राष्ट्रीय
05-Apr-2026
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चैन्नई,(ईएमएस)। तमिलनाडु की राजनीति ऐतिहासिक रूप से आत्म-सम्मान आंदोलन, तर्कवाद और नास्तिकता के स्तंभों पर टिकी रही है। लेकिन 2026 के चुनावी समर में राज्य की राजनीतिक जमीन पर एक अभूतपूर्व बदलाव देखने को मिल रहा है। जो नेता कल तक धार्मिक कर्मकांडों और रूढ़ियों के मुखर विरोधी हुआ करते थे, वे आज मंदिरों की चौखट पर नतमस्तक नजर आ रहे हैं। यह बदलाव द्रविड़ राजनीति के गढ़ में एक नई वैचारिक दिशा की ओर इशारा करता है, जिसे जानकार सॉफ्ट हिंदुत्व और सर्व-समावेशी छवि बनाने की कवायद मान रहे हैं। द्रमुक के प्रमुख चेहरे और उपमुख्यमंत्री उदयनिधि स्टालिन, जो पूर्व में सनातन धर्म और धार्मिक प्रथाओं पर अपनी विवादित टिप्पणियों के लिए चर्चा में रहे हैं, हाल ही में अपने निर्वाचन क्षेत्र के मंदिर में पूजा-अर्चना करते देखे गए। द्रविड़ विचारधारा के कट्टर समर्थक माने जाने वाले उदयनिधि का यह बदला हुआ स्वरूप चौंकाने वाला है। इसी तरह, पूर्व सांसद डॉ. सेंथिल कुमार, जो पहले सरकारी परियोजनाओं में भूमि पूजन और धार्मिक अनुष्ठानों का विरोध कर विवादों में घिरे थे, अब चुनाव प्रचार के दौरान सक्रिय रूप से मंदिरों का दौरा कर रहे हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि नेता अब बहुसंख्यक मतदाताओं को किसी भी कीमत पर नाराज नहीं करना चाहते। इस बार के चुनाव में धार्मिक सीमाओं का धुंधला होना एक बड़ा ट्रेंड बनकर उभरा है। चुनावी रैलियों में जहां मुस्लिम उम्मीदवार माथे पर विभूति लगाए नजर आ रहे हैं, वहीं हिंदू उम्मीदवार मस्जिदों में जाकर वोट मांग रहे हैं। यह रणनीतिक बदलाव केवल धर्म तक सीमित नहीं है, बल्कि जातिगत समीकरणों को साधने के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है। थेवर समुदाय से आने वाले मंत्री थंगम थेनारासु का दलित नेता इमैनुएल सेकरन के स्मारक पर जाना इस बात का प्रमाण है कि पार्टियां अब केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक के भरोसे नहीं रहना चाहतीं। विशेषज्ञों का मानना है कि तमिलनाडु में सांप्रदायिक रेखाएं भले ही पहले से बहुत गहरी न रही हों, लेकिन वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में दलित और अल्पसंख्यक वोटों की गोलबंदी के लिए प्रतीकों का सहारा लेना जरूरी हो गया है। राजनीति में प्रतिद्वंद्विता के बीच मानवीय गरिमा के उदाहरण भी सामने आ रहे हैं। गुम्मिडीपूंडी में अन्नाद्रमुक उम्मीदवार वी. सुधाकर द्वारा अपने प्रतिद्वंद्वी द्रमुक उम्मीदवार के पैर छूकर आशीर्वाद लेना यह दर्शाता है कि उम्मीदवार अपनी छवि को विनम्र और सुसंस्कृत बनाने पर जोर दे रहे हैं। 2026 का यह चुनाव निश्चित रूप से वैचारिक कट्टरता के बजाय व्यावहारिक राजनीति और समावेशी रणनीतियों के नए अध्याय के रूप में याद किया जाएगा। वीरेंद्र/ईएमएस/05अप्रैल2026