व्यापार
22-Mar-2026


विदेशी निवेशकों ने मार्च में अब तक निकाल लिए 88000 करोड़ नई दिल्ली(ईएमएस)। मिडिल ईस्ट में युद्ध और इससे तेल की कीमतों में लगी आग ने दुनिया के तमाम देशों को झुलसा दिया है। जैसे-जैसे जंग आगे बढ़ रही हैं, तेल संकट भी गहराता जा रहा है, जिससे ग्लोबल टेंशन चरम पर है। शुरुआत में जहां अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच सीनियर लीडर्स और सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया जा रहा था, तो अब ये युद्ध एक तेल युद्ध में बदल चुका है और मिसाइलों के निशाने पर एनर्जी साइट्स हैं। ईरान युद्ध ने जहां भारत समेत दुनियाभर के शेयर बाजारों को हिलाया, तो वहीं विदेशी निवेशकों के सेंटीमेंट पर भी इसका बेहद बुरा असर हुआ है। विदेशी निवेशकों का मूड ऐसा खराब हुआ कि इस महीने अब तक उन्होंने तगड़ी बिकवाली करते हुए भारतीय शेयर बाजारों से 88,000 करोड़ रुपये से ज्यादा निकाले हैं। अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच बढ़ता युद्ध, कच्चे तेल की कीमतों में ताबड़तोड़ तेजी और इस बीच भारतीय करेंसी रुपये में गिरावट ने विदेशी निवेशकों के सेंटीमेंट खराब कर दिया। बीते महीने के आखिर में यानी 28 फरवरी को शुरू हुए मिडिल ईस्ट युद्ध से मार्च महीने में अब तक एफपीआई ने जमकर बिकवाली की है। पहले पखवाड़े में ही इनके द्वारा 52,704 करोड़ रुपये (लगभग 5.73 अरब डॉलर) की निकासी की गई थी, जो बीते हफ्ते और भी बढ़ गई। मार्च में अब तक एफपीआई ने 88,180 करोड़ रुपये (9.6 अरब डॉलर) निकाले हैं। युद्ध की टेंशन और इसके दुनिया के तमाम देशों में दिख रहे असर के चलते मार्च महीने में लगभग हर दिन विदेशी निवेशक सेलर बने हुए नजर आए हैं। महीने के तीन सप्ताह में ही निकासी का आंकड़ा 88,180 करोड़ रुपये पर पहुंच गया है। इससे पहले फरवरी महीने में ही विदेशी निवेशकों की वापसी हुई थी। मार्च की इस बिकवाली के चलते 2026 में अब तक एफपीआई निकासी का आंकड़ा 1 लाख करोड़ रुपये के पार हो गया है। तीन महीने बाद लौटे थे विदेशी निवेशक बता दें कि इससे पिछले फरवरी महीने में ही भारतीय शेयर बाजारों में विदेशी निवेशक की वापसी हुई थी और ये तीन महीने बाद देखने को मिली थी। आंकड़े देखें, तो नवंबर 2025 में विदेशी निवेशकों ने 3,765 करोड़ रुपये, दिसंबर 2025 में 22,611 करोड़ रुपये और जनवरी 2026 में 35,962 करोड़ रुपये निकाले थे। इसके बाद फरवरी महीने में 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया था, जो बीते 17 महीनों में सर्वाधिक निवेश था। विदेशी निवेशकों की बेरुखी के पीछे के कारणों की बात करें, तो एक नहीं कई हैं। मिडिल ईस्ट में जंग के बाद से क्रूड की कीमतों में तेज उछाल आया है। ये 28 फरवरी से पहले 70 डॉलर प्रति बैरल के आस-पास ट्रेड कर रहा था, लेकिन युद्ध की शुरुआत के बाद तेजी से बढ़ा और फिलहाल 112 डॉलर के पार बना हुआ है। इसके अलावा भारतीय रुपये में लगातार जारी गिरावट ने भी विदेशी निवेशकों का सेंटीमेंट बिगाडऩे में बड़ा रोल निभाया है। युद्ध से पहले अमेरिकी डॉलर के मुकाबले रूपए की वैल्यू 91 के आसपास थी, जो अब 93 का स्तर पार कर चुकी है। कई एक्सपट्र्स ने रुपया के 95 तक टूटने का अनुमान भी जाहिर किया है। विनोद उपाध्याय / 22 मार्च, 2026