नई दिल्ली (ईएमएस)। केवल भारत में ही नहीं, बल्कि दुनिया के लगभग हर हिस्से में मुर्गा सुबह-सुबह बांग देता है। क्या आपको मालूम है, इसके पीछे भी एक दिलचस्प विज्ञान है। वैज्ञानिकों के अनुसार मुर्गे के इस व्यवहार के पीछे जैविक और सामाजिक दोनों कारण होते हैं। वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि मुर्गों के शरीर में एक खास तरह की ‘बायोलॉजिकल क्लॉक’ यानी जैविक घड़ी होती है। यही घड़ी उन्हें संकेत देती है कि सुबह होने वाली है। इसलिए मुर्गे केवल सूरज की रोशनी देखकर ही बांग नहीं देते, बल्कि उनके शरीर की आंतरिक प्रणाली उन्हें भोर का समय बता देती है। एक प्रयोग में मुर्गों को पूरे 24 घंटे अंधेरे में रखा गया, फिर भी उन्होंने लगभग उसी समय बांग दी जब सामान्य रूप से सुबह होती है। जापान की नागोया यूनिवर्सिटी की एक रिसर्च में भी यह साबित हुआ कि मुर्गों को सुबह का समय पहले से पता चल जाता है, चाहे उनके आसपास रोशनी हो या न हो। मुर्गे के बांग देने के पीछे एक सामाजिक कारण भी होता है। दरअसल यह एक तरह का ऐलान होता है, जिसके जरिए मुर्गा अपने इलाके पर अधिकार जताता है। वह दूसरे मुर्गों को यह संकेत देता है कि यह उसका क्षेत्र है और यहां मौजूद मुर्गियों पर उसका अधिकार है। मुर्गे स्वभाव से काफी क्षेत्रीय होते हैं और एक ही झुंड में कई मुर्गे होने पर वे वर्चस्व स्थापित करने की कोशिश करते हैं। मुर्गों के झुंड में एक खास पदानुक्रम या रैंकिंग होती है। झुंड का सबसे ताकतवर मुर्गा ‘अल्फा’ कहलाता है और नियम के अनुसार वही सबसे पहले बांग देता है। उसके बाद ही बाकी मुर्गे बांग देते हैं। यदि कोई कमजोर या छोटा मुर्गा पहले बांग दे दे, तो इसे अल्फा मुर्गे के लिए चुनौती माना जाता है और कई बार उनके बीच लड़ाई भी हो जाती है। हालांकि मुर्गे अपनी आंतरिक घड़ी के अनुसार ही सक्रिय होते हैं, लेकिन वे रोशनी के प्रति भी बेहद संवेदनशील होते हैं। तेज रोशनी, स्ट्रीट लाइट या पूर्णिमा की रात के कारण वे कभी-कभी समय से पहले भी बांग देने लगते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार मुर्गे की बांग की आवाज काफी तेज होती है और यह लगभग 140 डेसिबल तक पहुंच सकती है, जो किसी जेट विमान के टेकऑफ के शोर के करीब मानी जाती है। मुर्गियां आमतौर पर बांग नहीं देतीं, क्योंकि यह व्यवहार नर मुर्गों के हार्मोन टेस्टोस्टेरोन से जुड़ा होता है। सुदामा/ईएमएस 25 मार्च 2026