- स्वास्थ्य का विज्ञान, समानता का आधार (विश्व स्वास्थ्य दिवस (7 अप्रैल) पर विशेष) दुनिया के प्रत्येक व्यक्ति को स्वास्थ्य के प्रति जागरूक करने और वैश्विक स्वास्थ्य मानकों में सुधार लाने के उद्देश्य के साथ विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के बैनर तले प्रतिवर्ष 7 अप्रैल को एक खास थीम के साथ ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाया जाता है। इस दिवस को मनाए जाने का प्रमुख उद्देश्य स्वास्थ्य को लेकर विश्व में प्रत्येक व्यक्ति को बीमारियों के प्रति जागरूक करना, लोगों के स्वास्थ्य स्तर को सुधारना और हर व्यक्ति को इलाज की अच्छी स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराना ही है। पूरी दुनिया इस साल ‘स्वास्थ्य के लिए एकजुट रहें, विज्ञान के साथ खड़े रहें’ विषय के साथ 76वां विश्व स्वास्थ्य दिवस मना रही है। यदि पिछले कुछ वर्षों की स्वास्थ्य दिवस की थीम पर नजर डालें तो 2025 का विषय था ‘स्वस्थ शुरुआत, आशापूर्ण भविष्य’, 2024 में यह दिवस ‘मेरा स्वास्थ्य, मेरा अधिकार’, 2023 में ‘सभी के लिए स्वास्थ्य’, 2022 में ‘हमारा ग्रह, हमारा स्वास्थ्य’, 2021 में ‘सभी के लिए एक निष्पक्ष, स्वस्थ दुनिया का निर्माण’, 2020 में ‘नर्सों और दाईयों का समर्थन करें’ तथा 2019 में ‘सार्वभौमिक स्वास्थ्य: हर कोई, हर जगह’ विषय के साथ मनाया गया था। इस वर्ष का विषय न केवल वैश्विक सहयोग को सुदृढ़ करने का आह्वान करता है बल्कि भ्रामक सूचनाओं के इस दौर में वैज्ञानिक प्रमाणों पर जन-विश्वास को पुनर्स्थापित करने और साक्ष्य-आधारित नीतियों के माध्यम से मानवता की रक्षा करने पर केंद्रित है। ‘विश्व स्वास्थ्य दिवस’ मनाए जाने की शुरूआत डब्ल्यूएचओ द्वारा 7 अप्रैल 1950 को की गई थी और यह दिवस मनाने के लिए इसी तारीख का निर्धारण डब्ल्यूएचओ की संस्थापना वर्षगांठ को चिन्हित करने के उद्देश्य से ही किया गया था। डब्ल्यूएचओ की स्थापना के साथ ही 1948 में विश्व स्वास्थ्य दिवस की नींव भी रख दी गई थी। दरअसल उस समय लोगों की सेहत को बढ़ावा देने और उन्हें गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रखने के उद्देश्य से दुनिया के कई देशों ने मिलकर दुनियाभर में ठोस कार्य करने की जरूरत पर बल दिया और आखिरकार विश्व स्वास्थ्य दिवस की नींव रखने के दो वर्ष बाद सन् 1950 में पहली बार 7 अप्रैल को यह दिवस मनाया गया। संयुक्त राष्ट्र का अहम हिस्सा ‘डब्ल्यूएचओ’ दुनिया के तमाम देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग और मानक विकसित करने वाली संस्था है, जिसका प्रमुख कार्य विश्वभर में स्वास्थ्य समस्याओं पर नजर रखना और उन्हें सुलझाने में सहयोग करना है। इस संस्था के माध्यम से प्रयास किया जाता है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहे। हालांकि चिंता की स्थिति यह है कि पिछले कुछ दशकों में एक ओर जहां स्वास्थ्य क्षेत्र ने काफी प्रगति की है, वहीं कुछ वर्षों के भीतर एड्स, कैंसर जैसी जानलेवा बीमारियों के प्रकोप के साथ हृदय रोग, मधुमेह, क्षय रोग, मोटापा, तनाव जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं भी तेजी से बढ़ी हैं। ऐसे में स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां निरन्तर बढ़ रही हैं। वैसे तो दुनिया के तमाम देश बीते कुछ दशकों से स्वास्थ्य के क्षेत्र में लगातार प्रगति कर रहे हैं लेकिन कोरोना काल के दौरान जब अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस अवस्था में देखा गया और वहां भी स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अभी भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन स्वयं मानता है कि दुनिया की कम से कम आधी आबादी को आज भी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं। विश्वभर में अरबों लोगों को स्वास्थ्य देखभाल हासिल नहीं होती। करोड़ों लोग ऐसे हैं, जिन्हें रोटी, कपड़ा और मकान जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तथा स्वास्थ्य देखभाल में से किसी एक को चुनने पर विवश होना पड़ता है। भारतीय समाज में तो सदियों से धारणा रही है ‘पहला सुख निरोगी काया, दूजा सुख घर में हो माया’ लेकिन चिंता का विषय यही है कि हमारे यहां भी स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति बहुत खराब है। बहरहाल, विश्व स्वास्थ्य दिवस के माध्यम से जहां समाज को बीमारियों के प्रति जागरूक करने का प्रयास किया जाता है, वहीं इसका सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यही होता है कि लोगों को स्वस्थ वातावरण बनाकर स्वस्थ रहना सिखाया जा सके। दरअसल विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ होना ही मानव-स्वास्थ्य की परिभाषा है। यह बेहद चिंता का विषय है कि दुनिया की करीब 30 प्रतिशत आबादी के पास बुनियादी स्वास्थ्य उपचार तक पहुंच नहीं है और करीब 200 करोड़ लोग विनाशकारी अथवा खराब स्वास्थ्य देखभाल लागत का सामना कर रहे हैं, जिसमें काफी असमानताएं हैं, जो सबसे वंचित परिस्थितियों में लोगों को प्रभावित कर रही हैं। हालांकि स्वास्थ्य का अधिकार एक ऐसा मौलिक मानवाधिकार है, जिसके तहत प्रत्येक व्यक्ति को बगैर किसी वित्तीय बोझ के, जब भी जरूरत हो, स्वास्थ्य देखभाल तक पहुंच मिलनी चाहिए। वैज्ञानिक उपलब्धियों का जश्न मनाते हुए हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि तकनीक और विज्ञान तभी वास्तविक रूप से सफल माने जाएंगे, जब वे एक गरीब की झोपड़ी तक सुलभ और वहनीय हों। जल जनित रोग, टाइफाइड और कुपोषण जैसी बीमारियां अभी भी हमारे समाज के लिए एक बड़ी चुनौती बनी हुई हैं, जो सीधे तौर पर स्वच्छता, शुद्ध पेयजल और वैज्ञानिक कचरा प्रबंधन की कमी को दर्शाती हैं। स्वास्थ्य सेवा की पहुंच को सार्वभौमिक बनाने के लिए विज्ञान के साथ अडिग खड़ा होना और साक्ष्य-आधारित मार्गदर्शन को पूरी निष्ठा से अपनाना ही वह एकमात्र मार्ग है, जो हमें एक स्वस्थ भारत और समृद्ध विश्व की ओर ले जाएगा। आज आवश्यकता केवल उपचार की नहीं बल्कि वैज्ञानिक सोच को अपनी दिनचर्या और जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा बनाने की है। (लेखक 36 वर्षों से पत्रकारिता में सक्रिय वरिष्ठ पत्रकार और ‘सागर से अंतरिक्ष तक: भारत की रक्षा क्रांति’ सहित कई पुस्तकों के लेखक हैं)