- मध्य प्रदेश में विकास का भ्रम और हकीकत मध्य प्रदेश में इन दिनों “रिकॉर्ड बजट” का शोर सेगुजर रहा है। सरकार ₹4.38 लाख करोड़ से अधिक के बजट को अपनी उपलब्धि के रूप में पेश कर रही है। लेकिन इस चमकदार आंकड़े के पीछे एक ऐसी सच्चाई छिपी है, जिसे जानना और समझना हर नागरिक के लिए जरूरी है—सरकार अपने ही बजट का बड़ा हिस्सा खर्च ही नहीं कर पा रही। यह केवल एक तकनीकी कमी नहीं, बल्कि शासन की गंभीर विफलता है। बजट बढ़ाना आसान, खर्च करना कठिन पिछले कुछ वर्षों में राज्य का बजट तेज़ी से बढ़ा है। 2022-23 में जहां बजट लगभग 2.24 लाख करोड़ रूपये था, वहीं 2025-26 में यह 4.38 लाख करोड़ रूपये तक पहुँच गया। यह वृद्धि पहली नजर में प्रभावशाली लगती है। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह पैसा जनता तक पहुँच रहा है? वास्तविकता यह है कि कई विभाग अपने आवंटित बजट का 20 प्रतिशत से 30 प्रतिशत तक खर्च ही नहीं कर पाते। यानी सरकार के पास पैसा है, लेकिन उसे उपयोग करने की क्षमता नहीं है। *विकास के नाम पर कटौती* सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि पूंजीगत व्यय—यानी सड़क, सिंचाई, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं पर होने वाला खर्च—घट रहा है। 2024-25 में पूंजीगत व्यय 61,633 करोड़ रूपये प्रस्तावित किया गया था, जो पिछले वर्ष के संशोधित अनुमान से लगभग 8 प्रतिशत कम है। यह वही खर्च है जो सीधे जनता के जीवन को प्रभावित करता है। जब यही घटेगा, तो विकास की गति कैसे बढ़ेगी यह विचारणीय है? *आधा बजट वेतन और कर्ज में कैद* राज्य का लगभग 45 प्रतिशत राजस्व वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान में चला जाता है। यानी सरकार का आधा खजाना पुराने दायित्वों में ही खत्म हो जाता है। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब हम राज्य के कर्ज को देखते हैं, जो 4.5 लाख करोड़ रूपये से अधिक हो चुका है—लगभग पूरे वार्षिक बजट के बराबर। यह एक खतरनाक समीकरण है: कर्ज बढ़ रहा है, लेकिन खर्च नहीं हो रहा। *घोषणाओं की राजनीति बनाम जमीन की हकीकत* सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए 70,000 करोड़ रूपये और महिलाओं की योजनाओं के लिए 1.23 लाख करोड़ रूपये जैसी बड़ी घोषणाएँ करती है। लेकिन जब बजट खर्च ही नहीं हो पाता, तो ये घोषणाएँ कागज से बाहर नहीं निकल पातीं। यह स्थिति बताती है कि प्राथमिकता विकास नहीं, बल्कि उसकी छवि बनाना है। क्या यह जानना जरूरी नह़ी कि जनता को क्या मिला? इस “अनखर्चे बजट” का सीधा असर आम जनता पर पड़ता है।अधूरी सड़कें और लटकी परियोजनाएँ,सिंचाई के अभाव में जूझते किसान, संसाधनों की कमी से जूझते अस्पताल,रोजगार के घटते अवसर इस विफलता के साक्षी हैं। यह ध्रुव सत्य है कि सरकारी खर्च अर्थव्यवस्था को गति देता है। जब सरकार खुद खर्च नहीं करती, तो निजी निवेश भी धीमा पड़ जाता है। इसका असर पूरे राज्य की आर्थिक सेहत पर पड़ता है। *क्या यह वित्तीय अनुशासन है?* सरकार इस स्थिति को “वित्तीय अनुशासन” का नाम दे सकती है। लेकिन यह तर्क वास्तविकता से दूर है। जरूरी योजनाओं पर खर्च न करना अनुशासन नहीं, बल्कि लापरवाही है। जनता के लिए आवंटित धन को खर्च न करना बचत नहीं, बल्कि उनके अधिकारों का हनन है। जवाबदेही का अभाव ही मूल जड़ है।सबसे बड़ा सवाल यह है कि इस स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या किसी विभाग पर अब तक कार्रवाई हुई है? क्या किसी अधिकारी को जवाबदेह ठहराया गया है? क्या सरकार ने जनता को बताया कि उनका पैसा क्यों खर्च नहीं हुआ? जब जवाब नहीं मिलते, तो यह साफ हो जाता है कि समस्या केवल क्षमता की नहीं, बल्कि जवाबदेही की भी है। हमें यह समझना होगा कि आंकड़ों का जाल से विकास की सच्चाई जुदा है ? मध्य प्रदेश आज एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है, जहाँ आंकड़े और वास्तविकता के बीच की दूरी खतरनाक रूप से बढ़ चुकी है। बजट बढ़ाना आसान है, लेकिन उसे सही दिशा में खर्च करना ही असली शासन है। जब तक सरकार अपनी प्राथमिकताओं को स्पष्ट नहीं करती, प्रशासनिक क्षमता नहीं बढ़ाती और जवाबदेही तय नहीं करती—तब तक करोड़ों का बजट भी जनता के जीवन में बदलाव नहीं ला पाएगा। और यह सवाल जीवित रह जायेगा कि क्या यह विकास है, या केवल विकास का भ्रम? (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) ईएमएस / 03 अप्रैल 26