✍️ अतीश दीपंकर भागलपुर (ईएमएस)| भागलपुर शहर स्थित एसएम कॉलेज में भारतीय संस्कृति में लोक कलाओं का बदलता स्वरुप विषय पर दो-दिवसीय अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उदघाटन तिलकामांझी भागलपुर विश्वविद्यालय के प्रभारी कुलपति प्रो. बिमलेन्दु शेखर झा ने दीप प्रज्वलित कर किया। मुख्य अतिथि के तौर पर भागलपुर प्रमंडल के आयुक्त अवनीश कुमार सिंह थें। अपने अध्यक्षयीय सम्बोधन में कुलपति प्रो. झा ने कहा कि, भारतीय संस्कृति में लोक कलाएँ (फोक आर्ट्स) हमेशा से समाज के जीवन, परंपराओं और मान्यताओं का जीवंत दर्पण रही हैं। हालांकि समय के साथ इनका स्वरूप लगातार बदलता रहा है। आज के दौर में यह बदलाव और भी तेजी से दिखाई देता है। भारतीय लोक कलाएँ आज परंपरा और आधुनिकता के संगम पर खड़ी हैं। उनका स्वरूप बदल जरूर रहा है, लेकिन उनकी आत्मा अभी भी भारतीय संस्कृति से काफी गहराई के साथ जुड़ी हुई है। जरूरत है कि हम इन कलाओं को संरक्षित करते हुए उन्हें आधुनिक समय के साथ आगे बढ़ने का अवसर दें। कुलपति प्रो. झा ने एसएम कॉलेज की प्राचार्या द्वारा विश्वविद्यालय में विजुअल आर्ट्स डिपार्टमेंट खोलने के प्रस्ताव पर कहा कि, इसका प्रोपोजल भेजिए, बायलॉज बनाइये, सिंडीकेट व अन्य निकायों से पास कराकर प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजूंगा। यह एक अच्छी पहल होगी। विश्वविद्यालय इसके लिए सभी तरह के सहयोग देने को तैयार है। विश्वविद्यालय में ऐसे नेक कार्यों के लिए पैसों की कोई कमी नहीं है, भरपूर सहयोग मिलेगा। उन्होंने कहा कि भारतीय लोक कला देश की समृद्ध परंपरा और समाज का जीवंत दस्तावेज है। यह हमारी सांस्कृतिक पहचान है। कुलपति ने कहा कि, पहले मिट्टी के बर्तनों और दीवालों पर भी लोक कलाकृतियाँ ऊकेरी जाती थी। आज के समय में अब यह फैशन बन गया है। अब तो यह परिधानों, पर्स, बैग आदि में भी देखी जा रही है। हालांकि आधुनिकीकरण, शहरीकरण और डिजिटलाइजेशन के कारण इसकी मूल प्रकृति में कमी आई है। गावों में और पौराणिक कथाओं में भी लोक कलाएं काफी प्रचलित थी यहाँ तक की हमारी प्रकृति में भी परिलक्षित होती थी। वीसी ने सेमिनार के विषय वस्तु की काफी सराहना की और आयोजकों को बधाई दिए। मुख्य अतिथि के तौर पर भागलपुर प्रमंडल के आयुक्त अवनीश कुमार सिंह ने कहा की सेमिनार का विषय काफी समसामयिक और रोचक है। लोक कलाओं को संरक्षित रखने के लिए इसे आम लोगों से जोड़ना होगा। जनता से जुड़ाव जरुरी है। भारत को आज जो विश्व गुरु बनाने का सपना है, उसमें नॉलेज का बड़ा योगदान है। उन्होंने कहा कि, सेमिनार से निकले निष्कर्ष समाज के लिए काफी उपयोगी साबित होंगे। एसएम कॉलेज की प्राचार्या व सेमिनार की कन्वेनर प्रो. निशा झा ने सेमिनार का विषय प्रवेश कराया। उन्होंने पारम्परिक संगीत से सबों को अवगत कराया साथ ही लोक संगीत का वर्गीकरण पेश की। प्राचार्या ने कहा की भारतीय संगीत और सिनेमा पर पाश्चात्य संस्कृति का काफी बुरा प्रभाव देखने को मिल रहा है। लोक संगीत और कला को बढ़ावा देने में सरकार को भी आगे आना होगा। आज कला का स्तर गिर रहा है। मूर्ति कला खत्म हो रही है। मूर्ति कला से जुड़े कलाकारों को बढ़ावा मिलनी चाहिए। उन्होंने कुलपति से विश्वविद्यालय में विजुअल आर्ट्स का विभाग खोलने की मांग की। इसके पूर्व कुलपति, आयुक्त सहित अन्य आगंतुक अतिथियों का सम्मान अंग वस्त्र भेंट कर किया गया। संगीत विभाग की छात्राओं ने कुलगीत और वेदगान की प्रस्तुति दी। पुष्प वर्षा से अतिथियों का स्वागत किया गया। वहीं धन्यवाद ज्ञापन सेमिनार की आयोजन सचिव ने किया। सेमिनार के उद्घाटन सत्र में डीएसडब्लू प्रो. अर्चना कुमारी साह, कुलसचिव प्रो. रामाशीष पूर्वे, जिला कला एवं संस्कृति पदाधिकारी अंकित रंजन, टीएमबीयू के प्रॉक्टर डॉ. मुकेश कुमार सिंह, सीसीडीसी डॉ. एसएन पाण्डेय, कॉलेज इंस्पेक्टर डॉ. रंजना, पीआरओ डॉ. दीपक कुमार दिनकर, पूर्व प्राचार्य डॉ रमन सिन्हा समेत अन्य गणमान्य शिक्षाविद उपस्थित थें। अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार में यूएसए, श्रीलंका, मॉरीशस सहित भारत के कई राज्यों के विश्वविद्यालयों के विषय विशेषज्ञ और शिक्षाविद ऑनलाइन और ऑफलाइन मोड में भाग ले रहे हैं। उदघाटन सत्र के दौरान सोविनयर का भी विमोचन किया गया। एसएम कॉलेज की प्राचार्या व सेमिनार की कन्वेनर प्रो. निशा झा ने आगत अतिथियों का स्वागत करते हुए अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनार के थीम पर विषय प्रवेश कराया।उन्होंने कहा कि सेमिनार का विषय काफी सामयिक और सारगर्भित है। सेमिनार के पहले प्लेनरी बौद्धिक सत्र में नेपाल के त्रिभुवन यूनिवर्सिटी के हिन्दी विभाग की एचओडी डॉ. श्वेता दीप्ती ने भारतीय संस्कृति में लोक कला का महत्व विषय पर व्याख्यान दिया। वहीं संस्कार भारती जौनपुर से आयीं डॉ. ज्योति सिन्हा ने भोजपुरी के संदर्भ में भारतीय संस्कृति और लोक गीत, मगध विश्वविद्यालय के डॉ. नीरज कुमार ने भारतीय साहित्य में लोक संस्कृति सिक्किम यूनिवर्सिटी के डॉ. संतोष कुमार ने पुर्वोत्तर भारत में सुषिर वाद्य परम्परा और संस्कृति, प्रयागराज की मधुरानी शुक्ला ने भारतीय लिखा संस्कृति पर अपने विचार रखे। सेमिनार में सभी संकायों और विषयों के शिक्षक और शोधार्थी भाग ले रहे हैं। दो दिनों तक चलने वाले सेमिनार में भारतीय संस्कृति और लोक गाथा, भारतीय संस्कृति और लोक गीत, भारतीय संस्कृति और लोक कलाओं पर वैश्विकरण का प्रभाव, भारतीय ज्ञान परम्परा में लोक संगीत और कलाओं का महत्व, लोक कलाओं का वैज्ञानिक विश्लेषण के अलावे लोक साहित्य, लोक नाट्य आदि उप-विषय वस्तुओं पर विषय विशेषज्ञयों द्वारा गहन मंथन होगा। अलग-अलग तकनीकी सत्रों का संचालन किया जा रहा है। सेमिनार में विभिन्न विश्वविद्यालयों के शिक्षक, शोधार्थी और छात्र-छात्राएँ भाग ले रहें हैं। सेमिनार के पहले दिन सांस्कृतिक संध्या का भी आयोजन संगीत विभाग की छात्राओं के द्वारा किया गया। कार्यक्रम के आयोजन में सेमिनार के लिए गठित सभी कमिटी के सदस्यों, शिक्षकों और कर्मियों ने सहयोग किया।