अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के ऊपर हमला किया है। इस हमले की सबसे बड़ी वजह इजरायल के प्रधानमंत्री नेतन्याहू की ग्रेटर इजरायल की सनक और सत्ता में बने रहने का एक औजार है। जिसने सारी दुनिया के लिए संकट पैदा कर दिया है। नेतन्याहू इजरायल के पहली बार 1996 में प्रधानमंत्री बने। उसके पहले सत्ता में आने के लिए और सत्ता में बने रहने के लिए उन्होंने ग्रेटर इजरायल का सपना इजरायल के लोगों को दिखाया। इजरायली संप्रभुता का विस्तार करने लेबनान, फिलिस्तीन, सीरिया, जॉर्डन, इराक, मिश्र और सऊदी अरब तक विस्तार करके ग्रेटर इजरायल के रूप में विस्तार करने के लिए वह सत्ता का उपयोग कर लोगों की धार्मिक भावनाएं भड़काकर सत्ता में बने रहना चाहते हैं। इसके लिए उन्होंने 1996 से लेकर 2026 तक पूरी दुनिया को एक तरह से खतरे में डालकर रखा है। इस काम में अमेरिका उनके साथ है। अमेरिका और इजरायल ने मिलकर जो ताना-बाना बुना था, वह अब तार-तार हो रहा है। नेतन्याहू ने सत्ता में बने रहने और दक्षिणपंथी समूहों को एकजुट करने के लिए अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन किया। जॉर्डन, इराक, सऊदी में जरूर प्रत्यक्ष तरीके से इजरायल ने हस्तक्षेप नहीं किया लेकिन इन देशों में अमेरिका और इजरायल का प्रभाव बढ़े इसके लिए लगातार दो दशक से काम कर रहे हैं। अमेरिका की मदद से विस्तारवादी इस कार्यक्रम में नेतन्याहू ने 12 अगस्त 2025 को एक साक्षात्कार में यह भी कह दिया कि वह एक आध्यात्मिक और ऐतिहासिक मिशन पर काम कर रहे हैं। ग्रेटर इजराइल को बनाने में उनकी भूमिका अति महत्वपूर्ण है। उनकी इस घोषणा की उस समय मुस्लिम देशों ने कड़ी निंदा की थी। अमेरिका और इजरायल मिलकर लेबनान की सीमा पर लगातार हमले कर रहे हैं। फिलीस्तीन को एक तरह से खत्म कर दिया। ईरान के साथ लगातार विवाद पैदा करते हुए ईरान को कमजोर करने का प्रयास इजरायल के प्रधानमंत्री द्वारा किया जा रहा है। जिसके कारण खाड़ी के देशों में लगातार तनाव की स्थिति बनी हुई है। बेंजामिन नेतन्याहू का सपना है, वह समुद्र और जॉर्डन नदी के बीच केवल इजरायली संप्रभुता होगी। इसको सफल करने के लिए वो लगातार प्रयास कर रहे हैं। डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति बनने पर उन्हें इस काम में अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के विरोध के बाद भी अमेरिका से जो सहयोग मिल रहा था उसने उनकी महत्वाकांक्षा को और भी बढ़ा दिया। जिसका परिणाम ईरान के साथ प्रत्यक्ष युद्ध के रूप में सामने आया है। पिछले कई दशकों से अमेरिका ईरान पर समय-समय पर प्रतिबंध लगाता रहा है। प्रतिबंध के कारण ईरान की आवाम को लगातार आर्थिक संकटों से गुजरना पड़ रहा है। इसके बाद भी ईरान ने कभी युद्ध करने की बात नहीं सोची। उसने हमेशा विकल्प तलाशा। शायद अमेरिका और इजरायल ने इसे ईरान की कमजोरी माना और वहां पर सत्ता पलटने की कोशिश की। उनके आंतरिक मामलों में सीधा हस्तक्षेप करना शुरू कर दिया। अमेरिका ने जो इराक के रासायनिक हथियार बनाने का आरोप लगाकर उसे बर्बाद किया था वही नीति अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान के ऊपर लागू करने की कोशिश की। यह कोशिश अमेरिका और इजरायल के लिए इतनी भारी पड़ेगी यह दोनों ने सोचा नहीं था। ग्रेटर इजराइल का सपना उन्हें इस तरह ले डूबेगा इसकी कल्पना डोनाल्ड ट्रंप और नेतन्याहू ने नहीं की थी। धर्म पर आधारित राजनीति कुछ समय तक तो जनता को भावात्मक रूप से जोड़कर रखती है लेकिन जब जनता को कष्ट होने लगता है तो यही भावात्मक लगाव बगावत का कारण बन जाता है। आज पूरी दुनिया में जिस तरह से महंगाई बेरोजगारी आर्थिक मंदी और खाद्य संकट से मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग जूझ रहा है रही सही कसर आदमी को अपने अस्तित्व को बनाए रखने की हो गई है। कर्ज के बोझ में दबकर और परिवार का खर्च नहीं चल पाने की स्थिति में परिवार का मुखिया सामूहिक आत्महत्या जैसे कदम उठाने लगा है। आज दुनिया के कई देशों में आत्महत्या के प्रकरण दिन-प्रतिदिन बढ़ते ही जा रहे हैं। भारत भी इससे अछूता नहीं रहा। दक्षिणपंथी विचारधारा भारत में भी पिछले दो दशक से बड़ी तेजी के साथ फल फूल रही है। अखंड भारत का सपना भारत के एक सांस्कृतिक संगठन एवं राजनीतिक दल द्वारा दिखाया जा रहा है। पिछले 12 वर्षों में यह विचारधारा बड़ी तेजी के साथ भारत में फल फूल रही है, लेकिन जिस तरह की महंगाई, बेरोजगारी और कर्ज का बोझ आम आदमी के सिर चढ़कर बोल रहा है, भारत में भी आत्महत्या और सामूहिक आत्महत्या के हजारों मामले हर राज्य में सामने आ चुके हैं। इसके बाद भी सरकार की जो संवेदनशीलता गरीब और मध्यम वर्ग के साथ होनी चाहिए वह देखने को नहीं मिल रही है। भारत में पूंजीवाद बड़ी तेजी के साथ फल-फूल रहा है। ऐसी स्थिति में जब लोग अपना जीवन-यापन भी नहीं कर पाएंगे ऐसी स्थिति में बगावत उत्पन्न होती है। यही बगावत श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल में देखने को मिली। कुछ समय तक लोगों को किसी विचारधारा से भरमाया जा सकता है, लेकिन मनुष्य जीवन में जो मौलिक आवश्यकता है यदि वह पूरी नहीं होती हैं तो इसी तरह का विरोध बनता है। यह अब इजरायल में भी होते हुए दिख रहा है। इजरायल की जनता सड़कों पर आकर पहले भी विरोध कर चुकी है और अब जिस तरीके से वह जीवन और मृत्यु के बीच में झूल रही है उसके बाद इजरायल में नेतन्याहु का विरोध इजरायल में शुरू हो गया है। कुछ इसी तरह का विरोध अमेरिका में देखने को मिल रहा है। जहां पर सभी राज्यों के लाखों लोग सड़कों पर आकर ट्रंप की नीतियों के खिलाफ प्रदर्शन कर चुके हैं जिस तरह की स्थितियां ईरान युद्ध के बाद बनती हुई दिख रही हैं, यह अच्छा संकेत नहीं दे रही है। आर्थिक विशेषज्ञ लगातार आर्थिक मंदी की चेतावनी दे रहे हैं। सभी देशों और उनके नागरिकों पर कर्ज का भारी बोझ है। बाजारबाद और पूंजीवादी व्यवस्था के एकाधिकार के कारण दुनिया के सारे देशों में सत्ता के खिलाफ बगावत देखने को मिल रही है। भारत सरकार को भी इस दिशा में ध्यान देने की जरूरत है। गैस सिलेंडर खाद्यान्न पेट्रोल डीजल आज आम आदमियों की सबसे बड़ी आवश्यकता है। रही सही कसर इंटरनेट और स्मार्टफोन ने पूरी कर दी है। प्रत्येक गरीब और मध्यम वर्ग के परिवार में दो या तीन स्मार्टफोन होना आम बात है। इंटरनेट पर 2000 रुपये महीने खर्च करना हर परिवार के लिए जरूरी हो गया है। मजदूरी और नौकरी पर जाने के लिए रोज आना 50 से 100 रुपये के पेट्रोल को बढ़ाना जरूरी हो गया है। इस युद्ध के बाद जिस तरीके की स्थितियां देखने को मिल रही हैं उसमें धार्मिक और दक्षिणपंथी विचारधारा एक दूसरे से बांटने का काम करती हैं, लेकिन जब लोग परेशान होते हैं तो यही सारे लोग मिलकर सरकार के खिलाफ एकजुट होते हैं। अपनी जरूरत को पूरा करने के लिए किसी भी हद तक चले जाते हैं। निश्चित रूप से सरकार को इस पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। एसजे/ 7 अप्रैल /2026