यरूशलेम,(ईएमएस)। यहां चर्च ऑफ द होली सेपल्चर के बाहर रविवार को एक अभूतपूर्व घटना घटी, जिसने ईसाई जगत और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में हलचल मचा दी है। इजराइली पुलिस ने वेटिकन के वरिष्ठ कार्डिनल पियरबतिस्ता पिज्जाबल्ला को रविवार की प्रार्थना सभा (संडे मास) के लिए चर्च में प्रवेश करने से रोक दिया। सदियों के इतिहास में यह संभवतः पहला मौका है जब किसी उच्च पदस्थ कार्डिनल को ईसाई धर्म के इस सबसे पवित्र स्थल में प्रवेश करने से वंचित किया गया हो। हालांकि, विवाद के तूल पकड़ने और अंतरराष्ट्रीय दबाव के बाद रविवार रात प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उन्हें अंदर जाने की अनुमति प्रदान की। यरूशलेम के लैटिन पैट्रिआर्केट के प्रमुख कार्डिनल पिज्जाबल्ला को उस समय रोका गया जब वे बिना किसी औपचारिक जुलूस या भीड़ के, निजी तौर पर धार्मिक अनुष्ठान के लिए आगे बढ़ रहे थे। चर्च प्रशासन के अनुसार, उनके साथ मोस्ट रेवरेंड फादर फ्रांसेस्को इलपो भी मौजूद थे। इजराइल के इस कड़े रुख ने इटली के साथ उसके द्विपक्षीय संबंधों में दरार पैदा कर दी है। इटली के विदेश मंत्री एंटोनियो ताजानी ने इस घटना पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इजराइली राजदूत को तलब किया और स्पष्टीकरण की मांग की है। प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने इस कार्रवाई का बचाव करते हुए इसे सुरक्षा कारणों से जोड़ा है। उन्होंने सोशल मीडिया पर स्पष्ट किया कि क्षेत्र में जारी सैन्य संघर्ष और सुरक्षा खतरों के मद्देनजर होम फ्रंट कमांड ने सुरक्षात्मक निर्देश जारी किए हैं। नेतन्याहू के अनुसार, पुराने शहर के सभी पवित्र स्थलों पर जान बचाने के उद्देश्य से कड़े प्रतिबंध लागू किए गए हैं, जो समान रूप से यहूदी, ईसाई और मुस्लिम स्थलों पर प्रभावी हैं। प्रधानमंत्री ने कहा कि जैसे ही उन्हें कार्डिनल के साथ हुई घटना की जानकारी मिली, उन्होंने तुरंत अधिकारियों को निर्देश देकर उन्हें धार्मिक अनुष्ठान करने की अनुमति सुनिश्चित कराई। ईसाई धर्म में इस घटना को लेकर गहरा आक्रोश देखा जा रहा है। वेटिकन और अन्य ईसाई संस्थाओं ने इसकी कड़ी निंदा की है। यरूशलेम ईसाइयों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है और चर्च ऑफ द होली सेपल्चर को वह स्थान माना जाता है जहाँ ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था। इजराइल ने युद्ध शुरू होने के बाद से ही बड़े जमावड़ों पर पाबंदी लगा रखी है, जिसके तहत अल-अक्सा मस्जिद में भी नमाज पर प्रतिबंध लागू हैं। जानकारों का मानना है कि पवित्र स्थलों पर इस तरह की पाबंदियां धार्मिक भावनाओं को भड़का सकती हैं और पहले से ही अस्थिर क्षेत्र में तनाव को और अधिक बढ़ा सकती हैं। वीरेंद्र/ईएमएस/30मार्च2026