आज मध्य-पूर्व के तपते और बारूद की गंध से भरे रेगिस्तान में इतिहास की सबसे खतरनाक पटकथा लिखी जा रही है और दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहाँ अमेरिका जैसी महाशक्ति की हेकड़ी ईरान के फौलादी इरादों के सामने पस्त पड़ती दिखाई दे रही है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप, जो व्हाइट हाउस की कुर्सी संभालते ही ईरान को पत्थर युग में भेजने की गर्जना कर रहे थे, आज उसी ईरान की अभूतपूर्व सैन्य दृढ़ता और अचूक मिसाइल तकनीक के सामने खुद को बुरी तरह फंसा हुआ पा रहे हैं। ट्रंप का हालिया और चौंकाने वाला बयान, जिसमें उन्होंने अगले 2 से 3 हफ्तों के भीतर ईरान से अपनी सेना को बाहर निकालने की बात कही है, दरअसल कोई सोची-समझी कूटनीतिक जीत नहीं बल्कि एक हारी हुई बाजी से सुरक्षित निकलने की छटपटाहट है क्योंकि अमेरिका की वैश्विक दादागिरी अब ईरान के आत्मसम्मान और उसकी मज़बूत सैन्य घेराबंदी के सामने धराशायी हो चुकी है। ट्रंप जो खुद को दुनिया का सर्वश्रेष्ठ डील मेकर कहते थे, आज ईरान की शर्तों के सामने बेबस और लाचार नज़र आ रहे हैं और उनकी शांति की बात दरअसल उनकी अपनी सैन्य विफलता और रणनीतिक हार को छिपाने का एक पारदर्शी पर्दा मात्र है। वे भली-भांति जानते हैं कि अगर वे अब इस युद्ध के मैदान से बाहर नहीं निकले, तो अमेरिका को एक ऐसे क्षेत्रीय महायुद्ध का सामना करना पड़ेगा जिसकी तबाही की आंच सीधे वाशिंगटन की दहलीज तक पहुँचेगी, क्योंकि ईरान ने साफ़ कर दिया है कि मध्य-पूर्व अब अमेरिका की जागीर नहीं है। ईरान का पक्ष आज इस संघर्ष में एक अजेय विजेता की तरह उभरा है जिसने पूरी दुनिया को यह संदेश दे दिया है कि वह अब केवल रक्षात्मक मुद्रा में नहीं रहेगा बल्कि आक्रामक रक्षा की नीति अपनाते हुए दुश्मन को उसके घर में घुसकर तबाह करेगा। हाल ही में तेल अवीव की अभेद्य कही जाने वाली सुरक्षा दीवारों को भेदती ईरानी मिसाइलों और जॉर्डन स्थित अमेरिकी अड्डों पर हुए अचूक हमलों ने यह साबित कर दिया है कि ईरान की सैन्य शक्ति को कम आंकना ट्रंप की सबसे बड़ी ऐतिहासिक भूल थी। ईरान ने न केवल अमेरिकी धमकियों को कूड़ेदान में डाल दिया है बल्कि अपनी सैन्य श्रेष्ठता के दम पर युद्ध का भूगोल बदलने की ऐसी चुनौती दी है जिससे ट्रंप अंतरराष्ट्रीय मंच पर पूरी तरह अलग-थलग और लाचार पड़ गए हैं। इस बीच, ट्रंप के पीछे हटने के फैसले ने मध्य-पूर्व की बिसात पर एक ऐसा पावर वैक्यूम पैदा कर दिया है जिसे भरने के लिए रूस और चीन भूखे भेड़ियों की तरह घात लगाकर बैठे हैं और जैसे ही अमेरिकी सेना के कदम पीछे हटेंगे, पुतिन अपनी सैन्य साख और शी जिनपिंग अपनी असीमित आर्थिक शक्ति के ज़रिए इस तेल-समृद्ध क्षेत्र को पूरी तरह अपने प्रभाव में ले लेंगे। ट्रंप की यह एग्जिट चीन के लिए वह सुनहरा रास्ता खोल रही है जहाँ वह बिना एक भी गोली चलाए मध्य-पूर्व का नया आर्थिक और रणनीतिक महाबली बनकर उभरेगा, जो सीधे तौर पर अमेरिकी वैश्विक वर्चस्व के अंत का औपचारिक एलान होगा। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे ज़्यादा बेचैनी, गुस्सा और असुरक्षा इज़रायल के खेमे में दिखाई दे रही है, जिसके लिए ट्रंप का यह एग्जिट प्लान किसी बड़े कूटनीतिक विश्वासघात और सीधे तौर पर मौत के वारंट से कम नहीं है क्योंकि इज़रायल का स्पष्ट मानना है कि अमेरिका का पीछे हटना ईरान को पूरे क्षेत्र का बेताज और अनियंत्रित बादशाह बना देगा। इज़रायल आज खुद को इस युद्ध में ठगा हुआ और अकेला महसूस कर रहा है और उसने अपने सैन्य बजट में $10 बिलियन की जो ऐतिहासिक और भारी वृद्धि की है, वह दुनिया को यह जताने के लिए काफी है कि वह अब अकेले ही इस महायुद्ध में उतरने को तैयार है। इज़रायली नेतृत्व को अच्छी तरह पता है कि अगर ट्रंप की सेना चली गई, तो ईरान के नेतृत्व में दुश्मन गुट उसे चारों तरफ से नोच खाएंगे, इसलिए उसके लिए अब हार का मतलब सीधे तौर पर दुनिया के नक्शे से मिट जाना होगा। अंततः, आज की कठोर हकीकत यह है कि अमेरिका की दादागिरी ईरान की मज़बूत मिसाइलों के सामने फीकी पड़ चुकी है और ट्रंप अपनी पुरानी हेकड़ी भूलकर सिर्फ सुरक्षित वापसी की राह देख रहे हैं, जबकि इज़रायल अपनी ज़मीन बचाने के लिए आखिरी कतरे तक लहू बहाने को आमादा है। आने वाले 21 दिन दुनिया को यह साफ-साफ दिखा देंगे कि कैसे एक महाशक्ति के पैर उखड़ते हैं और कैसे मध्य-पूर्व का नया भूगोल अब वाशिंगटन के बजाय तेहरान की मर्जी से बारूद की कड़वी स्याही से लिखा जा रहा है, जहाँ रूस और चीन अब नए अंपायर बनकर उभर रहे हैं। (लेखक पत्रकार हैं ) ईएमएस / 03 अप्रैल 26