राष्ट्रीय
06-Apr-2026
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नई दिल्ली (ईएमएस)। गर्भासन का नियमित अभ्यास करने से शरीर और मन दोनों पर सकारात्मक प्रभाव पडता है। गर्भासन एक उन्नत और विशेष मुद्रा के रूप में जाना जाता है, जो न केवल शारीरिक लचीलापन बढ़ाता है बल्कि मानसिक शांति भी प्रदान करता है। यह हठयोग का एक अहम आसन है, जिसमें शरीर भ्रूण की स्थिति जैसा दिखाई देता है, इसलिए इसे गर्भासन कहा जाता है। गर्भासन शब्द ‘गर्भ’ और ‘आसन’ से मिलकर बना है, जहां ‘गर्भ’ का अर्थ भ्रूण और ‘आसन’ का अर्थ मुद्रा होता है। इस आसन में शरीर उसी तरह सिकुड़ा और संतुलित दिखाई देता है, जैसे मां के गर्भ में शिशु होता है। आयुष मंत्रालय के अनुसार, गर्भासन मानसिक तनाव को कम करने, एकाग्रता बढ़ाने और पाचन तंत्र को बेहतर बनाने में मदद करता है। यह आसन पेट की मांसपेशियों को मजबूत करता है, जिससे भोजन का पाचन सही तरीके से होता है और कब्ज जैसी समस्याओं में राहत मिलती है। इसके साथ ही यह शरीर के जोड़ों को मजबूत करता है और पीठ के निचले हिस्से में आराम पहुंचाता है। इस आसन को करने के लिए सबसे पहले पद्मासन की स्थिति में बैठना होता है। इसके बाद हाथों को जांघों और पिंडलियों के बीच से निकालते हुए कोहनियों तक बाहर लाया जाता है। फिर कोहनियों को मोड़ते हुए हाथों से कान पकड़ने की कोशिश की जाती है। इस दौरान शरीर का संतुलन कूल्हों पर बनाए रखना होता है और सामान्य रूप से सांस लेते रहना चाहिए। कुछ समय तक इस मुद्रा में रहने के बाद धीरे-धीरे सामान्य स्थिति में लौटना चाहिए। विशेषज्ञों के अनुसार, यह आसन शरीर के लचीलेपन को बढ़ाने के साथ मानसिक शांति भी देता है। हालांकि, यह एक उन्नत स्तर का योगासन है, इसलिए शुरुआती लोगों को इसे किसी प्रशिक्षित योग विशेषज्ञ की देखरेख में करना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति को पीठ दर्द, घुटनों या कूल्हों में चोट, या हर्निया जैसी समस्या है, तो इस आसन से बचना चाहिए या डॉक्टर की सलाह लेना जरूरी है। सुदामा/ईएमएस 06 अप्रैल 2026