लेख
06-Apr-2026
...


(7 अप्रैल विश्व स्वास्थ्य दिवस) हमारे बड़े-बुजुर्ग हमेशा से कहते आए हैं कि पहला सुख निरोगी काया, लेकिन आज की हकीकत को देखकर तो ऐसा लगता है कि अब निरोगी वही रह सकता है जिसकी जेब में मोटा पैसा हो। भारत जैसे देश में, जहाँ आज भी एक बड़ी आबादी छोटी-सी बीमारी के इलाज के खर्च से घबराती है, वहाँ विश्व स्वास्थ्य दिवस जैसे आयोजन महज औपचारिकता बनकर रह गए हैं। असलियत तो यह है कि आज के दौर में जान है तो जहान है वाली बात अब अस्पतालों के भारी-भरकम बिलों के बीच कहीं दम तोड़ती नजर आती है। क्या हम वास्तव में स्वस्थ हो रहे हैं या सिर्फ दवाइयों के ऐसे जाल में उलझते जा रहे हैं जिसका दूसरा सिरा कंगाली की ओर जाता है? आज चिकित्सा का पूरा क्षेत्र चकाचौंध भरे कारोबार में बदल चुका है। बड़े शहरों में फाइव स्टार होटलों जैसे दिखने वाले अस्पताल तो खड़े हो गए हैं, लेकिन वहां का दरवाजा खटखटाने से पहले एक आम आदमी दस बार अपनी खाली जेब टटोलता है। मध्यमवर्गीय परिवारों की बरसों की गाढ़ी कमाई एक गंभीर बीमारी के इलाज में चंद दिनों में हवा हो जाती है। हमारे यहाँ कहावत है गरीबी में आटा गीला, और आज के दौर में बीमारी वही काम कर रही है। सरकारी अस्पतालों की बदहाली किसी से छिपी नहीं है, जहाँ लंबी कतारें और संसाधनों की कमी मजबूरन आदमी को निजी अस्पतालों की लूट की तरफ धकेल देती है। चिकित्सा की संवेदनशीलता किस कदर खत्म हो रही है, इसका कड़वा अनुभव मुझे हाल ही में एक सामान्य खांसी के दौरान हुआ। एक मामूली खांसी के इलाज के लिए मुझे महीने भर के भीतर तीन डॉक्टर बदलने पड़े, क्योंकि हर बार मर्ज कम होने के बजाय दवाओं का बोझ और जांचों की लंबी फेहरिस्त बढ़ती गई। विडंबना देखिए कि आज डॉक्टर का आश्वासन मरीज को ढांढस बंधाने के बजाय उसकी चिंता और बीमारियां बढ़ा देता है। डॉक्टर अब मरीज की नब्ज से ज्यादा उसकी आर्थिक हैसियत टटोलते नजर आते हैं। जब एक छोटी-सी खांसी के लिए इंसान को हफ़्तों भटकना पड़े और भारी-भरकम फीस चुकानी पड़े, तो अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी गंभीर बीमारी में एक आम आदमी की रूह कितनी कांपती होगी। आज डॉक्टर और मरीज के बीच का वह पवित्र भरोसा व्यावसायिकता की भेंट चढ़ चुका है। गाँवों की स्थिति और भी विकट है, जहाँ प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र अक्सर खुद ही बीमार नजर आते हैं। वहाँ विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी के कारण नीम-हकीमों का धंधा फल-फूल रहा है और बेचारा ग्रामीण मरीज शहर के चक्कर काटते-काटते अपनी जमीन-जायदाद तक से हाथ धो बैठता है। चिकित्सा व्यवस्था का ऐसा चरमराना केवल एक विभाग की विफलता नहीं, बल्कि हमारे सामाजिक ताने-बाने पर एक बड़ा प्रश्नचिन्ह है। दवाइयों की पर्ची अब एक डरावने बिल की तरह लगती है जिसे देख मरीज का आधा खून सूख जाता है। सरकारी तंत्र की ढिलाई ने गली-मोहल्लों में ऐसे क्लीनिक खड़े कर दिए हैं जो इलाज के नाम पर सिर्फ वक्त और पैसा बर्बाद करते हैं। रसूखदारों के लिए तो यहाँ हर बिस्तर खाली है, लेकिन एक लाचार नागरिक के लिए सरकारी अस्पताल के स्ट्रेचर तक पहुंचना भी किसी जंग को जीतने जैसा है। क्या हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहाँ साँसों की कीमत केवल नोटों के बंडल तय करेंगे? संवेदनहीनता का यह वायरस आज चिकित्सा जगत की सबसे बड़ी बीमारी बन चुका है, जिसका इलाज किसी अस्पताल के पास नहीं है। निजी अस्पतालों में कमीशन का खेल और दवाओं के नाम पर जो लूट चल रही है, वह किसी आम नागरिक के पल्ले नहीं पड़ती। अंधेर नगरी चौपट राजा वाली तर्ज पर दवाओं के दाम और इलाज का खर्च आज एक ऐसी कड़वी सच्चाई बन चुके हैं, जो किसी भी हंसते-खेलते परिवार को कर्ज के गहरे गड्ढे में धकेल सकते हैं। शारीरिक बीमारियों के साथ-साथ आजकल मानसिक तनाव, शुगर और बीपी जैसी बीमारियाँ घर-घर की कहानी बन गई हैं। प्रदूषण और मिलावटी खान-पान हमारे शरीर में धीरे-धीरे जहर घोल रहे हैं और हम बीमार होने के बाद लाखों लुटाने को तो तैयार हैं, लेकिन स्वस्थ रहने के लिए अपनी आदतों में बदलाव करने को तैयार नहीं हैं। स्वास्थ्य सेवाओं का इस तरह अंधाधुंध निजीकरण होना हमारे लोकतंत्र एवं समाज के लिए एक बड़ी चुनौती है। स्वास्थ्य कोई बाजार में बिकने वाली लग्जरी चीज नहीं है जिसे केवल रईस लोग ही खरीद सकें, बल्कि यह हर नागरिक का संवैधानिक हक है। सरकार को स्वास्थ्य बजट में कंजूसी छोड़नी होगी और दवाओं के दाम पर कड़ा हंटर चलाना होगा। डॉक्टरों को भी उस शपथ की लाज रखनी होगी जो उन्होंने इस पेशे में कदम रखते समय ली थी। असली स्वस्थ भारत तभी बनेगा जब इलाज किसी के लिए कंगाली का कारण न बने। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 06 अप्रैल 26