- भोपाल में किताब-ड्रेस की दुकान की फिक्सिंग भोपाल (ईएमएस)। निजी स्कूलों की बढ़ती फीस और अनिवार्य खरीदारी को लेकर अभिभावकों का आक्रोश लगातार बढ़ता जा रहा है। राजधानी के कई प्रतिष्ठित स्कूलों में हर साल 20 से 25 फीसदी तक फीस बढ़ोतरी के आरोप सामने आ रहे हैं। इसके साथ ही किताब, यूनिफॉर्म और जूते एक तय दुकान से खरीदने का दबाव भी पैरेंट्स की परेशानी बढ़ा रहा है। अभिभावकों का कहना है कि शिक्षा का खर्च अब उनकी आय से बाहर होता जा रहा है। दूसरी तरफ किताब कापी बेचने वाले भारी लूट कर रहे हैं। किताबों की प्रिंटिंग कॉस्ट से 200 गुना तक कीमत वसूली जा रही है। इस गोरखधंधे पर प्रशासन और सरकार को तुरंत एक्शन लेना चाहिए ताकि लाखों बच्चों के परिवारों को राहत मिले। माता-पिता का आरोप है कि फीस बढ़ाने का कोई स्पष्ट आधार नहीं बताया जाता। हर साल नए नियम और नई लिस्ट थमा दी जाती है। बच्चों के भविष्य को देखते हुए वे विरोध भी नहीं कर पाते। यही वजह है कि स्कूल प्रशासन के फैसले बिना सवाल के लागू हो जाते हैं। इस स्थिति ने शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। - महंगाई से तेज बढ़ रही फीस अभिभावकों का कहना है कि आम महंगाई दर से कहीं ज्यादा तेजी से स्कूल फीस बढ़ रही है। पांचवीं से छठवीं कक्षा में जाने पर 20 से 25 हजार रुपये तक का अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है। वहीं 11वीं से 12वीं में यह बढ़ोतरी और अधिक हो जाती है। परिवारों के मासिक बजट पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। - किताब और यूनिफॉर्म का ‘फिक्स’ सिस्टम पैरेंट्स का आरोप है कि स्कूलों ने कुछ दुकानों से सांठगांठ कर रखी है। वहीं से किताबें और यूनिफॉर्म खरीदने के लिए मजबूर किया जाता है। बाजार में सस्ती विकल्प होने के बावजूद स्कूल लिस्ट के बाहर की चीजें स्वीकार नहीं करते। इससे अभिभावकों को मजबूरी में महंगे दाम चुकाने पड़ते हैं। - हर साल बदल जाती हैं किताबें सबसे बड़ी शिकायत किताबों को लेकर है। हर साल नए पब्लिशर की किताबें लागू कर दी जाती हैं। पिछले साल की किताबें अगले साल बेकार हो जाती हैं। इससे दोहरी मार पड़ती है। बच्चों को नई किताबें खरीदनी पड़ती हैं और पुरानी रद्दी बन जाती हैं। - हिडन चार्जेस से बढ़ता बोझ फीस के अलावा कई तरह के छिपे हुए शुल्क भी जोड़े जाते हैं। स्पोट्र्स, कल्चरल एक्टिविटी, कंपटीशन और अन्य कार्यक्रमों के नाम पर अलग से पैसे वसूले जाते हैं। अभिभावकों का कहना है कि इन खर्चों का कोई स्पष्ट हिसाब नहीं दिया जाता। - एनसीईआरटी बनाम प्राइवेट पब्लिशर अभिभावकों का मानना है कि एनसीईआरटी की किताबें सस्ती और मानक होती हैं। इसके बावजूद स्कूल प्राइवेट पब्लिशर्स की महंगी किताबें लागू करते हैं। इससे शिक्षा की लागत अनावश्यक रूप से बढ़ जाती है। - सरकारी गाइडलाइन की मांग तेज माता-पिता सरकार से सख्त नियम बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि फीस बढ़ोतरी का एक तय पैमाना होना चाहिए। साथ ही किताब और यूनिफॉर्म खरीदने की स्वतंत्रता भी दी जानी चाहिए। - अभिभावक-स्कूल कमेटी की जरूरत विशेषज्ञों का मानना है कि अभिभावक और स्कूल के बीच संवाद की कमी है। एक संयुक्त कमेटी बनाई जाए, जो फीस और अन्य खर्चों पर निगरानी रखे। इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और विवाद कम होंगे। - विनोद / 06 अप्रैल 26