लेख
06-Apr-2026
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सिनेमा में कहानी और राजनितिक विचारधारा का मिश्रण एक समकालीन विमर्श के रूप में उभरा है। हालिया चर्चित “धुरंधर” भी इसी बहस के केंद्र में खड़ी एक फिल्म है। आज़ाद भारत के हर दौर में सिनेमा केवल मनोरंजन का माध्यम मात्र नहीं रहा, बल्कि वह समाज के विचारों और दृष्टिकोण को प्रभावित करने वाला सबसे सशक्त माध्यम रहा है । लेकिन जब यही दृष्टिकोण किसी एक राजनितिक विचारधारा की और झुकता हुआ प्रतीत होता है, तो प्रश्न उठना स्वाभाविक है । सबसे बड़ा सवाल यहाँ यह उठता है की क्या यह वास्तव में कुछ नया है? क्या ऐसा पहले कभी नहीं हुआ? और क्या इस फिल्म के ज़रिये मनोरंजन के नाम पर दर्शकों के साथ धोखा किया जा रहा है? हर दशक में हमने ऐसी फिल्मों को बनते देखा है, जिनमें कहानी के साथ एक विशेष विचारधारा की छाया भी दिखाई देती है । 1983 में आई अमिताभ बच्चन अभिनीत फ़िल्म “कुली”, कम्युनिज्म को खुलकर प्रमोट करती नज़र आती है । फिल्म का वो सीन, जिसमें सभी कुली (श्रमिक वर्ग) संगठित होकर पूंजीवादी ‘पुरी’ के बंगले में ग्रह-अतिक्रमण करते है, जो केवल विरोध का स्वर नहीं बल्कि मकान न मिलने पर व्यवस्था के खिलाफ आक्रोशपूर्ण हस्तक्षेप होता है । यह दृश्य अपने आप में पूर्वी यूरोप के 1917 के उस दौर को रेखांकित करता है, जिसमें पूंजीपति और श्रमिक वर्ग के बीच टकराव ने क्रांति का रूप लेकर तख्तापलट किया और कम्युनिज्म को राजनितिक रूप से स्थापित किया । इसी दौर में “रोटी कपड़ा और मकान” (1974) एक सशक्त फिल्म थी । फिल्म का ऐतिहासिक सीन जिसमें नायक बेरोज़गारी और बेबसी से तंग आकर अपनी डिग्री फाड़कर पिता की जलती चिता में फेंक देता है, जो आज भी प्रासंगिक है । कहा जाता रहा है की फिल्म का शीर्षक– इंदिरा गांधी के नारे “गरीबी हटाओ” से प्रेरित था । यह संयोग नहीं है की इस प्रकार के दृश्य उसी समय सामने आते है, जब भारत का राजनितिक परिदृश्य तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी के नेतृत्व में समाजवादी झुकाव से प्रभावित हो रहा था । उनकी नीतियों में समाजवादी सोच की स्पष्ट उपस्थिति देखी जा सकती थी । उस समय भारत और सोवियत संघ के बीच घनिष्ठ राजनितिक और कूटनीतिक सम्बन्ध स्थापित थे । यह प्रभाव केवल विदेश नीति तक सीमित नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक और बौद्धिक स्तर पर भी उसकी झलक साफ़ देखी जा सकती थी । समाजवाद जैसे विचार सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बन रहे थे, उनका असर साहित्य पर तो 3 दशक पहले ही शुरू हो गया था, इस दौर तक सिनेमा में भी दिखाई देने लगा था । यह प्रवत्ति केवल अतीत तक सीमित नहीं है । अकादमी पुरस्कारों पर भी अक्सर पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं, हाल ही में संपन्न हुए अकादमी पुरस्कारों में बेस्ट फिल्म के लिए “वन बैटल आफ्टर अनादर” को चुना जाना भी कहीं-न-कहीं सवाल खड़े करता है, विशेषकर तब जब ऑस्कर के 98 वर्षों के इतिहास में सबसे ज्यादा 16 नॉमिनेशन प्राप्त करने वाली इकलौती फिल्म “सिनर्स” अधिक सशक्त और प्रभावशाली फिल्म रही । फिल्म का स्क्रीनप्ले हो या संगीत, सिनेमेटोग्राफी या प्रोडक्शन डिजाईन “सिनर्स” लम्बे समय के लिए गहरी छाप छोड़ के जाती है । यह फिल्म अश्वेत समुदाय के संघर्षों और उनके ऐतिहासिक अनुभवों को केवल दर्शाती ही नहीं, बल्कि उन्हें संवेदनशीलता और समकालीन नस्लवाद की जीवित वास्तविकता से इस प्रकार जोड़ती है कि दर्शक उसके सामाजिक और मानवीय महत्व को गहराई से महसूस करता है। एक ऐसा प्रयास, जिसकी झलक पहले “गेट आउट” (2017), “अस” (2019) जैसी फिल्मों में भी मिलती है । ऐसे में प्रश्न उठता है की क्या इन निर्णयों के पीछे केवल कलात्मक मानदंड कार्य करते है, या फिर समकालीन अमरीकी सांस्कृतिक प्रवृतियाँ अपना प्रभाव ज्यादा रखती है । यह केवल एक निर्णय भर नहीं, बल्कि उस प्रवृत्ति की और इशारा करता है, जहां कलात्मकता से ज्यादा वैचारिक झुकाव निर्णायक भूमिका निभाते हुए दिखते है । ऐसे में “धुरंधर” को भी इसी क्रम में रखकर देखना उचित प्रतीत होता है, जहाँ चर्चा उस अंदरूनी भावना की है, जो फिल्म के दौरान लगातार बनी रहती है । “धुरंधर” केवल एक फिल्म है या राजनीतिक वक्तव्य – यह आपको स्वयं तय करना है क्योंकि दर्शक आम तौर पे अपनी विचारधारा के अनुरूप फिल्म देखने के पहले ही एक निष्कर्ष की ओर झुक चूका होता है । जो भी हो लेकिन इस फिल्म की अपार सफलता ने आने वाले समय के लिए एक बात बिल्कुल स्पष्ट कर दी है– मनोरंजन परोसने का तरीका अब पूरी तरह बदल चूका है । शुभम आर्य, अभिनेता एवं लेखक, 06 अप्रैल, 2026