भारत आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहां सरकार के बड़े-बड़े दावे और ज़मीनी हकीकत के बीच का अंतर अब आम जनता को भी दिखाई देने लगा है। भारत 145 करोड़ की आबादी वाला देश हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी “विश्व गुरु” होने की बात करते हैं। सवाल यह है, भारत सरकार की नीतियां और दावे विश्व गुरु के अनुरूप हैं? हाल मे अमेरिका इजरायल ने ईरान के ऊपर हमला किया है। उसके बाद वैश्विक हालात खासकर पश्चिम एशिया के देशों में बढ़ते तनाव ने भारत की कमजोरियों को सारी दुनिया के देशों और भारतीय जनता के बीच में उजागर कर दिया है। भारत की सबसे बड़ी चुनौती आयात पर निर्भरता है। कच्चा तेल, गैस, उर्वरक, यूरिया और डीएपी का बड़ा हिस्सा हमें विदेशों से आयात करना पड़ता है। जैसे-जैसे अंतर्राष्ट्रीय संकट बढ़ रहा है, उससे सभी आयातित सामान की सप्लाई प्रभावित हो रही है। विशेष रूप से कच्चा तेल, गैस और खाद की कमी देश में होती चली जा रही है। इनकी कीमतें बढ़ रही हैं। डॉलर के मुकाबले रुपए की कीमत कम होने से पिछले कई महीनो से दाम बढ़ते चले जा रहे हैं। इसका सीधा असर आम जनता और किसानों पर पड़ रहा है। पिछले कई वर्षों से किसानों को खाद महंगी मिल रही है और उनकी मांग से कम उपलब्ध हो रही है। जिसके कारण किसान समय-समय पर प्रदर्शन करते देखे जाते हैं। इसके अलावा कृषि उत्पादन भी प्रभावित होता है। किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है। इसी तरह अब गैस और पेट्रोल-डीजल की जो कमी देखने को मिल रही है इसका असर मजदूरों से लेकर हर वर्ग को पड़ रहा है। घरों में खाना बनाना मुश्किल हो गया है। इसके परिणाम स्वरूप महंगाई और आर्थिक असंतुलन बढ़ रहा है। जिससे करोड़ों नागरिक रोजाना परेशान हो रहे हैं। सरकार का यह कहना कि “सब कुछ सामान्य है”। जनता के बीच विश्वास की कमी पैदा कर सकता है। आम जनता को लग रहा है कि सरकार हमसे कुछ छुपा रही है। झूठ बोल रही है। वास्तविकता कुछ और है, सरकार कुछ और बता रही है। इसका असर सरकार की विश्वसनीयता पर पड़ रहा है। जमीनी स्तर पर पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों में आम लोगों को परेशानी हो रही है। स्वाभाविक रूप से आम लोगों में डर और असमंजस की स्थिति बन गई है। उनकी मजदूरी रोजगार और खाना-पीना तक इस स्थिति में प्रभावित हो रहा है। ऐसे समय में सरकार की पारदर्शिता और वास्तविक स्थिति को देखते हुए यदि सरकार सच बोलती है तो लोगों को वैकल्पिक साधन खोजने और इस समस्या का समाधान निकालने के लिए वह मानसिक रूप से तैयार हो सकेगी। यही समस्या का सबसे बड़ा समाधान है। जनता को वास्तविक स्थिति से अवगत कराना सरकार की जिम्मेदारी है। आम जनता को संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग के लिए प्रेरित करना सरकार की जिम्मेदारी है। विदेश नीति को लेकर भी सरकार की आलोचना हो रही है। सवाल उठता है, क्या “सबके साथ व्यापारिक दोस्ती” की नीति हमें मजबूत बना रही है, या कमजोर? कर रही है। “विश्व गुरु” होने का दावा तब तक अधूरा है जब तक भारत का प्रभाव वैश्विक स्तर पर महसूस ना हो। भारत ने कई अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है, संकट के समय अंतर्राष्ट्रीय मंच पर क्या हमारी बात सुनी जा रही है या हमारा महत्व है। दुनिया के देशों के साथ वास्तविक समर्थन और प्रभाव में जो अभाव वर्तमान में देखने को मिल रहा है, वह चिंता का विषय है। इस कठिन समय में सरकार को राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर विदेशनीति में अपने पूर्व के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाने होंगे। वैकल्पिक आपूर्ति स्रोतों की खोज, घरेलू उत्पादन को बढ़ाने की दिशा में महत्वपूर्ण निर्णय लेने होंगे। जनता के साथ ईमानदारी और सत्यता के साथ सरकार को संवाद करना होगा। वास्तविकता छिपाने और अपने आपको सर्वज्ञ होने की मानसिकता से बचना होगा। सरकार आश्वासन से नहीं, समस्याओं के समाधान और स्पष्ट रणनीति से ही देश को इस संकट से उबार सकती है। सरकार के लिए यह समय है वास्तविक स्थिति के सच को स्वीकार करने का, ना कि उससे बचने का। सत्ता पक्ष और विपक्ष को एक साथ आना होगा। तभी हम जो समस्याएं सामने आ रही हैं उन्हें निपटा पाएंगे। ईरान और अमेरिका के इस युद्ध में एक और सबसे बड़ा खतरा आर्थिक मंदी का है जो सारी दुनिया के देशों में होने जा रहा है। इसका असर भी भारत पर पड़ेगा। केंद्र सरकार, राज्य सरकारों और स्थानीय संस्थाओं के ऊपर कर्ज बड़ी तेजी के साथ बढ़ रहा है। आम जनता से भारी टैक्स वसूल किया जा रहा है। आम जनता भी अपना जीवन-यापन आसानी से नहीं कर पा रही है। यह वास्तविक समस्याएं हैं। इनसे निपटने के लिए सत्ता पक्ष, विपक्ष और आम जनता को एकजुट होना पड़ेगा। यही समय की मांग है। ईएमएस / 26 मार्च 26