लेख
07-Apr-2026
...


होरमुज जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव एक बार फिर यह याद दिला रहा है कि भारत की ऊर्जा सुरक्षा कितनी नाजुक नींव पर खड़ी है। सरकार चाहे जितने भी दावे करे, सच्चाई यह है कि भारत आज भी अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बाहरी दुनिया पर अत्यधिक निर्भर है। ऐसे में सवाल उठता है—क्या सरकार की वर्तमान रणनीति वास्तव में दूरदर्शी है या सिर्फ संकट को टालने की कोशिश? सबसे पहले बात करते हैं तेल सप्लाई स्रोतों की विविधता की। सरकार इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में पेश करती है कि उसने मध्य पूर्व के अलावा रूस, अमेरिका और अफ्रीका से तेल खरीद बढ़ाई है। लेकिन यह आधा सच है। रूस से सस्ता तेल खरीदना एक अवसर जरूर था, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं है। भू-राजनीतिक परिस्थितियां कभी भी बदल सकती हैं। अमेरिका से तेल महंगा है और अफ्रीका से आपूर्ति स्थिर नहीं रहती। यानी अन्य स्रोतो ने जोखिम तो कम किया है, खत्म नहीं किया। दूसरा बड़ा दावा है रणनीतिक पेट्रोलियम रिजर्व (एसपीआर) का। सरकार ने भंडारण क्षमता बढ़ाने की योजना बनाई है, लेकिन वास्तविकता यह है कि वर्तमान भंडारण केवल कुछ दिनों की जरूरत ही पूरी कर सकता है। अगर होरमुज लंबे समय तक बंद रहता है, तो यह रिजर्व ऊंट के मुंह में जीरा साबित होगा। सवाल यह है कि जब भारत दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्था बनने का दावा करता है, तो उसकी ऊर्जा सुरक्षा इतनी सीमित क्यों है? तीसरा पहलू है नौसेना और सामुद्रिक सुरक्षा। भारतीय नौसेना की तैनाती और एस्कॉर्ट मिशन निश्चित रूप से महत्वपूर्ण हैं, लेकिन यह समाधान नहीं बल्कि संकट कम करना है। समुद्र में जहाजों की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है, पर अगर रास्ता ही बंद हो जाए तो सुरक्षा किस काम की? अब आते हैं सबसे महत्वपूर्ण पहलू—कूटनीति। भारत की “सबके साथ संतुलन” वाली नीति को अक्सर उसकी ताकत बताया जाता है। लेकिन यह संतुलन भी जोखिम से भरा है। ईरान, अमेरिका, सऊदी अरब और रूस—इन सभी के साथ संबंध बनाए रखना आसान नहीं है। किसी भी बड़े संघर्ष की स्थिति में यह संतुलन टूट सकता है, और तब भारत के पास विकल्प सीमित हो जाएंगे। सरकार का एक और बड़ा तर्क है ऊर्जा की वैकल्पिकता का—यानी सौर ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन और ग्रीन हाइड्रोजन। यह निश्चित रूप से भविष्य की दिशा है, लेकिन वर्तमान संकट का समाधान नहीं। भारत में अभी भी परिवहन और उद्योग का बड़ा हिस्सा तेल पर निर्भर है। ऊर्जा संक्रमण की गति इतनी धीमी है कि निकट भविष्य में इसका असर सीमित ही रहेगा। सबसे चिंताजनक बात यह है कि इन सभी प्रयासों के बावजूद भारत की मूल समस्या जस की तस बनी हुई है—88% तेल आयात पर निर्भरता। जब तक यह निर्भरता कम नहीं होती, तब तक हर अंतरराष्ट्रीय संकट भारत की अर्थव्यवस्था को झकझोरता रहेगा। राजनीतिक स्तर पर भी यह मुद्दा बेहद संवेदनशील है। तेल की कीमतें बढ़ती हैं तो महंगाई बढ़ती है, और महंगाई सीधे सरकार की लोकप्रियता को प्रभावित करती है। इसलिए अक्सर देखा गया है कि सरकारें अल्पकालिक उपायों—जैसे टैक्स में कटौती या तेल कंपनियों पर दबाव—का सहारा लेती हैं। लेकिन ये उपाय दीर्घकालिक समाधान नहीं हैं, बल्कि सिर्फ चुनावी प्रबंधन के औजार हैं। तो समाधान क्या है? सबसे पहले, भारत को अपनी ऊर्जा नीति में वास्तविक सुधार करना होगा। घरेलू उत्पादन को बढ़ाना, वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों में तेज निवेश करना और ऊर्जा दक्षता को प्राथमिकता देना जरूरी है। दूसरा, एसपीआर को वैश्विक मानकों के अनुसार बढ़ाना होगा ताकि कम से कम 60 से 90 दिनों का भंडारण सुनिश्चित किया जा सके। तीसरा, विदेश नीति में ऊर्जा सुरक्षा को केंद्र में रखना होगा, न कि सिर्फ संतुलन साधने की कोशिश। अंततः, होरमुज संकट ने एक बार फिर यह स्पष्ट कर दिया है कि भारत की ऊर्जा रणनीति अभी अधूरी है। सरकार ने कुछ कदम जरूर उठाए हैं, लेकिन वे पर्याप्त नहीं हैं। यह समय है कठोर फैसले लेने का, क्योंकि ऊर्जा सुरक्षा सिर्फ आर्थिक मुद्दा नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है। अगर अभी भी हम नहीं जागे, तो अगला संकट केवल चेतावनी नहीं, बम एक गंभीर झटका साबित हो सकता है। (लेखक स्वतंत्र विश्लेषक हैं) (यह लेखक के व्य‎‎‎क्तिगत ‎विचार हैं इससे संपादक का सहमत होना अ‎निवार्य नहीं है) .../ 7 अप्रैल /2026