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30-Mar-2026
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-आलोचना और असहमति लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा - दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी नई दिल्ली (ईएमएस)। दिल्ली हाई कोर्ट ने धार्मिक वक्ता अनिरुद्धाचार्य के व्यक्तित्व अधिकारों को अंतरिम संरक्षण देते हुए महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि आलोचना और असहमति लोकतांत्रिक समाज का हिस्सा हैं, और जब तक कोई सामग्री स्पष्ट रूप से मानहानिकारक या अपमानजनक न हो, तब तक उस पर मुकदमा उचित नहीं माना जा सकता। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा, “आदि शंकराचार्य ने कभी मानहानि के मुकदमे दायर नहीं किए, वे वाद-विवाद के माध्यम से अपनी बात रखते थे और विरोधियों को तर्क से जवाब देते थे।” न्यायालय ने यह भी कहा कि जो व्यक्ति किसी दर्शन या विचारधारा का प्रचार करता है, उसे आलोचना और विरोध का सामना करने के लिए तैयार रहना चाहिए। कोर्ट ने अनिरुद्धाचार्य से कहा कि उन्हें अपनी छवि और प्रतिष्ठा से ऊपर रहना चाहिए, क्योंकि धार्मिक गुरु होने के नाते समाज उनसे यही अपेक्षा करता है। साथ ही कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि इस मामले में दिल्ली हाई कोर्ट का ही क्षेत्राधिकार क्यों चुना गया, जबकि अन्य अदालतें भी समान आदेश देने में सक्षम हैं। मामले में अनिरुद्धाचार्य की ओर से दलील दी गई कि सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म पर उनके खिलाफ आपत्तिजनक और एआई-जनित (डीपफेक) सामग्री प्रसारित की जा रही है, जिससे उनकी छवि प्रभावित हो रही है। इस पर कोर्ट ने यूट्यूब सहित संबंधित प्लेटफॉर्म से कुछ विवादित सामग्री हटाने पर विचार किया। अदालत ने फिलहाल सीमित राहत देते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और व्यक्तित्व अधिकारों के बीच संतुलन बनाए रखना जरूरी है।