लेख
06-Apr-2026
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- पाँच राज्यों में सता के सिंघासन पर कौन,राजनीतिक संघर्ष और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा की घड़ी,जनता जनार्दन है , मौन भारत का लोकतंत्र केवल एक शासन प्रणाली नहीं,बल्कि एक जीवंत परंपरा है,जहाँ प्रत्येक चुनाव जनभावनाओं का उत्सव बनकर सामने आता है।वर्ष 2026 में पाँच राज्यों-असम,तमिलनाडु,केरल, पश्चिम बंगाल और मणिपुर-के चुनाव इसी लोकतांत्रिक परंपरा के निर्णायक अध्याय बनकर उभरे हैं। यह केवल सत्ता परिवर्तन का अवसर नहीं,बल्कि पिछले पाँच वर्षों के कार्यों,वादों और जनता के विश्वास की अग्नि परीक्षा की घड़ी आ गई है।इन राज्यों की जनता ने बीते वर्षों में विकास,महंगाई,रोजगार,शिक्षा, स्वास्थ्य और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को नजदीक से महसूस किया है।अब जब चुनावी शंखनाद हो चुका है,राज्यों के मतदाता अपने मन में एक ठोस निर्णय बना चुका है।वह यह तय करने की स्थिति में है कि कौन उसके सपनों का संवाहक है और कौन केवल राजनीतिक वादों का व्यापारी है।भारतीय लोकतंत्र का सबसे बड़ा परिवर्तन यह है कि मतदाता अब पहले से कहीं अधिक सजग, जागरूक और निर्णायक हो गया है।वह जातीय और धार्मिक सीमाओं से ऊपर उठकर सुशासन और विकास को प्राथमिकता देने लगा है।यही कारण है कि इस बार 5 राज्यों के विधान सभा चुनावों में पारंपरिक समीकरणों के साथ-साथ प्रदर्शन आधारित राजनीति भी प्रमुख भूमिका में दिखाई दे रही है।चुनावी मैदान आज एक ऐसे समरक्षेत्र में बदल चुका है,जहाँ सत्तारूढ़ राजनीतिक दल अपनी उपलब्धियों के रथ पर सवार है, वहीं विपक्ष असंतोष और सवालों के शस्त्र लेकर चुनावी मैदान में उतरा है। अगर हम राजनीतिक परिदृश्य पर एक दृष्टि डालें तो हर राज्य की परिस्थितियाँ भिन्न होते हुए भी एक समानता स्पष्ट दिखाई देती है-सत्ता और विपक्ष के बीच सीधा और तीखा संघर्ष का दौर जारी है।सत्तारूढ़ दल अपने कार्यकाल के दौरान किए गए बुनियादी ढांचे के विकास,कल्याणकारी योजनाओं और प्रशासनिक सुधारों को जनता के सामने रख रहा है। “डबल इंजन” जैसे राजनीतिक नारे और योजनाओं का लाभ उठाने वाला वर्ग उसके समर्थन का मजबूत आधार बन चुका है।वही दूसरी ओर विपक्ष महंगाई,बेरोजगारी,किसान संकट और सामाजिक असमानता जैसे मुद्दों को लेकर सरकार को घेरने में जुटा है और जनता को परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रहा है। यदि इन पाँच राज्यों के चुनावी परिदृश्य को गहराई से देखा जाए, तो एक बहुआयामी तस्वीर सामने आती है।असम में सत्ता पक्ष अपने मजबूत संगठन और नेतृत्व के कारण हल्की बढ़त बनाए हुए है। यहाँ उसे लगभग 44 से 48 प्रतिशत वोट मिलने की संभावना है,जबकि विपक्ष 40 से 43 प्रतिशत के बीच सिमट सकता है।सीटों के रूपांतरण में यह अंतर सत्ता पक्ष को बढ़त दिला सकता है,जहाँ 126 सदस्यीय विधानसभा में उसके 68 से 78 सीटों तक पहुँचने के संकेत मिलते हैं।इसके बावजूद मुकाबला पूरी तरह एकतरफा नहीं है और विपक्ष की चुनौती मजबूत बनी हुई है।वही तमिलनाडु में राजनीति अपने पारंपरिक द्रविड़ स्वरूप में ही दिखाई देती है,जहाँ डीएमके गठबंधन लगभग 42 से 46 प्रतिशत वोट हासिल कर स्पष्ट बढ़त की स्थिति में नजर आता है। एआईएडीएमके गठबंधन 34 से 38 प्रतिशत के बीच सीमित रह सकता है,जबकि अन्य दलों का प्रभाव सीमित दायरे में रहेगा।234 सदस्यीय विधानसभा में डीएमके गठबंधन 140 से 160 सीटों के साथ सशक्त स्थिति में उभर सकता है,जो यह स्पष्ट संकेत देता है कि वहाँ सत्ता की निरंतरता संभव है। केरल की राजनीति हमेशा से विचारधारात्मक संघर्ष और वैकल्पिक सत्ता परिवर्तन के लिए जानी जाती रही है,लेकिन इस बार स्थिति थोड़ी भिन्न दिखाई देती है। एलडीएफ 43 से 46 प्रतिशत वोट के साथ बढ़त बनाए हुए है,जबकि यूडीएफ 41 से 44 प्रतिशत के बीच मुकाबले में बना हुआ है।140 सीटों वाली विधानसभा में एलडीएफ को 70 से 80 सीटों तक पहुँचने का अनुमान है,जो यह संकेत देता है कि परंपरागत ट्रेंड के विपरीत सत्ता की पुनरावृत्ति संभव हो सकती है।पश्चिम बंगाल का चुनावी परिदृश्य सबसे अधिक तीव्र और ध्रुवीकृत दिखाई देता है।यहाँ टीएमसी 44 से 47 प्रतिशत वोट के साथ आगे है,जबकि भाजपा 38 से 42 प्रतिशत के बीच मजबूत चुनौती दे रही है।294 सीटों वाली विधानसभा में टीएमसी को 160 से 190 सीटें मिलने की संभावना है,जबकि भाजपा 90 से 120 सीटों के बीच रह सकती है।यह परिणाम दर्शाता है कि सत्ता पक्ष को बढ़त तो है,लेकिन विपक्ष भी निर्णायक उपस्थिति दर्ज कर रहा है। जहाँ तक केंद्र शासित जहाँ तक मणिपुर की बात है तो मणिपुर में राजनीतिक समीकरण अधिक जटिल और स्थानीय प्रभावों पर आधारित हैं।यहाँ भाजपा 36 से 40 प्रतिशत वोट के साथ सबसे बड़े दल के रूप में उभर सकती है, जबकि कांग्रेस 30 से 34 प्रतिशत के बीच रह सकती है।क्षेत्रीय दलों का 20 से 25 प्रतिशत वोट इस चुनाव को त्रिशंकु स्थिति की ओर ले जा सकता है।60 सदस्यीय विधान सभा में किसी एक दल को स्पष्ट बहुमत मिलना कठिन प्रतीत होता है और गठबंधन की राजनीति यहाँ निर्णायक भूमिका निभा सकती है।इन सभी 5 राज्यों के समेकित विश्लेषण से यह स्पष्ट होता है कि भारतीय चुनावी समीकरण में वोट प्रतिशत और सीटों का अनुपात हमेशा सीधा नहीं होता।कई बार केवल 2 से 3 प्रतिशत वोट का अंतर दर्जनों सीटों का अंतर बना देता है,जो सत्ता की दिशा बदलने में निर्णायक साबित होता है।ऐसे में क्षेत्रीय दल अभी भी कई राज्यों में राजनीति के केंद्र में हैं और राष्ट्रीय दलों के लिए चुनौती बने हुए हैं।गठबंधन राजनीति का प्रभाव असम और मणिपुर जैसे राज्यों में स्पष्ट रूप से दिखाई देता है,जबकि तमिलनाडु,केरल और पश्चिम बंगाल में क्षेत्रीय नेतृत्व की पकड़ मजबूत बनी हुई है। अगर हम चुनावी मुद्दों की बात करें तो महंगाई,रोजगार,कृषि संकट, युवा आकांक्षाएँ और महिला सशक्तिकरण जैसे विषय हर राज्य में गूंज रहे हैं।कोविड के बाद स्वास्थ्य और शिक्षा भी प्रमुख मुद्दों के रूप में उभरे हैं।इसके साथ ही सोशल मीडिया ने चुनावी परिदृश्य को पूरी तरह बदल दिया है। डिजिटल प्लेटफॉर्म पर चल रहा प्रचार और संवाद अब चुनावी रणनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है।इन चुनावों का प्रभाव केवल इन राज्यों तक सीमित नहीं रहेगा,बल्कि यह राष्ट्रीय राजनीति की दिशा भी तय करेगा।वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव की दृष्टि से इसे एक प्रकार का सेमीफाइनल माना जा रहा है।यदि सत्तारूढ़ दल इन चुनावों में अच्छा प्रदर्शन करता है, तो उसकी राष्ट्रीय स्थिति और मजबूत होगी।वहीं विपक्ष के लिए यह अवसर है कि वह अपनी रणनीति को धार देकर आगामी चुनावों के लिए मजबूत आधार तैयार करे। संक्षेप में, इस चुनावी महासमर में सबसे बड़ी शक्ति जनता ही है।वही इस लोकतांत्रिक व्यवस्था की वास्तविक धुरी है,जिसके एक वोट से सत्ता का संतुलन बदल सकता है।यह चुनाव केवल सरकार चुनने का अवसर नहीं, बल्कि अपने भविष्य और अपने अधिकारों को दिशा देने का माध्यम है।पाँच राज्यों में सत्ता का संघर्ष और लोकतंत्र की अग्निपरीक्षा की घड़ी ,जनता जनार्दन मौन है।राज्यों के मतदाताओं ने अपने मन में जो निर्णय लिया है,वह शीघ्र ही मतपेटियों के माध्यम से सामने आएगा और उसी के आधार पर तय होगा कि सत्ता का ताज किसके सिर सजेगा। चुनावी समरक्षेत्र में शंखनाद हो चुका है,रथ सज चुके हैं और राजनीतिक योद्धा मैदान में उतर चुके हैं।अब सबकी निगाहें उस अंतिम निर्णय पर टिकी हैं,जो जनता जर्नादन के हाथों में है।वही निर्णय आने वाले समय की राजनीति की दिशा तय करेगा और इतिहास के पन्नों में दर्ज होगा कि किसने जनादेश को समझा और किसे आत्ममंथन की राह चुननी पड़ी। (स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 6 अप्रैल /2026