- डिजिटल दुनिया रफ्तार पर लग सकती ब्रेक, हैईरान, होर्मुज और इंटरनेट की अदृश्य जंग के मड़राते काले बादल विश्व व्यवस्था के बदलते परिदृश्य में अब शक्ति की परिभाषा केवल सैन्य क्षमता या आर्थिक पहलु तक सीमित नहीं रह गई है,बल्कि यह धीरे-धीरे डिजिटल ढाँचे और डेटा नियंत्रण तक फैलती जा रही है। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के मध्य एक नई आशंका ने वैश्विक मंच पर विचार - विमर्श को जन्म दिया है - क्या ईरान ऐसी स्थिति उत्पन्न कर सकता है,जिससे विश्व की इंटरनेट व्यवस्था प्रभावित हो जाए? यह प्रश्न केवल एक सनसनीखेज संभावना नहीं,बल्कि उस जटिल वैश्विक ताने-बाने का अंहम हिस्सा है,जिसमें मानव समुदाय का आधुनिक जीवन पूरी तरह उलझा हुआ है। विगत दिनों में होर्मुज जलडमरू मध्य को विश्व ऊर्जा आपूर्ति के सबसे संवेदनशील मार्ग के रूप में देखा जाता रहा है,जहाँ से होकर वैश्विक तेल व्यापार का एक बड़ा हिस्सा गुजरता है। वैश्विक राजनीतिक जानकारों का कहना है कि बदलते समय के साथ यह क्षेत्र केवल ऊर्जा का मार्ग नहीं रहा, बल्कि यह डिजिटल दुनिया की एक महत्वपूर्ण धुरी बन चुका है। समुद्र की गहराइयों में बिछी फाइबर- ऑप्टिक केबल्स,जो आँखों से ओझल रहती हैं,वास्तव में वैश्विक इंटरनेट की जीवनरेखा हैं। इन्हीं के माध्यम से दुनिया के अलग-अलग हिस्सों के बीच डेटा का निरंतर प्रवाह बना रहता है। लाल सागर और होर्मुज जैसे क्षेत्र इस दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण हैं,क्योंकि यहाँ से गुजरने वाली केबल्स यूरोप,एशिया और अफ्रीका को जोड़ती हैं। इन केबल्स के जरिए ही वीडियो कॉल, ईमेल,बैंकिंग लेन-देन, शेयर बाजार की गतिविधियाँ और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवाएं संचालित होती हैं। यह पूरी व्यवस्था इतनी सहज लगती है कि सामान्यतः हम इसकी जटिलता और संवेदनशीलता को समझ ही नहीं पाते। इंटरनेट को लेकर यह धारणा कि इसे एक झटके में बंद किया जा सकता है,तकनीकी रूप से पूरी तरह सही नहीं है। वैश्विक इंटरनेट एक विकेंद्रीकृत प्रणाली है, जिसमें सैकड़ों केबल्स और हजारों सर्वर जुड़े हुए हैं। इसलिए किसी एक देश के लिए पूरी दुनिया का इंटरनेट ठप कर देना संभव नहीं है। फिर भी, यह भी उतना ही सच है कि यदि किसी महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग पर स्थित केबल्स को नुकसान पहुंचता है,तो इसका असर व्यापक स्तर पर दिखाई दे सकता है। इंटरनेट पूरी तरह बंद न भी हो,तो उसकी गति धीमी हो सकती है,सेवाओं में बाधा आ सकती है और वैश्विक संचार व्यवस्था अस्थिर हो सकती है। भारत जैसे विकासशील देश,जो तेजी से डिजिटल अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं,इस प्रकार के किसी भी व्यवधान से सीधे प्रभावित हो सकते हैं। आज बैंकिंग,शिक्षा,स्वास्थ्य,व्यापार और सरकारी सेवाओं का बड़ा हिस्सा इंटरनेट पर निर्भर हो चुका है। यदि डेटा के प्रवाह में किसी प्रकार की बाधा आती है,तो इसका असर केवल तकनीकी नहीं,बल्कि सामाजिक और आर्थिक भी होगा। आम नागरिक को इसका अनुभव इंटरनेट की धीमी गति,ऑनलाइन सेवाओं में देरी और डिजिटल लेन-देन में असुविधा के रूप में होगा,जबकि बड़े स्तर पर यह आर्थिक गतिविधियों को भी प्रभावित कर सकता है। इस पूरे परिदृश्य में वैश्विक टेक कंपनियों की भूमिका भी महत्वपूर्ण हो जाती है। एमजॉन,माईको साफ्ट और गुगल जैसी कंपनियों ने पश्चिम एशिया के विभिन्न देशों में बड़े डेटा सेंटर स्थापित किए हैं,जो वैश्विक नेटवर्क का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इन केंद्रों के माध्यम से डेटा का आदान-प्रदान होता है और विभिन्न महाद्वीपों के बीच डिजिटल संपर्क बना रहता है। यदि समुद्री केबल्स प्रभावित होती हैं,तो इन कंपनियों की सेवाओं पर भी असर पड़ सकता है,जिसका प्रभाव दुनिया भर के उपयोगकर्ताओं तक पहुंचेगा। आज की भू-राजनीति में यह स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है कि डेटा और कनेक्टिविटी भी एक प्रकार की शक्ति बन चुके हैं। जिस प्रकार ऊर्जा आपूर्ति को नियंत्रित करके वैश्विक स्तर पर प्रभाव डाला जाता है,उसी प्रकार डेटा प्रवाह को प्रभावित करके भी दबाव बनाया जा सकता है। होर्मुज और लाल सागर जैसे क्षेत्र अब केवल भौगोलिक महत्व के नहीं रहे, बल्कि वे रणनीतिक दृष्टि से ‘डिजिटल चोक-पॉइंट’ बनते जा रहे हैं,जहाँ किसी भी प्रकार की अस्थिरता का असर दूर-दूर तक महसूस किया जा सकता है। हालांकि इस संभावित खतरे को देखते हुए दुनिया पूरी तरह असहाय नहीं है। वैकल्पिक समुद्री मार्गों का विकास,सैटेलाइट आधारित इंटरनेट सेवाओं का विस्तार और डेटा नेटवर्क को अधिक लचीला बनाने के प्रयास लगातार किए जा रहे हैं। वही वर्तमान के वैश्विक ढांचा अभी भी इन प्रमुख मार्गों पर काफी हद तक निर्भर है। संक्षेप का सार यह है कि “ईरान पूरी दुनिया का इंटरनेट बंद कर देगा” जैसी बातें भले ही अतिशयोक्ति हों,लेकिन इनके पीछे छिपी चेतावनी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। यह हमें यह समझने का अवसर देती है कि आधुनिक दुनिया कितनी गहराई से आपस में जुड़ी हुई है और किस प्रकार एक क्षेत्र की अस्थिरता का प्रभाव वैश्विक स्तर पर पड़ सकता है। आज आवश्यकता है एक संतुलित और दूरदर्शी दृष्टिकोण की, जिसमें तकनीकी समझ, कूटनीतिक संतुलन और राष्ट्रीय हितों का समन्वय हो। आने वाले समय में शक्ति का स्वरूप और भी बदलने वाला है,उस समय वही देश आगे होंगे,जो न केवल अपनी सीमाओं की रक्षा करेंगे,बल्कि अपनी डिजिटल संरचना को भी सुरक्षित और मजबूत बनाए रखेंगे। वैश्विक राजनीतिक के मामले पर पैनी नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि अगर ईरान - इसाईल-अमेरिका के युद्ध विराम नही होता तो डिजिटल दुनिया रफ्तार पर लग सकती है। ब्रेक,हैईरान,होर्मुज और इंटरनेट की अदृश्य जंग के मड़राते काले बादल ना केवल भारत जैसे विकासशील देश बल्कि सम्पूर्ण विश्व को प्रभावित कर सकती है। ईएमएस / 22 मार्च 26