- हाईकोर्ट ने फेमिली कोर्ट के पूर्व आदेश को किया खारिज, पुन: सुनवाई के दिए निर्देश जबलपुर (ईएमएस)। मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश विवेक सिंह तथा न्यायाधीश अजय कुमार निरंकारी की संयुक्तपीठ ने पारिवारिक विवाद के एक मामले में न्याय के अधिकार को सर्वोपरि बताते हुए महत्वपूर्ण व्यवस्था दी है। न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल आर्थिक तंगी या गरीबी के आधार पर किसी व्यक्ति को कानूनी न्याय पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इस त के साथ न्यायालय ने छतरपुर की फैमिली कोर्ट द्वारा पति की तलाक याचिका को खारिज करने वाले पुराने आदेश को निरस्त करते हुए इस मामले की नए सिरे से सुनवाई करने के निर्देश जारी किए हैं। प्रकरण के मुताबिक छतरपुर के सारणी दरवाजा निवासी अमीर अली और फरीदा बानो का निकाह वर्ष 2006 में मुस्लिम रीति-रिवाज से हुआ था। कुछ समय बाद वैवाहिक विवाद के बाद फरीदा अपने मायके में रहने लगी। इस बीच अमीर अली ने फैमिली कोर्ट में तलाक के लिए आवेदन किया, जिस पर फरीदा ने भरण पोषण की मांग की। मामले में सुनवाई के बाद फैमिली कोर्ट ने 2 सितंबर 2024 को आदेश दिया था कि पति हर माह 2 हजार रुपए भरण पोषण और 3 सौ रुपए मुकदमा खर्च दे। सुनवाई पर ही जब पति ने गरीबी का हवाला देकर यह राशि जमा नहीं की, तो निचली अदालत ने 9 मई 2025 को उसकी तलाक याचिका ही खारिज कर दी थी। निचली अदालत के इस फैसले के विरुद्ध अमीर अली ने उच्च न्यायालय की शरण ली थी। उच्च न्यायालय में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अमीर अली की ओर से पक्ष रखते हुए अधिवक्ता राजेन्द्र यादव ने दलील दी कि आवेदक मजदूरी करके जीवन यापन करता है और इतनी राशि देने में सक्षम नहीं है। संयुक्तपीठ ने उक्त दलीलों को सुनने के बाद माना कि आर्थिक स्थिति खराब होने की वजह से किसी का मुख्य मुकदमा बंद नहीं किया जाना चाहिए। इसके बाद न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि केवल आर्थिक तंगी या गरीबी के आधार पर किसी व्यक्ति को कानूनी न्याय पाने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता। इस मत के साथ न्यायालय ने छतरपुर की फैमिली कोर्ट द्वारा पति की तलाक याचिका को खारिज करने वाले पुराने आदेश को निरस्त कर दिया। न्यायालय ने अब दोनों पक्षों को 6 अप्रैल 2026 को छतरपुर फैमिली कोर्ट में हाजिर होने को कहा है। जहां अब तलाक के मुकदमे की कार्यवाही मेरिट के आधार पर आगे बढ़ाई जाएगी। ईएमएस / 29 मार्च 26