लेख
31-Mar-2026
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जीवन अपने आप में एक अनवरत प्रवाह है, जिसमें सुख और दुःख दोनों ही साथ-साथ चलते हैं। जैसे दिन और रात का क्रम कभी रुकता नहीं, उसी प्रकार जीवन में प्रसन्नता और पीड़ा का आना-जाना भी स्वाभाविक है। मनुष्य सामान्यतः सुख की इच्छा करता है और दुःख से बचना चाहता है, परंतु यह सत्य है कि दुःख भी जीवन का अभिन्न अंग है। यदि हम केवल सुख की अपेक्षा करें और दुःख आने पर विचलित हो जाएँ, तो हम जीवन के वास्तविक स्वरूप को समझ ही नहीं पाते। जीवन का सौंदर्य इसी में है कि हम हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखें और मुस्कराते हुए आगे बढ़ते रहें। मनुष्य को प्रकृति ने विवेक और बुद्धि का अद्भुत वरदान दिया है। यही कारण है कि वह कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी समाधान खोज सकता है। यदि वह चाहे तो दुःख को भी सीख में बदल सकता है और पीड़ा को प्रेरणा में परिवर्तित कर सकता है। जिस प्रकार गंदगी से ऊर्जा उत्पन्न की जा सकती है और अनुपयोगी वस्तुओं से उपयोगी वस्तुएँ बनाई जा सकती हैं, उसी प्रकार मनुष्य अपने जीवन के दुःखों को भी सकारात्मक दिशा दे सकता है। यह सब उसकी सोच और दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। दुःख का मूल कारण बाहर नहीं, बल्कि भीतर छिपा होता है। जब मनुष्य अपने कर्तव्यों से विमुख हो जाता है, जब वह असावधानी और प्रमाद में जीने लगता है, तब वह स्वयं अपने दुःखों का कारण बनता है। प्रमाद का अर्थ है, वास्तविकता को न समझना, गलत को सही मान लेना और अपने विवेक का उपयोग न करना। जब हम अपने भीतर के इस प्रमाद को पहचान लेते हैं और उससे ऊपर उठने का प्रयास करते हैं, तब हम अपने जीवन को नई दिशा दे सकते हैं। यह समझना अत्यंत आवश्यक है कि रोना या विलाप करना किसी समस्या का समाधान नहीं है। दुःख आने पर यदि हम निराश होकर बैठ जाएँ, तो हम स्वयं को और अधिक कमजोर बना लेते हैं। इसके विपरीत यदि हम धैर्य और साहस के साथ परिस्थितियों का सामना करें, तो वही दुःख हमारे लिए शक्ति का स्रोत बन सकता है। जो व्यक्ति कठिनाइयों में भी मुस्कराना सीख लेता है, वही सच्चे अर्थों में जीवन का आनंद उठा पाता है। इतिहास और धर्मग्रंथों में ऐसे अनेक उदाहरण मिलते हैं, जिन्होंने अत्यंत कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य और समता का परिचय दिया। उन्होंने अपने दुःखों को अपने ऊपर हावी नहीं होने दिया, बल्कि उन्हें आत्मविकास का माध्यम बनाया। यही कारण है कि वे आज भी आदर्श के रूप में स्मरण किए जाते हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि दुःख स्थायी नहीं होते, वे भी समय के साथ समाप्त हो जाते हैं। इसलिए हमें उनसे घबराने के बजाय उनका सामना करना चाहिए। जीवन में असफलता और कठिनाई का आना भी उतना ही आवश्यक है जितना सफलता का। यदि जीवन में केवल सुख ही सुख हो, तो उसका कोई विशेष महत्व नहीं रह जाता। दुःख ही वह भूमि है, जहाँ से सुख के पुष्प खिलते हैं। जैसे कीचड़ में कमल खिलता है, उसी प्रकार दुःख की परिस्थितियाँ ही हमें मजबूत बनाती हैं और सफलता का वास्तविक मूल्य समझाती हैं। इसलिए हमें दुःख को शत्रु नहीं, बल्कि मित्र की तरह स्वीकार करना चाहिए, जो हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देता है। समत्व भाव का अर्थ है, हर परिस्थिति में संतुलित रहना। जब हम सुख में अत्यधिक उत्साहित नहीं होते और दुःख में अत्यधिक विचलित नहीं होते, तब हम समत्व की अवस्था में पहुँचते हैं। यह अवस्था हमें आंतरिक शांति प्रदान करती है और हमें स्थिर बनाती है। समत्व का अभ्यास करने से हम जीवन के उतार-चढ़ाव को सहजता से स्वीकार कर पाते हैं। दृष्टिकोण का परिवर्तन भी जीवन को बदल सकता है। जब हम अपनी सोच को सकारात्मक बनाते हैं, तो वही परिस्थितियाँ, जो पहले हमें दुःखद लगती थीं, अब हमें अवसर के रूप में दिखाई देने लगती हैं। यदि हम हर घटना में कुछ अच्छा खोजने का प्रयास करें, तो हमें जीवन में निराशा का अनुभव नहीं होगा। यह दृष्टि हमें भीतर से मजबूत बनाती है और हमें आत्मविश्वास से भर देती है। एक प्रेरणादायक तथ्य यह भी है कि समय हर घाव को भर देता है। चाहे दुःख कितना भी बड़ा क्यों न हो, समय के साथ उसकी तीव्रता कम हो जाती है। यदि हम धैर्य बनाए रखें और अपने मन को सकारात्मक कार्यों में लगाएँ, तो हम धीरे-धीरे उस दुःख से बाहर निकल सकते हैं। इसलिए कठिन समय में धैर्य रखना अत्यंत आवश्यक है। जीवन का वास्तविक आनंद तभी प्राप्त होता है, जब हम उसे पूरे उत्साह और सकारात्मकता के साथ जीते हैं। यदि हम हर छोटी-बड़ी बात पर निराश हो जाएँ, तो हम जीवन की सुंदरता को महसूस ही नहीं कर पाएँगे। इसके विपरीत यदि हम हर परिस्थिति में मुस्कराने का प्रयास करें, तो जीवन हमें अधिक सरल और सुखद प्रतीत होगा। अंततः यही कहा जा सकता है कि दुःख और सुख दोनों ही जीवन के शिक्षक हैं। दुःख हमें सहनशीलता, धैर्य और आत्मबल सिखाता है, जबकि सुख हमें संतोष और प्रसन्नता का अनुभव कराता है। यदि हम दोनों को समान भाव से स्वीकार कर लें, तो हम जीवन के वास्तविक आनंद को प्राप्त कर सकते हैं। मुस्कराना केवल एक भाव नहीं, बल्कि एक कला है, जिसे अपनाकर हम अपने जीवन को सार्थक बना सकते हैं। इसलिए आवश्यक है कि हम हर परिस्थिति में मुस्कराना सीखें, अपने मनोबल को मजबूत रखें और जीवन के हर अनुभव को सीख के रूप में स्वीकार करें। यही जीवन का सच्चा आनंद है और यही सच्ची सफलता भी। (वरिष्ठ पत्रकार, साहित्यकार स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 31 मार्च /2026