ़ने के कारण देश में सभी चीजें महंगी होंगी। महंगाई बढ़ने के कारण 4 से 5 लाख करोड रुपए का सरकारी खर्च बढ़ना तय है। भारत में इस युद्ध का असर सबसे ज्यादा होने जा रहा है। भारत का निर्यात कारोबार डॉलर के रेट बढ़ने से प्रभावित होगा। भारत से दुनिया के अन्य देशों में चॉवल, मसाले, टेक्सटाइल, मांस, फल, सब्जियां और समुद्री उत्पाद का निर्यात घट सकता है। यदि निर्यात में 2 से 5 फ़ीसदी की कमी आती है। ऐसी स्थिति में कम से कम 90 हजार करोड़ और अधिकतम 2 लाख करोड रुपए का नुकसान भारतीय अर्थव्यवस्था में होने का अनुमान है। भारत में महंगाई बढ़ने के बाद आम लोगों की क्रय क्षमता कम होगी, ट्रांसपोर्ट महंगा होने के कारण हर वस्तु के दाम बढ़ेंगे, इसका असर जीडीपी में पड़ना तय है। आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है, जीडीपी में 0.5 से लेकर 2 फ़ीसदी तक की गिरावट आ सकती है। जो भारत के लिए बहुत बड़ा झटका साबित होगा। जीडीपी में गिरावट होने से एक लाख करोड़ से लेकर 4 लाख करोड रुपए का नुकसान होने की बात आर्थिक विशेषज्ञ करने लगे हैं। आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है, जिस तरीके से डायरेक्ट और इनडायरेक्ट तरीके से ईरान, अमेरिका-इजरायल युद्ध का असर भारत पर पड़ रहा है। उसको देखते हुए भारत की अर्थव्यवस्था में 15 से 20 लाख करोड रुपए से अधिक का आर्थिक दबाव पडना तय है। इस युद्ध ने सारी दुनिया के देशों को हिला कर रख दिया है। यह युद्ध, तेल और ऊर्जा संकट के रूप में सारी दुनिया के देशों को प्रभावित कर रहा है। भारत को सबसे ज्यादा युद्ध इसलिए प्रभावित कर रहा है। भारत ने रूस और ईरान से तेल और प्राकृतिक गैस लेना कम कर दी थी। अमेरिका के दबाव में 2019 से ईरान को छोड़ दिया था। 2025 में रूस से भी तेल लेना कम कर दिया था। भारत अभी जो तेल और प्राकृतिक गैस आयात कर रहा है। उसमें 100 फ़ीसदी भुगतान भारत को डॉलर मुद्रा में करना पड़ रहा है। जब ईरान से तेल और प्राकृतिक गैस आयात होती थी। तब भारतीय रुपए में भुगतान होता था। ईरान बदले में खाने-पीने और अन्य जरूरी सामान भारत से रुपये में भुगतान करके खरीदता था। अब स्थिति पूरी तरह से बदली हुई है। अमेरिका और इजरायल की दबाव में भारत के ईरान से व्यापारिक संबंध नहीं रहे। भारत जो तेल और गैस आयात कर रहा है। उसमें दो से तीन महीने का समय लग रहा है। परिवहन और बीमा के रूप में 4 गुना ज्यादा पैसा खर्च करना पड़ रहा है। पूंजी भी भारत को ज्यादा लगानी पड़ रही है। इन परिस्थितियों को देखते हुए आर्थिक विशेषज्ञों का कहना है। भारत के ऊपर इस युद्ध का अप्रत्यक्ष रूप से बड़ा आर्थिक प्रभाव पड़ रहा है। भारत सरकार को इस चुनौती से निपटने के लिए बड़ी गंभीरता के साथ विचार करना होगा। सरकार को वैकल्पिक ऊर्जा स्रोत, कम कीमत पर कच्चे तेल-गैस इत्यादि का आयात के खर्च पर नियंत्रण तथा आर्थिक स्थिति में समन्वय बनाने एक नई लड़ाई लड़ने की जरूरत पड़ेगी। महंगाई बढ़ने के बाद बेरोजगारी बढ़ेगी इससे आम जनता को परेशानी होगी। इसका असर कानून व्यवस्था की स्थिति में होना तय है। जो स्थिति भारत में 1975 में देखने को मिल रही थी, वही स्थिति अब 2026 में देखने को मिल रही है। महंगाई और बेरोजगारी से जनता में नाराजी बढ़ रही है। आने वाले समय में आर्थिक चुनौती और भी बढ़ेगी ऐसी स्थिति में सरकार को सजग रहने की जरूरत है। ईएमएस/22/03/2026