लेख
10-Apr-2026
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(11 अप्रैल राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस पर विशेष आलेख) 11 अप्रैल को भारत में राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य, सुरक्षित प्रसव और मातृ सुरक्षा के प्रति व्यापक जागरूकता बढ़ाना है। इस अवसर पर देशभर में सरकारी और निजी संस्थानों द्वारा स्वास्थ्य शिविर, निःशुल्क जांच, परामर्श और जागरूकता अभियान आयोजित किए जाते हैं। इस दिवस का मुख्य लक्ष्य मातृ मृत्यु दर में कमी लाना, संस्थागत प्रसव को बढ़ावा देना, गर्भवती महिलाओं को प्रसव पूर्व और प्रसवोत्तर देखभाल, संतुलित पोषण तथा गर्भावस्था के दौरान होने वाले खतरनाक संकेतों के बारे में शिक्षित करना है। साथ ही, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में गुणवत्तापूर्ण मातृत्व स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सुनिश्चित करना और हर महिला को सुरक्षित व सम्मानजनक प्रसव की सुविधा उपलब्ध कराना भी इसका प्रमुख उद्देश्य है। भारत सरकार ने 11 अप्रैल 2003 को ‘व्हाइट रिबन एलायंस इंडिया’ के अनुरोध पर इस दिवस की शुरुआत की थी, जिसके लिए 1800 से अधिक स्वयंसेवी संस्थाओं ने मिलकर अभियान चलाया था। इस दिवस का प्रतीक सफेद रिबन है, जो उन माताओं के प्रति शोक व्यक्त करता है जिनकी मृत्यु गर्भावस्था या प्रसव के दौरान हुई, और साथ ही आशा, पवित्रता तथा इस संदेश का प्रतीक है कि गर्भावस्था कोई बीमारी नहीं है और किसी भी महिला को जीवन देते समय अपनी जान नहीं गंवानी चाहिए। भारत दुनिया का पहला देश है जिसने सुरक्षित मातृत्व के लिए एक समर्पित राष्ट्रीय दिवस घोषित किया, जबकि अन्य देश और वैश्विक संगठन सामान्यतः 28 मई को ‘इंटरनेशनल डे ऑफ एक्शन फॉर वीमेन हेल्थ’ मनाते हैं। यह दिवस कस्तूरबा गांधी की जयंती पर मनाया जाता है, जिन्होंने स्वतंत्रता संग्राम में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने के साथ-साथ महिलाओं के स्वास्थ्य, स्वच्छता और सुरक्षित प्रसव के लिए उल्लेखनीय कार्य किए। साबरमती आश्रम में उन्होंने महिलाओं को स्वास्थ्य और स्वच्छता के प्रति जागरूक किया और उस समय, जब स्वास्थ्य सुविधाएं अत्यंत सीमित थीं, वे स्वयं एक कुशल प्रसव सहायिका के रूप में कार्य करती थीं तथा ग्रामीण महिलाओं को सुरक्षित प्रसव के लिए शिक्षित करती थीं। इस प्रकार यह दिवस उनके मौन लेकिन महत्वपूर्ण योगदान को स्मरण करने का अवसर भी है। बहरहाल, यहां पाठकों को बताता चलूं कि हमारे देश में मातृ स्वास्थ्य को बेहतर बनाने के लिए कई महत्वपूर्ण योजनाएं संचालित की जा रही हैं। ‘प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान’ के अंतर्गत प्रत्येक माह की 9 तारीख को सरकारी स्वास्थ्य केंद्रों पर गर्भवती महिलाओं को निःशुल्क विशेषज्ञ जांच की सुविधा प्रदान की जाती है। ‘जननी शिशु सुरक्षा कार्यक्रम’ के तहत गर्भवती महिलाओं को मुफ्त प्रसव, भोजन और जांच की सुविधा मिलती है। इसके अतिरिक्त, ‘नर्स प्रैक्टिशनर इन मिडवाइफरी’ के माध्यम से पारंपरिक दाइयों के अनुभव को आधुनिक चिकित्सा विज्ञान से जोड़कर ‘मिडवाइफरी लेड केयर यूनिट्स’ विकसित किए जा रहे हैं, जिससे प्रसव प्रक्रिया को अधिक सुरक्षित, सहज और कम तनावपूर्ण बनाया जा सके। वास्तव में, यह काबिले-तारीफ है कि पिछले एक दशक में भारत ने मातृ मृत्यु दर में लगभग 70 प्रतिशत की उल्लेखनीय कमी दर्ज की है और आज लगभग 90 प्रतिशत प्रसव अस्पतालों में (संस्थागत प्रसव) हो रहे हैं, जबकि 2003 में यह संख्या काफी कम थी। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार भारत का मातृ मृत्यु दर (एमएमआर) घटकर 88 प्रति लाख जीवित जन्म हो गया है, जो राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति के निर्धारित लक्ष्य (100 से कम) से बेहतर है। यदि वैश्विक स्तर पर तुलना करें तो 1990 के बाद से भारत ने अपनी मातृ मृत्यु दर में लगभग 86 प्रतिशत की कमी हासिल की है, जबकि इसी अवधि में वैश्विक औसत गिरावट केवल 48 प्रतिशत रही है। वर्तमान में भारत का लक्ष्य 2030 तक संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप इस दर को 70 से नीचे लाना है। केरल, महाराष्ट्र, तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने उत्कृष्ट प्रदर्शन करते हुए मातृ मृत्यु दर को 40 से नीचे ला दिया है, जबकि उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और असम में यह दर अभी राष्ट्रीय औसत से अधिक है, फिर भी संस्थागत प्रसव में वृद्धि के कारण वहां तेजी से सुधार हो रहा है। इस सफलता के पीछे ‘प्रधानमंत्री सुरक्षित मातृत्व अभियान’ और ‘लक्ष्य’ जैसे कार्यक्रमों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिनसे स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता, विशेषकर लेबर रूम सुविधाओं में सुधार हुआ है। साथ ही, व्यापक टीकाकरण, बेहतर पोषण और प्रसव के दौरान प्रशिक्षित स्वास्थ्य कर्मियों की उपलब्धता ने मातृ स्वास्थ्य की स्थिति में व्यापक बदलाव लाया है। प्रत्येक वर्ष इस दिवस की एक थीम निर्धारित की जाती है। वर्ष 2024 की थीम स्वस्थ शुरुआत, आशाजनक भविष्य रखी गई थी, जिसका उद्देश्य गर्भावस्था की शुरुआत से ही मां और शिशु के लिए बेहतर स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करना था। वर्ष 2025 की थीम समान मातृत्व देखभाल: हर माँ का अधिकार रही, जबकि वर्ष 2026 की थीम सुरक्षित मातृत्व के लिए नवाचार और सुलभ स्वास्थ्य सेवा निर्धारित की गई है। अंततः, यही कहूंगा कि राष्ट्रीय सुरक्षित मातृत्व दिवस केवल एक जागरूकता दिवस नहीं, बल्कि एक मानवीय और सामाजिक दायित्व का प्रतीक है। यह हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि किसी भी समाज की वास्तविक प्रगति उसकी माताओं की सुरक्षा और स्वास्थ्य से मापी जाती है। जब तक हर गर्भवती महिला को समय पर उचित देखभाल, पर्याप्त पोषण, प्रशिक्षित स्वास्थ्य सेवाएं और सम्मानजनक व्यवहार नहीं मिलेगा, तब तक विकास अधूरा रहेगा। इस दिवस का मूल संदेश यही है कि सुरक्षित मातृत्व कोई विकल्प नहीं, बल्कि हर महिला का मौलिक अधिकार है। वास्तव में, सामूहिक प्रयासों, जन-जागरूकता और सशक्त स्वास्थ्य व्यवस्थाओं के माध्यम से ही हम एक ऐसा समाज व देश बना सकते हैं, जहां हर मां सुरक्षित हो और हर नवजीवन स्वस्थ भविष्य की ओर अग्रसर हो। (सुनील कुमार महला, फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार, पिथौरागढ़, उत्तराखंड।) ईएमएस / 10 अप्रैल 26