वाशिंगटन (ईएमएस)। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सनक ने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है। खुद अमेरिका उनका विरोध कर रहे हैं और महायुद्ध के लिए ट्रंप को जिम्मेदार मान रहे हैं। इसके बाद भी उनकी जंगी सनक कम होने का नाम नहीं ले रही है। हालात ये हैं दोनों देश महायुद्ध की तरफ बढ़ रहे हैं इससे महाविनाश की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता है। बढ़ते तनाव को देखते हुए अमेरिका ने क्षेत्र में अपनी सैन्य उपस्थिति को बड़े स्तर पर बढ़ाते हुए 3,500 से अधिक अतिरिक्त सैनिकों की तैनाती कर दी है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड ने पुष्टि की है कि आधुनिक युद्धपोत यूएसएस त्रिपोली अपने निर्धारित ऑपरेशनल जोन में पहुंच चुका है। इस युद्धपोत पर लगभग 2,500 मरीन सैनिक सवार हैं, जो किसी भी आपात स्थिति से निपटने के लिए तैयार हैं। यूएसएस त्रिपोली की तैनाती सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जा रही है, क्योंकि यह युद्धपोत एफ-35 स्टील्थ फाइटर जेट और ओस्प्रे जैसे अत्याधुनिक विमानों को ऑपरेट करने में सक्षम है। इसे विशेष रूप से जापान से हटाकर मिडल ईस्ट भेजा गया है। इसके अतिरिक्त, यूएसएस बॉक्सर और सैन डिएगो से अन्य नौसैनिक इकाइयों को भी युद्ध क्षेत्र की ओर रवाना किया गया है। अमेरिकी सेंट्रल कमांड के आंकड़ों के अनुसार, ऑपरेशन एपिक फ्यूरी के तहत अब तक 11,000 से अधिक ठिकानों पर हमले किए जा चुके हैं, जो इस संघर्ष की भयावहता को दर्शाते हैं। हालात तब और बिगड़ गए जब ईरान ने सऊदी अरब स्थित प्रिंस सुल्तान एयर बेस पर बैलिस्टिक मिसाइलों और ड्रोनों से सीधा हमला किया। इस हमले में कम से कम 10 अमेरिकी सैनिकों के घायल होने की खबर है, जिससे तनाव अब सीधे सैन्य टकराव में बदलता दिख रहा है। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने स्पष्ट किया है कि अमेरिका बिना जमीनी सेना उतारे अपने लक्ष्यों को हासिल करना चाहता है, लेकिन उन्होंने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को बदलते घटनाक्रम के प्रति सतर्क रहने की सलाह दी है। इस बीच, यमन के हूती विद्रोहियों ने इजरायल पर मिसाइल दागकर इस संघर्ष को और अधिक पेचीदा बना दिया है। इस युद्ध का असर अब वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी दिखने लगा है। हूतियों की सक्रियता से बाब-अल-मंडेब और स्वेज नहर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग असुरक्षित हो गए हैं। स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के लगभग बंद होने से वैश्विक व्यापार और हवाई मार्गों को वैकल्पिक रास्तों की तलाश करनी पड़ रही है। कूटनीतिक मोर्चे पर भी फिलहाल निराशा ही हाथ लगी है। अमेरिका द्वारा प्रस्तावित सीजफायर समझौते, जिसमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर रोक की शर्त थी, को ईरान ने सिरे से खारिज कर दिया है। ईरान ने बदले में भारी मुआवजे और अपनी संप्रभुता को पूर्ण मान्यता देने की मांग रखी है, जिससे शांति की संभावनाएं धूमिल होती नजर आ रही हैं। वीरेंद्र/ईएमएस 30 मार्च 2026