लेख
26-Mar-2026
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(रामनवमी पर विशेष) राम नवमी 2026, 26 मार्च को है, जिसे उपवास, प्रार्थना और रामायण पढ़ने के साथ मनाया जाता है।जो नित्य, अविनाशी, आदि पुरुष, परब्रह्म राम है वे ही हृदय में रहते हैं। प्रकट करने के लिए स्वयं को प्रयास करना होगा। दूसरे का इसमें कोई रोल नहीं है। अपका स्वरूप परमचेतन ब्रह्म है, उनसे प्रत्यक्ष होना स्वयं पर निर्भर है। ऋषियों द्वारा और बाद के संतों ने भी अपनी शब्दों में राम को ,सत्य नाम का वर्णन किया है यह जो उल्टा नाम जपे जग जाना यह कोई व्यक्ति विशेष का नाम नहीं यह नाम राम ही प्रभु को ही नाम कहा है उसी का सुमिरन सुरती को उलट कर संत अपने आत्मा में अनुभव करते हैं यह साधना का विषय है अनुभव का विषय है जीव सनातन ईश्वर का अंश है उसी प्रकृति के कारण सदैव आनन्द की तलास में रहता है। इस प्रकिया में कभी स्त्री पुत्र से तो कभी धन सम्पत्ति से तो कभी स्वादिष्ट पदार्थों से सदैव आनन्द प्राप्त करने में सतत् लगा रहता है, परंतु उपरोक्त सभी आनन्द क्षणिक होते हैं। और नये आनन्द के प्रयास में लग जाता है। जीवन के आखिरी क्षण तक सतत् यही प्रयास चलता रहता है। वास्तव में पदार्थों में आनन्द है ही नहीं केवल आनन्दका आभास है, वह उसे भोगने के बाद मिट जाता है। इसलिए जो आत्मानन्द जो स्वयं का स्वरूप है, जबतक इसमें स्थित नहीं होंगे तबतक पूर्ण आनन्द नहीं मिलेगा।जब आप बुलंदी पर रहते हैं तो सब अच्छा लगता है लेकिन जब आप दुःख में रहते हैं तो पहले अपनी बात लोगों को बताने पर लोग आपकी मदद करते थे लेकिन अब समय वैसा नहीं है अगर दुःख की बात करेंगे तो आपकी ही गलती निकालेंगे या परिवार को बदलने की सलाह देंगें और फिर जब कुछ समझ नहीं आता तो अन्त में लोग आत्महत्या करने पर मजबूर हो जाते हैं अतः आज व्हाट्सप्प का युग है डेली प्रवचन होता है और आपस में लड़ाई भी यानि आज लोग खुद अपने दुःखो से परेशान है आखिर आपका दुःख क्यों सुने समय नहीं लोग आज बदल गए हैं अतः आप अपनी बात दुःख में किसी से शेयर करेंगे तो लोग मज़ाक ही नहीं हवा की तरह पूर्ण समाज में फैलती है लेकिन आपको यानि मानव को भगवान राम ने असीमित शक्ति प्रदान की है जो जीवन में गलत कर्मों या कष्ट में बचाता है जब लंका पार करने की बात आती है तो ऋक्षराज जाम्बवान्‌ ने श्री हनुमानजी से कहा- हे हनुमान्‌! हे बलवान्‌! सुनो, तुमने यह क्या चुप साध रखी है? तुम पवन के पुत्र हो और बल में पवन के समान हो। तुम बुद्धि-विवेक और विज्ञान की खान हो॥2॥ कवन सो काज कठिन जग माहीं। जो नहिं होइ तात तुम्ह पाहीं॥ राम काज लगि तव अवतारा। सुनतहिं भयउ पर्बताकारा॥3॥ जगत्‌ में कौन सा ऐसा कठिन काम है जो हे तात! तुमसे न हो सके। श्री रामजी के कार्य के लिए ही तो तुम्हारा अवतार हुआ है। यह सुनते ही हनुमान्‌जी पर्वत के आकार के (अत्यंत विशालकाय) हो और हनुमान जी विशाल रुप से उड़ते हुए लंका पार कर जाते हैं अतः जीवन में गलत कर्मों से विभिन्न समस्याओं और जटिलताओं को जन्म दे सकता है, जिनमें शामिल हैं: गिरना और चोट लगना और सम्भलने की ताकत : चक्कर आने से गिरने और चोट लगने का खतरा बढ़ सकता है, खासकर बुजुर्गों में होता लेकिन कभी कभी आदमी के सोचने और हरबड़ाहट के कारण भी गिर जाता है भगवान राम का ध्यान करने से आप संयम से काम लेते हैं जैसे जैसे जब भगवान राम के भाई भरत उन्हें मनाने आते हैं तो भ्राता लखण के मन में लड़ने की धारणा बनती है लेकिन भगवान राम ने लक्ष्मण को समझाते हैं की उसकी धारणा प्रेम की है श्री राम का विश्वास किसी एक घटना या सबूत पर आधारित नहीं था, बल्कि भरत के संपूर्ण चरित्र और स्वभाव की जीवन भर की समझ पर टिका था। वे जानते थे कि भरत का मूल स्वभाव धर्म, प्रेम और त्याग का है।अतः जब त्याग की भावना आएगी तब आप हरबड़ाहट में नहीं शान्ति और धैर्य से काम लेंगे जिससे आप संयम से काम लेंगे जिससे आप ना तो गिरंगे और ना ही चोट लगेगी क्योंकि भगवान राम अपने भक्तो को हर समय सँभलने का मौका देता है जैसा लगेगा की आपको अपने गोद में ही ले लिया। जीवन की गुणवत्ता में कमी को दूर करना : बार-बार या लंबे समय तक चक्कर आना किसी व्यक्ति की दैनिक गतिविधियों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित कर सकता है, जिससे जीवन की गुणवत्ता कम हो सकती है।जीवन की गुणवत्ता अच्छी होंगी आप बुरे लोगों से आसानी से पीछा छुड़ा लोगे आप राम जी के जीवन से यह सिख ले सकते हैं कि अपने लक्ष्य का पीछा तब तक न छोड़ें, जब तक की आप उसे प्राप्त न कर लें। क्योंकि अगर आप पूरी मेहनत और लगन के साथ लक्ष्य प्राप्ति में लग जाते हैं, तो वह आपको हासिल होकर ही रहता है। रामकथा से भी हमें यही सीख मिलती है कि अंत में सफलता जरूर मिलती है। चिंता और अवसाद: लगातार चक्कर आने से भावनात्मक परेशानी हो सकती है, जिससे चिंता और अवसाद हो सकता है।चिंता विकार हमें उन स्थितियों में भी चिंतित कर देते हैं जहां दूसरों को खतरा महसूस नहीं होता।भगवान राम का ध्यान करने से अपने आप ही चिंता मिलेगी और आप हमेशा खुश रहेंगे। चक्कर आने के कारण भारी मशीनरी चलाना या चलाना असुरक्षित हो सकता है, जिससे स्वयं और दूसरों के लिए खतरा पैदा हो सकता है।किसी एक ध्येय पदार्थ में धारणा ध्यान और समाधि तीनों होने से संयम कहलाता है। काम या सामाजिक गतिविधियां छूट जाने पर उत्साह : चक्कर आने के कारण कार्यदिवस छूट सकता है और सामाजिक गतिविधियों में भागीदारी कम हो सकती है।लेकिन जो भगवान राम के चरणों में बार बार ध्यान करता है उसे पुनः एक नई ऊर्जा मिलती है और फिर बीते समय को भूल कर अपने अच्छे काम के कारण पुनःसामाजिक गतिविधियां में उसका काम ही कुछ ऐसा होता है कि पुनः लोग उसकी प्रशंसा करते हैं अतः राम हमें हारने नहीं काम में हुई गलती को बारीकी से समझने का मौका देता है जिससे पुनः नया उत्साह आता है। अंतर्निहित चिकित्सा स्थितियाँ में सुधार : चक्कर आना अंतर्निहित चिकित्सा समस्याओं का एक लक्षण हो सकता है, जिनमें से कुछ के लिए विशिष्ट उपचार की आवश्यकता हो सकती है।लेकिन जो भगवान राम का ध्यान करता है वो पुनः कार्य को दुगनी गति से बढ़ाता है और संयम से काम लेता है घबराहट जरूर दूर होगी चक्कर आना यानि मनोस्थिति ख़राब होना है लेकिन यदि भगवान राम का साथ मिला तो मनोस्थिति ठीक होती है, और मन पर नियंत्रण होने से मन उसमें रमने लगता है और फिर आपको किसी की आपको जरुरत नहीं पड़ेगी। दवा के दुष्प्रभाव में सुधार : चक्कर आने का इलाज करने के लिए उपयोग की जाने वाली कुछ दवाओं के दुष्प्रभाव या अन्य दवाओं के साथ परस्पर क्रिया हो सकती है।इसलिए दवाई सही इलाज नहीं है बल्कि मानसिकता को ठीक करना चाहिए और मैं खुद इसका भूक़्तभोगी हूँ 2017 में मुझे हार्ट में प्रॉब्लम हुआ हाथ उठाने और मोड़ने में परेशानी हुई हार्ट के डॉक्टर ने खुब टेस्ट कराया और एन्जॉयोग्राफी हेतु सलाह दि उधर कुछ एमडी के छात्र भी जानना चाहते थे इसलिए मुझे ऐ समझ आ गया कि ऐ लोग इलाज नहीं बल्कि आपके दिल से खिलवाड़ करेंगे और आखिर प्रैक्टिकल कैसे करेंगे अतः मैं वहाँ से भागा और सब चिंता, लोगों को जितना बेबकूफ बनाकर लूटना है लूटो आखिर कब तक करोगे और ईश्वर के ध्यान और नकारात्मक लोगों से दूर रहकर शान्ति से भगवान राम का ध्यान किया और बाद में नार्मल हो गया अतः ईश्वर ने बॉडी में रिपेरिंग सिस्टम भी दि है लेकिन यह बहुत ध्यान और शांति से आता है। इस देह रूपी लंका का वास्तविक उत्तराधिकारी जीव रूपी विभीषण है। पर यह जीव रूपी विभीषण, मोह रूपी रावण, अहंकार रूपी कुम्भकरन, काम रूपी मेघनाद और वासना रूपी सूर्पनखा के वशीभूत है।जिससे ऐ बीमारी पैदा होती है। रामचरितमानस कोई कहानी की किताब नहीं है, अपने मानस में, मन में देखा गया राम चरित्र है। हमें भी मानस के पात्रों को व्यक्ति रूप में नहीं, अन्तःकरण की वृत्ति के रूप में देखना है। ध्यान दें, तुलसीदास जी विनय पत्रिका में लिखते हैं- अपारे संसारे विषय विष पूरो जलनिधि रचित मन दनुज मय रूप धारी माने विषय वासना के जल से भरा यह संसार ही सागर है। इस संसार-सागर में, आपका मन ही मय दानव है, इसी के द्वारा रचित यह आपका शरीर ही लंका है। जीव-विभीषण, भगवान राम का टूटा फूटा भजन तो करता है, पर अपनी आँखों से मोहादि के, सब प्रकार के अनाचार दुराचार पापाचार को देखता हुआ भी, मोह की सत्ता का विरोध नहीं करता। भगवान राम के प्रभाव से जीव के करोड़ों जन्मों का किया हुआ पुण्य, फल देने को खड़ा होता है,और मनुष्य के रूप में जन्म लेता है तब उसके जीवन में हनुमान रूपी संत आते हैं, तब ही जीव रूपी विभीषण को साहस होता है और वह मोहादि को चुनौती देता है। वह मोह रूपी रावण की लात तो खाता है, पर अन्ततः गिरता पड़ता भगवान की शरण में जाता है। भगवान अंतःकरण में अवतरित होकर, उतर कर, मोहादि का नाश कर देते हैं। और शान्ति रूपी सीता, जो मोह के कारण, हृदय रूपी अशोक वाटिका में बन्दी पड़ी थी, बंधन से मुक्त हो जाती है। यही ख़ुश रहने का सरल उपाय है जिससे चक्कर कभी नहीं आ सकता है जो रेकी चिकित्सा के द्वारा सकारात्मक ऊर्जा से ठीक हो जाता है अतः भगवान राम को भजो अपनी श्रद्धा से और रामायण का पाठ करने से चिंता जैसी कौई समस्या नहीं होगी।योगी इस अवस्था में भली भांति समझ लेता है कि शरीर के अंग किस तरह से सूक्ष्म अवस्था से स्थूल अवस्था में परिणत होते हैं और किस प्रकार पुनः स्थूल से सूक्ष्म किये जा सकते हैं । अतः वह अपने शरीर को अत्यन्त हल्का बनाकर आकाश में गमन कर सकता है ।यहीं राम की महिमा है जो हनुमान जी ने शरीर को इतना हल्का कर लिया कि पृथ्वी के गुरुत्वाकर्शन बल शून्य हो जाता है और समुद्र पार कर लेते हैं। हल्का मतलब हर विकार से मुक़्त हो गए और एक साहस जो भगवान राम के कार्य हेतु है जो अपरम्पार शक्ति है। ईएमएस / 26 मार्च 26