लेख
24-Mar-2026
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पश्चिम एशिया काभू-राजनीतिक परिदृश्य एक बार फिर उस मोड़ पर खड़ा है, जहां हर अगला कदम केवल तनाव को और गहरा करने वाला साबित हो सकता है। हाल के घटनाक्रमों में डोनाल्ड ट्रम्प की चेतावनियों, ईरान की आक्रामक प्रतिक्रिया और इजरायल पर हुए हमलों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह संघर्ष अब केवल सीमित क्षेत्रीय टकराव नहीं रह गया, बल्कि वैश्विक स्थिरता के लिए गंभीर खतरा बनता जा रहा है। होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर पैदा हुआ विवाद इस संकट का केंद्र बन चुका है। यह मार्ग दुनिया के ऊर्जा आपूर्ति तंत्र की धुरी माना जाता है। यहां किसी भी प्रकार की रुकावट न केवल तेल बाजार को झकझोरती है बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी संकट में डाल देती है। जब अमेरिका ने 48 घंटे का अल्टीमेटम देकर इस मार्ग को खोलने की मांग की, तो यह केवल एक कूटनीतिक बयान नहीं था, बल्कि शक्ति प्रदर्शन का संकेत भी था। दूसरी ओर, ईरान ने जिस तरह से जवाबी हमलों की चेतावनी दी और यह स्पष्ट किया कि उसके ऊर्जा ठिकानों पर हमला हुआ तो वह पूरे क्षेत्र के महत्वपूर्ण ढांचे को निशाना बनाएगा, उसने इस संघर्ष को और अधिक खतरनाक बना दिया है। विशेष रूप से डीसैलिनेशन प्लांट्स और फ्यूल डिपो जैसे लक्ष्यों की बात करना इस ओर इशारा करता है कि आने वाले समय में यह संघर्ष आम नागरिकों के जीवन पर सीधा प्रभाव डाल सकता है। पानी जैसी बुनियादी जरूरत पर संकट उत्पन्न होना किसी भी क्षेत्र को मानवीय आपदा की ओर धकेल सकता है। इस पूरे घटनाक्रम में सबसे चिंताजनक बात यह है कि दोनों पक्ष अपने-अपने रुख पर अडिग नजर आते हैं। अमेरिका अपनी वैश्विक शक्ति के भरोसे दबाव बनाने की नीति अपनाता रहा है, जबकि ईरान ने यह दिखाने की कोशिश की है कि वह किसी भी कीमत पर पीछे हटने को तैयार नहीं है। यह टकराव केवल सैन्य ताकत का नहीं, बल्कि राजनीतिक अहंकार का भी प्रतीक बन चुका है। इतिहास गवाह है कि जब भी महाशक्तियों ने अपने अहंकार के कारण निर्णय लिए हैं, उसका परिणाम व्यापक विनाश के रूप में सामने आया है। चाहे वह शीत युद्ध का दौर रहा हो या मध्य पूर्व के पिछले संघर्ष, हर बार आम जनता को इसकी सबसे बड़ी कीमत चुकानी पड़ी है। आज भी वही स्थिति दोहराई जाती नजर आ रही है। ईरान द्वारा इजरायल के शहरों पर किए गए मिसाइल हमलों और उसके बाद हुए नुकसान ने यह साबित कर दिया है कि युद्ध में कोई भी पक्ष पूरी तरह सुरक्षित नहीं रह सकता। आधुनिक तकनीक और उन्नत हथियारों के बावजूद, हमलों का प्रभाव सीधे नागरिक क्षेत्रों तक पहुंचता है। अस्पताल, जल संयंत्र, बिजली व्यवस्था और संचार तंत्र—सब कुछ इस आग की चपेट में आ जाता है। इस संघर्ष में एक और महत्वपूर्ण पहलू वैश्विक प्रतिक्रिया का है। जी-7 देशों द्वारा ईरान के हमलों की निंदा और सऊदी अरब द्वारा ईरानी अधिकारियों को निष्कासित करना यह दर्शाता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी ध्रुवीकरण तेज हो रहा है। ऐसे में किसी भी छोटी घटना का बड़े युद्ध में बदलना अब पहले से कहीं अधिक आसान हो गया है। अमेरिका का रुख केवल ईरान तक सीमित नहीं दिखता। क्यूबा और वेनेजुएला जैसे देशों के प्रति उसकी नीति यह संकेत देती है कि वह वैश्विक स्तर पर अपने प्रभाव को बनाए रखने के लिए आक्रामक रणनीति अपनाने को तैयार है। क्यूबा के साथ दशकों पुरानी दुश्मनी और उस पर लगाए गए प्रतिबंध इस बात का उदाहरण हैं कि कैसे राजनीतिक मतभेद आम जनता के जीवन को कठिन बना देते हैं। यहां सबसे बड़ा प्रश्न यह उठता है कि क्या शक्ति प्रदर्शन वास्तव में समाधान है? क्या सैन्य कार्रवाई से स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है? इतिहास का उत्तर स्पष्ट है—नहीं। युद्ध कभी समाधान नहीं रहा, बल्कि समस्याओं को और जटिल बनाने का माध्यम बना है। भारत जैसे देशों का दृष्टिकोण इस संदर्भ में महत्वपूर्ण हो जाता है। नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने तटस्थ और संतुलित विदेश नीति अपनाने की कोशिश की है। यह नीति न केवल रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह वैश्विक शांति के लिए एक सकारात्मक संदेश भी देती है। भारत ने हमेशा संवाद और कूटनीति को प्राथमिकता दी है, जो आज के समय में सबसे आवश्यक है। जब दुनिया के बड़े देश शक्ति संतुलन की राजनीति में उलझे हुए हैं, तब भारत का यह दृष्टिकोण एक वैकल्पिक मार्ग प्रस्तुत करता है। यह मार्ग बताता है कि संवाद, सहयोग और आपसी सम्मान के आधार पर भी अंतरराष्ट्रीय संबंधों को मजबूत किया जा सकता है। युद्ध का सबसे बड़ा नुकसान यह है कि यह केवल सैनिकों तक सीमित नहीं रहता। इसके प्रभाव समाज के हर वर्ग पर पड़ते हैं। बच्चों की शिक्षा बाधित होती है, स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा जाती हैं और आर्थिक गतिविधियां ठप हो जाती हैं। इसके अलावा, युद्ध के बाद पुनर्निर्माण की प्रक्रिया वर्षों तक चलती है, जिसमें अपार संसाधनों की आवश्यकता होती है। आज के समय में जब दुनिया जलवायु परिवर्तन, आर्थिक असमानता और महामारी जैसी चुनौतियों से जूझ रही है, ऐसे में युद्ध जैसे संघर्ष इन समस्याओं को और गंभीर बना देते हैं। संसाधनों का उपयोग जहां विकास और कल्याण के लिए होना चाहिए, वहीं वे विनाश के उपकरणों में बदल जाते हैं। अहंकार और शक्ति की राजनीति का यह खेल अंततः मानवता को ही नुकसान पहुंचाता है। जो देश युद्ध शुरू करता है, उसे भी इसकी कीमत चुकानी पड़ती है और जिस पर हमला होता है, उसकी स्थिति तो और भी दयनीय हो जाती है। यही कारण है कि कहा जाता है—युद्ध में कोई विजेता नहीं होता, केवल हारने वाले होते हैं। इसलिए आज जरूरत है कि विश्व के सभी देश अपने मतभेदों को संवाद के माध्यम से सुलझाने का प्रयास करें। कूटनीति और सहयोग ही वह रास्ता है जो स्थायी शांति की ओर ले जा सकता है। यदि समय रहते यह समझ नहीं आई, तो आने वाला भविष्य और भी भयावह हो सकता है। एक ऐसा भविष्य, जहां विकास के स्थान पर विनाश की कहानियां लिखी जाएंगी और जहां मानवता केवल संघर्षों की राख में अपना अस्तित्व तलाशती नजर आएगी। ईएमएस/24/03/2025