नई दिल्ली (ईएमएस)। सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव के मामले में सुनवाई का दूसरा दिन है। मामला मुख्यतः केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक से जुड़ा है। इस मामले की सुनवाई 9 जजों की संविधान बेंच कर रही है। मंगलवार को पहले दिन की पांच घंटे लंबी चली सुनवाई में केंद्र सरकार ने सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश पर रोक को सही माना था। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मंदिर में महिलाओं को प्रवेश न देने का मतलब उनका अपमान करना नहीं है। उन्होंने कहा कि भारत में महिलाओं की पूजा की जाती है और सबरीमाला मंदिर की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ से जोड़ना गलत है। उनका कहना था कि छुआछूत जाति आधारित थी, जबकि यह मामला धार्मिक परंपरा से जुड़ा है। सॉलिसिटर जनरल मेहता ने उदाहरण देकर कहा कि जैसे मस्जिद, मजार या गुरुद्वारे में जाते समय सिर ढंकना जरूरी है, वैसे ही सबरीमाला में परंपरा का पालन होना चाहिए। यह धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का मामला है, जो न्यायालय के दायरे से बाहर है। इस पर बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने सवाल उठाया कि अगर किसी महिला को मासिक धर्म के कारण मंदिर में प्रवेश से रोका जाता है, तब क्या यह छुआछूत नहीं है। उन्होंने कहा कि संविधान में छुआछूत पूरी तरह समाप्त कर दी गई है और किसी भी प्रकार के भेदभाव को रोकता है। सुप्रीम कोर्ट में इस मामले से जुड़े 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन लंबित हैं। यह विवाद 26 वर्षों से न्यायालयों में चला आ रहा है। 2018 में 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं। 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक इन याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। रिव्यू पिटीशन और उनके समर्थन में दलीलें 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक सुनवाई जाएंगी, जबकि विरोध करने वाले पक्ष की दलीलें 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक प्रस्तुत की जाएंगी। यह मामला धार्मिक आस्था, परंपरा और समानता के संवैधानिक अधिकार के बीच संवेदनशील संतुलन का सवाल उठाता है और पूरे देश की महिलाओं के धार्मिक अधिकारों पर प्रभाव डाल सकता है। आशीष दुबे / 08 अप्रैल 2026