-सरकार बोली— सप्लाई पर फिलहाल नहीं बड़ा खतरा नई दिल्ली,(ईएमएस)। मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष और सैन्य तनाव का असर अब भारतीय रसोई तक पहुंचने लगा है। पहले जहां एलपीजी की कीमतों को लेकर चिंता थी, वहीं अब खाने के तेल की बढ़ती कीमतों ने आम आदमी की जेब पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया है। पूड़ी, पराठा, समोसा और रोजमर्रा की सब्जियों में इस्तेमाल होने वाला तेल महंगा होने से घरेलू बजट बिगड़ने लगा है। पिछले एक महीने के आंकड़ों पर नजर डालें तो 24 फरवरी से 24 मार्च 2026 के बीच खाने के तेल की कीमतों में स्पष्ट बढ़ोतरी दर्ज की गई है। सूरजमुखी तेल की कीमत 175 रुपये से बढ़कर 181 रुपये प्रति किलो हो गई है। वहीं पाम ऑयल 5 रुपये महंगा होकर 141 रुपये प्रति किलो पहुंच गया है। सोयाबीन तेल में 4 रुपये प्रति किलो का इजाफा हुआ है, जबकि मूंगफली, वनस्पति और सरसों तेल भी करीब 3 रुपये प्रति किलो महंगे हुए हैं। ऐसे में विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में खाने के तेल की बढ़ती मांग और सीमित घरेलू उत्पादन इस समस्या की बड़ी वजह है। देश में तेल की खपत लगातार बढ़ रही है, जबकि उत्पादन उस गति से नहीं बढ़ पा रहा। 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, शहरी क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति सालाना खपत लगभग 12 किलो और ग्रामीण क्षेत्रों में करीब 11 किलो रही है। भारत अपनी जरूरत का लगभग 56 फीसदी खाने का तेल आयात करता है, जबकि केवल 44 फीसदी घरेलू उत्पादन से आता है। आयात पर बढ़ती निर्भरता का असर कीमतों पर साफ दिखाई देता है। वर्ष 2017 में जहां भारत ने 11.8 अरब डॉलर का तेल आयात किया था, वहीं 2022 में यह बढ़कर 21.1 अरब डॉलर हो गया। हालांकि 2025 में इसमें कुछ गिरावट आई और यह 18.6 अरब डॉलर पर आ गया। आयात में पाम ऑयल की हिस्सेदारी सबसे अधिक 41 फीसदी है, जबकि सोयाबीन तेल 35 फीसदी और सूरजमुखी तेल 18 फीसदी हिस्सेदारी रखते हैं। सरकार ने हालांकि स्थिति को लेकर आश्वस्त किया है। अधिकारियों के अनुसार, ईरान से जुड़े मौजूदा तनाव के बावजूद भारत की तेल आपूर्ति पर कोई बड़ा खतरा नहीं है। भारत मलेशिया, इंडोनेशिया और अमेरिका जैसे कई देशों से आयात करता है, जिससे वैकल्पिक सप्लाई बनी रहती है। इसके अलावा, सरकार ने घरेलू उत्पादन बढ़ाने के लिए नेशनल मिशन ऑन एडिबल ऑयल्स-ऑयलसीड्स की शुरुआत की है। इस योजना का उद्देश्य आने वाले वर्षों में आयात पर निर्भरता कम कर देश को खाद्य तेल के मामले में आत्मनिर्भर बनाना है। बावजूद इसके हकीकत यही है कि फिलहाल, कीमतों में बढ़ोतरी से आम उपभोक्ताओं को राहत मिलती नहीं दिख रही, और रसोई का बजट संतुलित रखना एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है। इससे आमजन में आक्रोष पनप रहा है और ऐसे लोग विरोध प्रदर्शन सड़कों पर करने का मन बना रहे हैं। देखने में आ रहा है कि बढ़ती कीमतों और तेल व संकट को लेकर राजनीतिक तौर पर विरोध जारी है। हिदायत/ईएमएस 25मार्च26