मनुष्य जीवन अत्यंत दुर्लभ और अमूल्य है। यह केवल भोग-विलास या क्षणिक सुखों के लिए नहीं मिला, बल्कि आत्मोन्नति, समाज कल्याण और परम शांति की प्राप्ति के लिए प्राप्त हुआ है। फिर भी आज का मनुष्य अपने वास्तविक लक्ष्य से भटकता जा रहा है। इसका सबसे बड़ा कारण है व्यसन। व्यसन केवल एक आदत नहीं है, यह एक ऐसा जाल है जो धीरे-धीरे मनुष्य की चेतना, शक्ति और अस्तित्व को निगल जाता है। इसके विपरीत पुरुषार्थ वह शक्ति है जो मनुष्य को ऊँचाइयों तक पहुँचाती है। इसलिए आवश्यक है कि हम पुरुषार्थ को जगाएं और व्यसनों का त्याग करें। इतिहास गवाह है कि जिसने पुरुषार्थ को अपनाया, उसने असंभव को संभव कर दिखाया। एक साधारण व्यक्ति भी अपने परिश्रम और दृढ़ संकल्प से महान बन सकता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण महात्मा गांधी हैं। जेल में रहते हुए भी उन्होंने अपने कार्य के प्रति जो निष्ठा दिखाई, वह उनके पुरुषार्थ का परिचायक था। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया कि परिस्थितियाँ चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, यदि मनुष्य अपने पुरुषार्थ को नहीं छोड़ता, तो सफलता स्वयं उसके चरण चूमती है। इसके विपरीत जो व्यक्ति व्यसनों के अधीन हो जाता है, उसका जीवन धीरे-धीरे अंधकार में डूबने लगता है। व्यसन मनुष्य की बुद्धि को भ्रष्ट करता है, उसकी सोचने-समझने की क्षमता को समाप्त करता है और उसे गलत निर्णयों की ओर धकेलता है। शराब, तंबाकू, नशा, जुआ और अन्य दुर्व्यसन केवल शरीर को ही नहीं, बल्कि आत्मा को भी कमजोर कर देते हैं। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि व्यसन मृत्यु का द्वार है, क्योंकि यह मनुष्य को धीरे-धीरे नष्ट कर देता है। आज समाज में व्यसनों का विस्तार एक भयावह रूप ले चुका है। हर गली, हर मोड़ पर व्यसनों का बाजार सजा हुआ है। युवा पीढ़ी विशेष रूप से इसकी चपेट में आ रही है। शुरुआत में यह केवल एक प्रयोग के रूप में शुरू होता है, लेकिन धीरे-धीरे यह लत बन जाता है और फिर व्यक्ति इसके बिना जी नहीं पाता। वह अपनी इच्छाओं का दास बन जाता है और उसका आत्मबल समाप्त हो जाता है। यही कारण है कि व्यसन को आत्मा के लिए घातक और जानलेवा कहा गया है। व्यसन का प्रभाव केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, यह उसके परिवार, समाज और पूरे राष्ट्र को प्रभावित करता है। एक व्यसनी व्यक्ति अपने कर्तव्यों को भूल जाता है, अपने परिवार की जिम्मेदारियों से मुँह मोड़ लेता है और आर्थिक रूप से भी कमजोर हो जाता है। इससे परिवार में तनाव, कलह और दुःख का वातावरण बनता है। समाज में अपराध बढ़ते हैं और राष्ट्र की प्रगति बाधित होती है। इस प्रकार व्यसन केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि सामाजिक और राष्ट्रीय समस्या भी है। इसके विपरीत पुरुषार्थ वह शक्ति है जो मनुष्य को इन सभी बुराइयों से बचाती है। पुरुषार्थ का अर्थ केवल शारीरिक परिश्रम नहीं है, बल्कि मानसिक दृढ़ता, आत्मसंयम और सकारात्मक सोच भी है। जो व्यक्ति अपने मन और इंद्रियों पर नियंत्रण रखता है, वही सच्चा पुरुषार्थी होता है। वह कठिनाइयों से नहीं डरता, बल्कि उनका सामना करता है और उन्हें अवसर में बदल देता है। भगवान महावीर ने भी पुरुषार्थ और आत्मसंयम पर विशेष बल दिया है। उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने भीतर की शक्तियों को पहचानना चाहिए और उन्हें सही दिशा में लगाना चाहिए। उन्होंने व्यसनों से दूर रहने और संयमित जीवन जीने का संदेश दिया। उनके अनुसार सच्ची स्वतंत्रता वही है, जो मनुष्य को अपने मन और इंद्रियों पर विजय प्राप्त करने से मिलती है। आज आवश्यकता है कि हम अपने जीवन में इस सत्य को समझें और अपनाएं। हमें यह स्वीकार करना होगा कि व्यसन हमें केवल विनाश की ओर ले जाते हैं, जबकि पुरुषार्थ हमें विकास और उन्नति की ओर ले जाता है। हमें अपने जीवन में ऐसे संकल्प लेने होंगे, जो हमें व्यसनों से दूर रखें और पुरुषार्थ के मार्ग पर आगे बढ़ाएं। व्यसन छोड़ना आसान नहीं है, लेकिन यह असंभव भी नहीं है। इसके लिए दृढ़ इच्छा शक्ति और निरंतर प्रयास की आवश्यकता होती है। सबसे पहले हमें यह समझना होगा कि व्यसन हमारे लिए हानिकारक है और हमें इसे छोड़ना ही होगा। इसके बाद हमें अपने जीवन में सकारात्मक आदतों को शामिल करना चाहिए, जैसे नियमित व्यायाम, ध्यान, अध्ययन और अच्छे लोगों का संग। यह सब हमें व्यसन से दूर रखने में सहायक होते हैं। साथ ही समाज और सरकार को भी इस दिशा में प्रयास करने होंगे। व्यसन मुक्ति के लिए जागरूकता फैलाना, नशा विरोधी अभियान चलाना और युवाओं को सही दिशा देना अत्यंत आवश्यक है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण भूमिका व्यक्ति की स्वयं की होती है। जब तक व्यक्ति स्वयं नहीं जागेगा, तब तक कोई भी प्रयास सफल नहीं हो सकता। अंततः यही कहा जा सकता है कि जीवन का वास्तविक आनंद पुरुषार्थ में है, व्यसन में नहीं। जो व्यक्ति अपने जीवन को सार्थक बनाना चाहता है, उसे व्यसनों का त्याग करके पुरुषार्थ का मार्ग अपनाना होगा। यही मार्ग उसे सच्ची सफलता, शांति और संतोष प्रदान करेगा। इसलिए आइए, हम सब मिलकर यह संकल्प लें कि हम अपने जीवन से सभी प्रकार के व्यसनों को दूर करेंगे और पुरुषार्थ को अपनाकर अपने जीवन को महान बनाएंगे। यही हमारे जीवन की सच्ची दिशा और उद्देश्य होना चाहिए। (L 103 जलवंत टाऊनशिप पूणा बॉम्बे मार्केट रोड, नियर नन्दालय हवेली सूरत मो 99749 40324 वरिष्ठ पत्रकार साहित्यकार स्तम्भकार) ईएमएस / 02 अप्रैल 26