लेख
12-Apr-2026
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पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में पहली बार अमेरिका और ईरान के बीच आमने-सामने वार्ता हुई। इस बातचीत को लेकर अमेरिका और ईरान के जो प्रतिनिधि मंडल पाकिस्तान पहुंचे थे, उनमें आपसी सहमति नहीं बन पाई। बिना किसी निष्कर्ष पर पहुंचे यह बातचीत पूरी तरह से बेनतीजा रही। शनिवार को ईरान ने लेबनान पर हमले रोकने की शर्त रखी। अमेरिका ने इस पर चुप्पी साध रखी। दोनों देशों के प्रतिनिधि मंडल की सीधी वार्ता में राजनीतिक, सेना और अर्थव्यवस्था के मुद्दों पर चर्चा हुई। अमेरिका की ओर से ईरान द्वारा पेश किए गए मुद्दों के किसी एक पर ऐसी कोई रुचि नहीं दिखाई, जिसे ईरान स्वीकार कर सके। अमेरिका का जो प्रतिनिधिमंडल आया था, वह भी हार्मोंज को खोलने के लिए अड़ा रहा। अमेरिका के इस प्रस्ताव को ईरान के प्रतिनिधि मंडल ने नहीं माना। ईरान का कहना था, सारे मुद्दों पर एक साथ बातचीत हो। एक साथ निर्णय लिए जाएं। ईरान पहले भी इस बात को कह चुका था। वह युद्धविराम के पक्ष में नहीं है। वह चाहता है, स्थाई रूप से युद्ध रुके। जो भी विवाद के कारण हैं, उन्हें दोनों पक्ष आपस में मिलकर सुलझायें। पाकिस्तान में हुई इस वार्ता में सबसे बड़ा अड़ंगा इजराइल ने लगा रखा था। इजराइल के प्रधानमंत्री नेतन्याहु लेबनान को निशाने पर रखना चाहते थे। दोनों ही पक्ष अपना-अपना प्रेशर एक दूसरे पर बनाते रहे। इस बैठक में चीन और पाकिस्तान की कोई प्रत्यक्ष भूमिका नहीं थी। यदि होती तो कुछ ना कुछ समझौते की राह निकलती। दोनों ही पक्ष इसे अपनी हार और जीत के रूप में देख रहे थे। पाकिस्तान मे हुई वार्ता बेनतीजा रही। इसकी मुख्य वजह अमेरिका और इजराइल का इतिहास रहा है, इन्होंने हमेशा युद्ध विराम की आड़ में धोखा किया है। ईरान के साथ भी कई बार धोखा हो चुका है। जिसके कारण ईरान इस बार पूरी तरह से सतर्क था। अमेरिका-इजरायल द्वारा ईरान पर जो संयुक्त रुप से हमला किया गया है, उसमें ईरान को बहुत अधिक नुकसान हुआ है, इससे इंकार भी नहीं किया जा सकता है। ईरान अब आर-पार की लड़ाई लड़ने में आ गया है। सौ सुनार की और एक लोहार की तर्ज पर इस समय ईरान का वार अमेरिका और इजराइल पर भारी पड़ा है। ईरान को अच्छी तरह से मालूम था, यह बातचीत बेनतीजा रहेगी। इसलिए उसने अपनी युद्ध की तैयारी में जरा भी कोताही नहीं बरती। ईरान विश्व को यह बताने से भी नहीं चूका, कि वह शांति के पक्ष में है। युद्ध विराम के बाद जब इजराइल ने लेबनान पर हमले किए, इसका जवाब ईरान ने हिजबुल्ला के माध्यम से इजराइल को देकर वहां पर भारी तबाही मचा दी है। जो राजनीति अभी तक अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान के साथ कर रहे थे, वही फार्मूला अब ईरान ने भी अपना लिया है। अमेरिका इस युद्ध में बुरी तरह से फंसा हुआ है। अमेरिका युद्ध से बाहर निकलना चाहता है। इजराइल के दबाव में वह बाहर नही निकल पा रहा है। ऐसी स्थिति में संभावना व्यक्त की जा रही है, जल्द ही अमेरिका समझौता के लिए नए रास्तों की तलाश करेगा। अमेरिका में जिस तरह से महंगाई एवं बेरोजगारी बढ़ रही है, उससे निपटने के लिए युद्ध बंद करना बहुत जरूरी हो गया है। इसके अलावा कुछ महीनो में अमेरिका में कुछ राज्यों में चुनाव होने जा रहे हैं, उसके पहले ट्रंप को अपनी स्थिति को मजबूत करना है। जिस तरह से अमेरिका और इजराइल की जनता सड़कों पर उतरकर विरोध कर रही है। उसके बाद अमेरिका और इजराइल के पास अन्य कोई विकल्प भी नहीं बचा है। इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अपने जीवन की सबसे कठिन पारी को खेल रहे हैं। युद्ध बंद होने की दशा में उन पर अंतरराष्ट्रीय अदालत और इजराइल की अदालत में मुकदमा चलना तय है। उनके ऊपर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप हैं। उससे बचने के लिए उन्होंने पिछले 3 वर्षों से फिलिस्तीन, गाजा, लेबनान एवं अन्य देशों पर जिस तरह के हमले किए हैं, उन्होंने अपनेआप को बचाने के लिए तबाही मचा रखी है। अब जिस तरह की स्थिति बनी है, उसके बाद अमेरिका और इजराइल को भविष्य का ध्यान रखते हुए महत्वपूर्ण निर्णय लेने पड़ेंगे। जिस तरह से इजराइल में तबाही हुई है। उसके बाद वहां की जनता भी सड़कों पर आकर नेतन्याहू को हटाने की मांग कर रही है। जनता के गुस्से को कब तक नेतन्याहू काबू में रख पाएंगे, कितने समय तक बचे रहेंगे। यह कहना बड़ा मुश्किल है। भारतीय संदर्भ में कहा जाए तो इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने जिस तरह छोटे-छोटे बच्चे-बच्चियों, महिलाओं, और बीमारों को मौत के घाट उतारा है, उसके बाद उनके पाप का घड़ा पूरी तरह से भर चुका है। जिस तरह का अहंकार उनमें दिख रहा है। उसको देखते हुए कहा जा सकता है, कि वह ज्यादा दिनों के मेहमान नहीं है। इस वार्ता के विफल होने से एक बार फिर दुनिया के देश, युद्ध के मुहाने पर खड़े हो गए हैं। ऊर्जा संकट और आयात-निर्यात व्यापार में बाधा बने हुये हैँ। 100 से अधिक देशों पर इसका दुष्प्रभाव देखने को मिल रहा है। आशा की जा सकती है, जल्द से जल्द वैश्विक स्तर पर इस युद्ध को बंद कराने के लिए हर देश को हर संभव प्रयास करने होंगे। यदि ऐसा नहीं हुआ तो भविष्य में स्थिति बेहद चिंताजनक होगी। ईएमएस / 12 अप्रैल 26