संकट भरे विश्व युद्ध के कगार पर खड़ी दुनिया में भारत अपने मित्र पडोसी देशों के लिए संकटमोचक बड़े भाई की भूमिका निबाह रहा है। तनाव के इस दौर में, जब पश्चिम एशिया में बढ़ते संघर्ष ने पूरी दुनिया की ऊर्जा आपूर्ति को झकझोर दिया है, ऐसे समय में भारत ने एक बार फिर अपनी परंपरागत नीति विश्व एक परिवार के आदर्श को व्यवहार में उतारकर दिखाया है। ईरान-इजरायल युद्ध के बीच दुनिया भर के देश में तेल और एलपीजी गैस की किल्लत से दो चार हो रहे हैं. हालांकि, भारत जैसे मित्र देशों के लिए ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद नहीं किया है. भारत में लगातार तेल और एलपीजी की आपूर्ति हो रही है. अभी तक कई जहाज भारत पहुंच भी चुके हैं. लेकिन भारत के कई पड़ोसी देशों में हालात बहुत चिंताजनक है. श्रीलंका भी इन दिनों तेल की आपूर्ति को लेकर चिंतित है. ऐसी स्थिति में श्रीलंका की मदद भारत कर रहा है। आपको बता दें कि युद्ध और होरमुज स्टेट में बढ़ते तनाव के कारण तेल और एलपीजी की सप्लाई बाधित हो रही है, जिससे दुनिया के कई देश गंभीर संकट का सामना कर रहे हैं। इस वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने अपने पड़ोसी देशों के लिए एक भरोसेमंद और जिम्मेदार साथी के रूप में भूमिका निभाई है। हालांकि भारत का यह रवैया कोई नया नहीं है। सदियों से भारतीय सभ्यता सर्वे भवन्तु सुखिनः जैसे सिद्धांतों पर अमल की रही है। आज जब वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएं टूट रही हैं और देश अपने-अपने हितों में सिमटते नजर आ रहे हैं, भारत ने इसके विपरीत एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाया है, जहां केवल राष्ट्रीय हित ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता और सहयोग भी प्राथमिकता में हैं। आपको पता है कि मौजूदा घटनाक्रम में श्रीलंका को भारत द्वारा 38,000 मीट्रिक टन पेट्रोलियम उत्पादों की आपूर्ति इसी सोच का प्रमाण है। इसमें 20,000 मीट्रिक टन डीजल और 18,000 मीट्रिक टन पेट्रोल शामिल है। यह आपूर्ति ऐसे समय में की गई, जब श्रीलंका पश्चिम एशिया से तेल की आपूर्ति बाधित होने के कारण गंभीर संकट में था। श्रीलंका के राष्ट्रपति कुमारा दिसानायके और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हुई बातचीत के बाद यह सहायता तुरंत भेजी गई। यह केवल एक कूटनीतिक कदम नहीं, बल्कि आपसी विश्वास और सहयोग का प्रतीक है। इससे पहले विदेश मंत्री एस. जयशंकर और श्रीलंका के विदेश मंत्री विजिता हेराथ के बीच भी बातचीत हुई थी, जिसने इस सहयोग को और मजबूत आधार दिया। भारत ने इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन के माध्यम से यह आपूर्ति सुनिश्चित की, जिससे श्रीलंका में ऊर्जा संकट को तत्काल राहत मिली। भारत की नेबरहुड फर्स्ट नीति केवल एक कूटनीतिक नारा नहीं, बल्कि एक सक्रिय और प्रभावी रणनीति के रूप में सामने आई है। श्रीलंका के अलावा भारत ने बांग्लादेश और मालदीव जैसे देशों को भी समय-समय पर ऊर्जा सहायता प्रदान की है। बांग्लादेश में भी हालात चुनौतीपूर्ण हैं।याद रहे भारत ने बांग्लादेश को अतिरिक्त 5,000 टन डीजल की सप्लाई की है. इस तरह हाल के दिनों में भारत से बांग्लादेश को कुल 15,000 टन डीजल मिल चुका है. ईरान-अमेरिका-इजरायल तनाव और होर्मुज स्टेट में व्यवधान के कारण वहां ईंधन संकट गहराता जा रहा है। ऐसे में भारत ने अतिरिक्त 5,000 टन डीजल की आपूर्ति कर तत्काल राहत पहुंचाई थी। हाल के समय में कुल 15,000 टन डीजल की आपूर्ति भारत द्वारा की जा चुकी है। यह सहयोग केवल संकट प्रबंधन नहीं है, बल्कि दीर्घकालिक रणनीतिक संबंधों को मजबूत करने का माध्यम भी है। ऊर्जा क्षेत्र में यह साझेदारी आने वाले समय में दक्षिण एशिया की स्थिरता और विकास के लिए महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। जब दुनिया के कई देश अपने संसाधनों को सुरक्षित रखने में लगे हैं, भारत ने अपने संसाधनों को साझा करने का रास्ता चुना है। यह संवेदनशीलता और जिम्मेदारी भारत को वैश्विक मंच पर अलग पहचान देती है। श्रीलंका के नेताओं चाहे वह सांसद नमल राजपक्षे हों या हां डी सिल्वा ने भारत की इस मदद की खुलकर सराहना की है। यह सराहना केवल शब्दों तक सीमित नहीं है, बल्कि भारत की बढ़ती साख और विश्वास को दर्शाती है। भारत ने पहले भी संकट के समय श्रीलंका की मदद की है, चाहे वह आर्थिक संकट हो या प्राकृतिक आपदा। यही निरंतरता भारत को एक विश्वसनीय मित्र बनाती है। वर्तमान स्थिति केवल एक क्षेत्रीय संकट नहीं है, बल्कि यह वैश्चिक ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न बन चुका है। होमुंज स्ट्रेट, जो दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण तेल मार्गों में से एक है, वहां तनाव का सीधा असर वैश्विक बाजारों पर पड़ रहा है। इस स्थिति में भारत का सक्रिय हस्तक्षेप न केवल पड़ोसी देशों को राहत दे रहा है, बल्कि क्षेत्रीय स्थिरता को भी बनाए रखने में मदद कर रहा है। यह कदम यह भी दर्शाता है कि भारत केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार ऊर्जा साझेदार भी है। हालांकि तत्काल राहत देना जरूरी है, लेकिन इस संकट ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा किया है कि क्या दक्षिण एशिया को ऊर्जा के मामले में अधिक आत्मनिर्भर नहीं होना चाहिए? श्रीलंका ने खुद स्वीकार किया है कि इस तरह के संकट से निपटने के लिए दीर्घकालिक रणनीति की आवश्यकता है। भारत इस दिशा में भी सहयोग कर सकता है चाहे वह नवीकरणीय ऊर्जा हो, क्षेत्रीय ग्रिड कनेक्टिविटी हो या ऊर्जा भंडारण की व्यवस्था। यदि हम हाल के इतिहास पर नजर डालें, तो कोविड-19 महामारी के दौरान भी भारत ने दुनिया के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत किया था। वैक्सीन मैत्री पहल के तहत भारत ने 100 से अधिक देशों को 30 करोड़ से ज्यादा वैक्सीन की आपूर्ति की। यह केवल एक स्वास्थ्य पहल नहीं थी, बल्कि वैश्विक मानवता के प्रति भारत की प्रतिबद्धता का प्रमाण थी। इस अभियान के माध्यम से भारत ने यह दिखाया कि वह केवल अपने नागरिकों के लिए ही नहीं, बल्कि पूरी मानवता के लिए जिम्मेदार है। यह नीति आज भी ऊर्जा संकट जैसे मामलों में स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। हकिकत यह है कि आज के समय में नेतृत्व केवल शक्ति प्रदर्शन से नहीं, बल्कि संकट में साथ खड़े होने से तय होता है। भारत ने अपने कार्यों से यह साबित किया है कि वह केवल एक उभरती आर्थिक शक्ति नहीं, बल्कि एक जिम्मेदार और संवेदनशील राष्ट्र भी है। वसुधैव कुटुम्बकम् केवल एक श्लोक नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति का आधार बनता जा रहा है। जब दुनिया विभाजन और प्रतिस्पर्धा की ओर बढ़ रही है, भारत सहयोग और साझेदारी का रास्ता दिखा रहा है। ऐसे समय में भारत का यह कदम न केवल पड़ोसी देशों के लिए राहत है, बल्कि पूरे विश्व के लिए एक संदेश भी है कि सच्ची शक्ति वही है, जो दूसरों को संभालने में काम आए। भारत की इस नीति में एक खास बात यह है कि इसमें रणनीतिक हित और मानवीय दृष्टिकोण दोनों का संतुलन है। एक ओर जहां भारत अपने पड़ोसियों की मदद करके क्षेत्रीय स्थिरता सुनिश्चित करता है, वहीं दूसरी ओर वह मानवीय मूल्यों को भी प्राथमिकता देता है। ऊर्जा संकट में सहायता देकर भारत ने यह सुनिश्चित किया कि उसके पड़ोसी देशों में आर्थिक और सामाजिक अस्थिरता न बढ़े, क्योंकि इसका असर पूरे क्षेत्र पर पड़ सकता है। कहा जाता है कि सच्चा मित्र वही होता है जो मुश्किल समय में साथ खड़ा हो। भारत ने बार-बार इस कहावत को सही साबित किया है। चाहे कोविड-19 का संकट हो या वर्तमान ऊर्जा संकट, भारत ने हमेशा अपने पड़ोसियों और दुनिया के साथ खड़े होकर यह संदेश दिया है कि वह केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि मानवता का सच्चा साथी है। जनवरी 2021 में, भारत ने चक्रवात यासा से प्रभावित फिजी द्वीप को मानवीय सहायता प्रदान की। संघर्ष की स्थितियों में यमन, सीरिया और अफगानिस्तान जैसे देशों को भी सहायता दी गई है। भारत ने म्यांमार और मोज़ाम्बिक में अन्य आपदाओं में भी सहायता प्रदान की है। आज जब दुनिया अनिश्चितताओं से भरी हुई है, भारत की यह नीति न केवल उसके पड़ोसियों के लिए बल्कि पूरे विश्व के लिए एक प्रेरणा है। आने वाले समय में भी भारत इसी तरह सहयोग और साझेदारी के माध्यम से वैश्विक शांति और स्थिरता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहेगा। श्रीलंका के सांसद नेता नमल राजपक्षा ने भारत की तारीफ की है. उन्होंने कहा कि भारत ने ऐसे मुश्किल समय में भी एक दोस्त की तरह हमारे साथ खड़ा रहा है. मैं भारत को 38 हजार टन पेट्रोलियम देने के लिए उनका धन्यवाद करता हूं.उन्होंने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत की जनता ने एक बार फिर श्रीलंका को 38,000 टन पेट्रोलियम की समय पर आपूर्ति करके पड़ोसी पहले नीति को कायम रखा है। ईएमएस/31/03/2026