लेख
10-Apr-2026
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(11 अप्रैल महात्मा ज्योतिबा फुले जयंती) इतिहास अक्सर उन लोगों को भूल जाता है जो किसी भव्य इमारत की नींव में ईंट बनकर समा जाते हैं। लेकिन जब-जब आधुनिक भारत में न्याय और बराबरी की बात होगी, ज्योतिबा फुले का नाम सबसे ऊपर लिया जाएगा। फुले कोई पारंपरिक नेता नहीं थे, वे एक ऐसे दूरद्रष्टा शिक्षक थे जिन्होंने ब्लैकबोर्ड पर अक्षर लिखने से पहले समाज की कड़वी सच्चाइयों और गरीबों के आंसू पढ़ना सीखा था। आज हम जिस आधुनिक भारत में सांस ले रहे हैं, जहाँ महिलाएं कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं और समाज का हर वर्ग तरक्की के सपने देख रहा है, उसकी पहली मजबूत ईंट 19वीं सदी में ज्योतिबा फुले ने ही रखी थी।वह एक ऐसा दौर था जब शिक्षा पर कुछ खास लोगों का एकाधिकार था और समाज की एक बहुत बड़ी आबादी अज्ञानता के घने अंधेरे में कैद थी। ज्योतिबा ने बहुत कम उम्र में ही यह समझ लिया था कि किसी को गुलाम बनाने के लिए लोहे की जंजीरें जरूरी नहीं होतीं, बल्कि उसे अशिक्षा के पिंजरे में कैद रखना ही काफी होता है। उन्होंने बड़ी बेबाकी से समाज को आईना दिखाते हुए कहा था- शिक्षा के बिना इंसान की बुद्धि मर जाती है और बुद्धि के बिना उसका विकास और नैतिकता हमेशा के लिए रुक जाती है। ज्योतिबा फुले के जीवन का सबसे साहसी अध्याय उनकी जीवनसंगिनी सावित्रीबाई फुले के साथ जुड़ा है। उन्होंने किसी बड़े मंच से केवल भाषण देने के बजाय, बदलाव की शुरुआत अपने घर से की। उस कट्टर समाज की कल्पना कीजिए, जहाँ औरतों का पढ़ना एक महापाप माना जाता था, वहाँ ज्योतिबा अपनी पत्नी के हाथ में कलम और किताब थमा रहे थे। जब सावित्रीबाई स्कूल पढ़ाने निकलती थीं और उन पर गोबर और कीचड़ फेंका जाता था, तो ज्योतिबा एक चट्टान की तरह उनके पीछे खड़े रहते थे। यह उन दोनों का अटूट साहस और जिद ही थी, जिसने 1848 में पुणे के भिड़ेवाड़ा में लड़कियों के लिए भारत के पहले स्कूल का रास्ता खोला और सदियों पुराने बंद दरवाजे हमेशा के लिए तोड़ दिए। फुले के सुधार केवल स्कूलों की चारदीवारी तक सीमित नहीं रहे। उनकी पैनी नजर समाज की हर उस बुराई पर थी जो एक इंसान को दूसरे इंसान से छोटा समझती थी। उन्होंने सत्यशोधक समाज की स्थापना की, जिसका एकमात्र उद्देश्य लोगों को अंधविश्वासों के मानसिक चंगुल से बाहर निकालना था। वे केवल बातों के धनी नहीं थे, बल्कि उन्होंने अपने सिद्धांतों को जीकर दिखाया। जब अछूतों के लिए पानी पीना भी अपराध माना जाता था, तब उन्होंने अपने खुद के घर का पानी का टैंक उनके लिए खोल दिया। यह उस समय के कट्टरपंथी समाज के मुंह पर एक बहुत बड़ा तमाचा था। वे जानते थे कि जब तक एक आम इंसान अपनी नजरों में खुद को गौरवशाली नहीं समझेगा, तब तक वह समाज में अपना हक कभी नहीं मांग पाएगा। अक्सर हम फुले को इतिहास की एक पुरानी तस्वीर मानकर दीवार पर टांग देते हैं, लेकिन उनके विचार आज के आधुनिक युग में भी उतने ही अनिवार्य हैं। आज हमारे पास बड़ी-बड़ी डिग्रियां तो हैं, लेकिन क्या हमारे भीतर वह सामाजिक चेतना है जो फुले पैदा करना चाहते थे? उन्होंने स्पष्ट कहा था कि शिक्षा का असली मकसद केवल नौकरी पाना नहीं, बल्कि खुद को स्वतंत्र बनाना और समाज के प्रति संवेदनशील होना है। आज जब हम समाज में बढ़ती नफरत और भेदभाव की नई दीवारें देखते हैं, तो फुले की गुलामगिरी जैसी कालजयी रचनाएं हमें याद दिलाती हैं कि असली मानसिक आजादी पाना अभी भी एक लंबा संघर्ष है। महात्मा फुले ने कभी अपने व्यक्तिगत सुख या आराम की चिंता नहीं की। अपनी प्रतिभा और पढ़ाई के दम पर वे चाहते तो एक बहुत ही समृद्ध जीवन जी सकते थे, लेकिन उन्होंने उन लोगों के लिए कांटों भरा रास्ता चुना जो समाज के अंतिम पायदान पर खड़े थे। यही कारण है कि जनता ने उन्हें अपने दिल से महात्मा की उपाधि दी थी। उनकी लड़ाई किसी विशेष धर्म या जाति के खिलाफ नहीं थी, बल्कि उनकी जंग उस अमानवीय व्यवस्था के विरुद्ध थी जो इंसान और इंसान के बीच ऊंच-नीच की दीवार खड़ी करती थी। वे किसानों के दुख-दर्द को भी उतनी ही शिद्दत से समझते थे और उनके शोषण के खिलाफ हमेशा ढाल बनकर खड़े रहे। 11 अप्रैल का यह दिन हमें रुककर यह आत्मचिंतन करने का मौका देता है कि हम फुले के सपनों के भारत के कितने करीब पहुँचे हैं। क्या आज हर गांव के बच्चे के हाथ में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा है? क्या आज भी हमारी महिलाएं समाज में पूरी तरह सुरक्षित और स्वतंत्र महसूस करती हैं? महात्मा फुले ने जो मशाल डेढ़ सौ साल पहले जलाई थी, उसे बुझने न देना ही उनके प्रति हमारी सच्ची श्रद्धांजलि होगी। आइए, आज हम फुले के उन सिद्धांतों को याद करें जो कहते हैं कि ज्ञान ही वह एकमात्र प्रकाश है जो हमें अंधकार से बाहर निकालकर सम्मान का जीवन दिला सकता है। उनका संघर्ष हमें भरोसा दिलाता है कि अगर हमारे इरादे नेक हों, तो एक अकेला व्यक्ति भी वक्त की धारा को मोड़ने का दम रखता है। (लेखक पत्रकार हैं) ईएमएस / 10 अप्रैल 26