प्रत्येक तीन वर्ष के अन्तराल से सनातन धर्म में अधिक मास आता है। इस वर्ष २०२६ में ज्येष्ठ मास में अधिक मास आ रहा है। अधिक मास को मलमास तथा पुरुषोत्तम मास भी कहते हैं। इस मास में भगवान विष्णु के पूजन का अत्यधिक महत्व है। ज्येष्ठ मास ग्रीष्म ऋतु में आता है इसलिए इस समय प्रचण्ड गर्मी रहती है। इस मास में सूर्य और वरुण की उपासना का अधिक महत्व है। भौगोलिक महत्व : विद्वानों का कथन है कि इस्वी सन् में हर चौथे वर्ष में फरवरी माह २९ दिन का होता है। अर्थात् हर चौथे वर्ष में एक दिन बढ़ जाता है। ३६५ वाला वर्ष ३६६ दिन का हो जाता है। ज्योतिष के अनुसान जिस वर्ष सूर्य एक राशि से दूसरी राशि में संक्रमण नहीं करता है, उस मास को अधिक मास कहते हैं। अधिक मास पृथ्वी के सौर चक्र में सन्तुलन बनाने का कार्य करता है। यदि यह सन्तुलन न हो तो पृथ्वी पर ऋतु चक्र परिवर्त्तित हो जाएंगे। भारत एक कृषि प्रधान देश है। यहाँ का फसल चक्र ऋतु परिवर्तन पर आधारित रहता है। अधिक मास और सौर ऋतु चक्र और चन्द्र ऋतु चक्र में सन्तुलन बनाता है। चन्द्र वर्ष और सौर वर्ष में ग्यारह दिन का अन्तर है। तीन वर्ष में ये तैंतीस दिन हो जाते हैं। तिथियों के घटने से एक माह हो जाता है, जिसे अधिक मास कहते हैं। वैज्ञानिक महत्व : ग्रीष्म ऋतु में जल स्तर गिरता जाता है। शरीर में भी पानी की कमी हो जाती है। लू लगना (सनस्ट्रोक) से बचना अति आवश्यक है। खानपान में रसदार फल, सत्तू, हरी सब्जियों का अधिक सेवन करना चाहिए। दोपहर में धूप से बचाव करना आवश्यक है। ठंडे जल का सेवन करना और तले हुए मसालेदार भोजन से बचना चाहिए। नींबू की शिकंजी, शरबत, केरी पना और दही की लस्सी का सेवन लाभकारी रहता है। गन्ने का रस भी गर्मी से बचाता है। धार्मिक महत्व : अधिक मास में दिए गए दान का अत्यधिक महत्व है। पानी की मटकी, सत्तू, गुड़, रसदार फल, पंखे, वस्त्र आदि का दान महत्वपूर्ण है। ग्रीष्म ऋतु में आगन्तुकों को शरबत, केरी पना (झोलिया), दही की लस्सी, नींबू पानी, गन्ने का रस आदि पिलाना चाहिए। ये सभी पेय गर्मी में आवश्यक है। सार्वजनिक स्थानों पर प्याऊ लगाकर जल सेवा का पुण्य अर्जन किया जा सकता है। धर्मशाला आदि ठहरने के स्थानों में कूलर, सीलिंग फेन आदि लगाकर यात्रियों की सेवा की जा सकती है। यह दान प्रक्रिया का एक परिवर्तित रूप है। ए.सी.आर.ओ. पलंग आदि का दान दानदाता अपने सामर्थ्य के अनुसार कर सकते हैं। अधिक मास में अधिकतर पीले वस्त्रों का दान किया जाता है क्योंकि यह भगवान विष्णु का प्रिय रंग है। इस रंग से भाग्य में वृद्धि होती है। दीपक सायंकाल के समय जलाना चाहिए। दीप दान भी किया जाता है। विष्णुजी की पूजा का महत्व है। दीप दान से अकाल मृत्यु नहीं होती है और दरिद्रता दूर होती है। अधिक मास में अन्नदान करने से सहज रूप से लक्ष्मीजी की प्राप्ति होती है। इस मास में तैंतीस मालपुए दान करने का विशेष महत्व है। इसके अतिरिक्त छतरी, जूते, कांसे के बर्तन, चना, दाल, गुड़, ताम्बे के बर्तन, पान, खारक, मौसमी फल, धार्मिक पुस्तकें, विष्णु पुराण, श्रीमद् भगवत गीता, चन्दन, सोना, चाँदी, दीपक, रत्न, मोती, माणिक्य भी विशेष तिथियों पर सामर्थ्य के अनुसान दान देना चाहिए। अधिक मास के प्रमुख त्योहार : ज्येष्ठ मास में रोहिणी नक्षत्र भी रहता है। गंगा दशहरा, वट सावित्री पूर्णिमा, निर्जला एकादशी आदि प्रमुख त्योहार हैं। गंगा दशहरा में नदी स्नान का महत्व है। वट सावित्री पूर्णिमा पर वट वृक्ष का पूजन आम तथा चना दाल से किया जाता है। वृक्ष को सूत का धागा लपेटकर सत्यवान सावित्री की कथा पढ़ी जाती है। पशु पक्षी के लिए जल पात्र रखे जाते हैं। पुष्कर यात्रा का महत्व है। सत्तू दान का भी महत्व है। अक्षय तृतीया पर आम, खरबूज, तरबूज आदि के दान का भी महत्व है। स्वास्थ्य संबंधी सावधानियाँ : ज्येष्ठ मास में गर्मी अपने चरम पर होती है। ऐसे समय घर के वृद्ध व्यक्तियों और चिकित्सकों की सलाह मान कर जीवन यापन करना चाहिए। धूप से बचाव करना, सूती कपड़े से नाक, कान और सिर को ढाँक कर रखना, गॉगल पहनना, अमृतधारा तथा प्याज का सेवन करना, केरी पना, नींबू पानी, रसदार फल, लस्सी, शीतल जल आदि का सेवन स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद होता है। पौराणिक ग्रन्थों के अनुसार श्रीराम और हनुमानजी की भेंट ज्येष्ठ मास में मंगलवार को हुई थी। इस मास में हनुमानचालीसा, श्री सुन्दरकाण्ड का पाठ तथा श्रीरामचरितमानस का पारायण करने का भी विधान है। अधिक मास में भगवान श्रीविष्णु, श्रीकृष्ण, शालिग्राम आदि के पूजन का अधिक महत्व है। अधिक मास को पुरुषोत्तम मास भी कहा जाता है और श्रीविष्णु सहस्रनाम का पाठ करने का महत्व है। वर्तमान समय में युवा पीढ़ी अत्यधिक व्यस्त और भागदौड़ वाला जीवन व्यतीत कर रही है। उनके पास समय की कमी है। चाह कर भी वे अपने धार्मिक नियमों का पालन करने में असमर्थ है। हमारे पौराणिक ग्रन्थों में कहा गया है कि यदि ú नमो भगवते वासुदेवाय का पाठ भी कर लें तो उन्हें भगवान का आशीर्वाद प्राप्त हो जाएगा। निम्नलिखित मंत्र का पाठ करने से भी उन्हें अधिक मास के पुण्य फल प्राप्त हो जाएगा। यह मंत्र कौण्डिण्य ऋषि द्वारा रचित है- ऊँ गोवर्धन धरं वन्दे गोपालं गोपरूपिणं। गोकुलोत्सव मिशानं गोविन्दं गोपिका प्रियं।। ईएमएस / 14 अप्रैल 26