चुनाव की दहलीज पर खड़े उत्तराखंड में मौसम की तरह बदलती राजनीति देहरादून (ईएमएस)। आज कल उत्तराखंड में सबकुछ दिख तो ठीक रहा है लेकिन ठीक लग नहीं रहा है। चुनाव की दहलीज पर खड़े उत्तराखंड में बदलते मौसम की तरह रोज राजनीतिक माहौल बदलता दिख रहा है। कभी कांग्रेस की अंदरूनी कलह तो कभी भाजपा के खेवनहारों की नाराजगी इस छोटे से राज्य में सियासी समीकरण के ग्राफ को समुंदर की लहरों की तरह लहराते हुए देखा जा रहा है। प्रस्तावित विधानसभा चुनाव के एक वर्ष शेष है कहा जा सकता है राज्य चुनाव के मूड में आ चुका है। एक तरफ सत्ता से नाराजगी को दूर करने के लिए मंत्रिमंडल विस्तार किया गया तो दूसरी तरफ सत्ता में वापसी के लिए कांग्रेस ने भाजपा के कुछ पूर्व दिग्गजों को शामिल कर चुनावी बिगुल फूँक दिया है लेकिन दोनों निर्णय सार्थक साबित होते नजर नहीं आ रहे है दोनों निर्णय से दोनों पार्टियों में नाराजगी, असंतोष और दिखाई दे रहा है। अगर बात करे कांग्रेस की तो आधा दर्जन नेताओं के आने से जहाँ पार्टी तो मजबूत दिख रही है लेकिन कुछ पुराने नेता जरूर नाराज दिख रहे हैं। बात करे भाजपा की तो भाजपा ने मंत्रिमंडल विस्तार कर सामंजस बैठाने का प्रयास जरूर किया, लेकिन उसका “साइड इफेक्ट” भी सामने दिखने लगा है। शुरुआत करते हैं धनसिंह रावत से चुनावी समर के अंतिम चरण में उनसे महत्वपूर्ण विभाग लेकर चाहे जो भी राजनीतिक समीकरण साधने का प्रयास हुआ हो, लेकिन मुख्यमंत्री की दावेदारी कर रहे धनसिंह को बड़ा झटका धीरे से लगा है। विनोद चमोली जोकि लगातार सरकार की जयजय कार मंत्री बनने के लिए कर रहे थे और वह मान कर भी चल रहे थे की विस्तार में प्रथम श्रेणी में वह शामिल हैं लेकिन बुलावा न आने से उन्होंने जयकारा बंद कर दिया। उसी तरह अरविंद पांडेय, मुन्ना सिंह चैहान, बिशन सिंह चुफाल जैसे लोगो की नाराजगी भी सामने आ रही है। मंत्रिमंडल विस्तार पर विधायक दिलीप सिंह रावत दो कदम आगे बढ़ कर मंत्रिमंडल विस्तार को ही कटघरे में खड़ा कर दिया। एक तरफ अपने लोगो की नाराजगी दूसरी तरह अपनों का टूट टूट कर कांग्रेस में जाना कहीं से भी न तो भाजपा सरकार के लिए अच्छा है न तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए शुभ संकेत हैं। कहते है सत्ता का संचालन चार वर्ष अपने मन से किया जाता है तो अंतिम एक वर्ष राजनीतिक रणनीति के अनुसार ही किया जाय तभी सत्ता में वापसी का मार्ग प्रशस्त होता हैं । समय ज्यादा शेष नहीं है चुनौतियाँ एक नहीं अनेक हैं बस राजनीतिक सोच को चुनावी रणनीति के अनुसार निर्णय लेने की जरूरत है। नहीं तो राजनीति दुबारा मौका नहीं देती। चुनाव में जाना है तो याद रखना होगा सावधानी हटी दुर्घटना घटी। शैलेन्द्र नेगी/ईएमएस/29 मार्च 2026