ज़रा हटके
29-Mar-2026
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-एक पुरानी परंपरा है जो भारत के कई गांवों में पीढ़ियों से चली आ रही है गोंडा,(ईएमएस)। गांवों में जब कोई व्यक्ति बीमार होता है, तो उपचार के लिए अक्सर कुछ पारंपरिक तरीके अपनाए जाते हैं। इन्हीं में से एक है अड़हुल यानी गुड़हल के फूल से धड़कोना देना। इस प्रक्रिया में अड़हुल के फूल या उसकी डाली को मरीज के ऊपर घुमाया जाता है या हल्के से स्पर्श कराया जाता है। माना जाता है कि इससे बीमारी दूर होती है या बुरी नजर का असर खत्म हो जाता है। यह एक पुरानी परंपरा है जो पीढ़ियों से चली आ रही है। ऐसा माना जाता है कि कई बार बीमारी केवल शारीरिक नहीं बल्कि नजर या नकारात्मक ऊर्जा के कारण भी होती है। ऐसे में अड़हुल का फूल धड़कोना देने से मरीज को राहत मिलती है और उसकी तबीयत में सुधार होता है। वैद्य बताते हैं कि आयुर्वेद शास्त्रों में चरक, सुश्रुत और वाग्भट ने जो बातें बताई थी। उस हिसाब से जो आज की स्थिति आप देख रहे हैं मॉडर्न हॉस्पिटल उपलब्ध है और कई टेक्नोलॉजी उपलब्ध है पहले ऐसा नहीं होता था। इस समय जब किसी की तबीयत खराब होती है तो हम उसे तुरंत अस्पताल पहुंचते हैं या एंबुलेंस के लिए कॉल करते हैं लेकिन ऐसी पहले कोई सुविधा नहीं थी। पहले जो गांव में वैद्य हुआ करते थे वह माली (फार्मासिस्ट) के साथ में मिलकर इलाज करते थे। यदि छोटी प्रॉब्लम है तो उसकी दवा और जड़ी बूटी देकर ठीक कर देते थे लेकिन प्रॉब्लम बड़ी होती थी और जो उस समय महान वैद्य हुआ करते थे वह घूम-घूम कर पूरे भारत में चिकित्सा देते थे। संदेश देने के लिए अड़हुल के फूल का इस्तेमाल किया जाता था। अमूमन आप देखते हैं कि जब इसको डाला जाता है तो किसी चौराहे पर ही डाला जाता है। इसके पीछे का सबसे बड़ा रीजन यही है। फिर उसे रास्ते से यदि कोई महान वैद्याचार गुजरते थे तो वह देख लेते थे। इस गांव में कोई बड़ी संकट है और जाकर वह इलाज करते थे। वैद्य बताते हैं कि वायरस और बैक्टीरिया लाल कलर को देखकर इस पर अटैक करते हैं। इसलिए गांव में यदि किसी को चेचक निकलती है तो अभी भी एक बर्तन में पानी और अड़हुल का फूल डालकर उस व्यक्ति के सिर के ऊपर से सात बार घुमाकर चौराहे पर धड़कोना दिया जाता है। ऐसा करने से धीरे-धीरे चेचक कम होने लगती है क्योंकि चेचक एक वायरस बीमारी है। चेचक में अड़हुल का फूल खाने के लिए भी कहा जाता है क्योंकि इसमें इम्यूनिटी पावर बूस्ट करने की क्षमता होती है। इसलिए आज भी गांव धड़कोना देने की परंपरा चलती आ रही है। यह एक साइंटिफिक रीजन भी है। सिराज/ईएमएस 29 मार्च 2026