- 16 वर्ष पुरानी विक्टर आबॉर्न की तानाशाह सरकार दो तिहाई बहुमत से पराजित दुनिया के जिन देशों में लोकतांत्रिक सरकारों पर लोकतांत्रिक तरीके से तानाशाहों का कब्जा हो गया है, वह कब्ज़ा अब बड़ी तेजी के साथ खत्म होता जा रहा है। हंगरी में 2010 के चुनाव में आबॉर्न की पार्टी फिदेस ने दो तिहाई बहुमत लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव जीता था। चुनाव जीतने के बाद पिछले 15 सालों से वह शासन को एक तानाशाह की तरह संचालित कर रहे थे। उन्होंने न्याय पालिका की स्वतंत्रता और मीडिया को सरकारी नियंत्रण में लाकर खड़ा कर दिया था। संविधान और चुनाव के नियमों में लगातार परिवर्तन किए जाते रहे। एक तरह से सरकार जो चाहती थी, सभी संवैधानिक संस्थाओं को वही करना अनिवार्य हो गया था। पिछले 15 वर्षों में हंगरी में क्रॉनिव कैपिटलिज्म बड़ी तेजी के साथ बढा। भ्रष्टाचार भी तेजी के साथ बढ़ना शुरू हो गया। हंगरी की सरकार ने विपक्ष को पूरी तरह से आपस में लड़ाकर उन्हें कमजोर कर दिया। जनता के ऊपर टेक्स एवं शुल्क बढ़ाकर आर्थिक बोझ बढ़ाया गया। सरकार और पूंजीपतियों को भारी कमाई होने लगी। सरकार में भ्रष्टचार एवं रिश्वतखोरी बड़ी तेजी के साथ बढ़ी, जिससे आम जनता पेरशान थी। विरोध करने पर लाठियों से पीटा जाता था। आम जनता पर मुकदमें थोपकर उन्हें परेशान किया जाने लगा। न्यायालयों से आम जनता को न्याय नहीं मिल रहा था। लोग डर और भय के मध्य जी रहे थे। वोटों के बंटवारे और समय-समय पर चुनाव आयोग के नियमों में परिवर्तन कराकर पिछले 16 साल से विक्टर आर्बन सत्ता में जमें हुए थे। इनके कार्यकाल में सबसे ज्यादा खराब हालत नागरिक अधिकारों की रही। मीडिया पूरी तरह से सरकारी नियंत्रण और प्रभाव में था। मीडिया में जनता की समस्याएं एवं समाचारों का अभाव हो गया। सरकार जो चाहती थी, वही मीडिया गुणगान करता था। आम जनता के विरोध प्रदर्शन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। विरोध प्रदर्शन पर भारी बल प्रयोग किया जाता था। सरकार के लिए अलग कानून और विपक्ष के लिए अलग कानून एवं नियम बना दिए गए। जिसके कारण पिछले कई वर्षों से सरकार के खिलाफ आम नागरिकों का गुस्सा बढ़ता ही जा रहा था। एकाधिकार वाली इस शासन व्यवस्था के कारण हंगरी में महंगाई और बेरोजगारी बड़ी तेजी के साथ बढ़ी। स्वास्थ्य, शिक्षा तथा आम आदमी से जुड़ा हुआ बजट लगातार कम होता रहा। जिसके कारण वर्तमान सरकार का विरोध बढ़ता ही चला गया। मध्यम और युवा वर्ग सड़क पर उतर कर विरोध जताने लगा था। जिस तरह से प्रधानमंत्री विक्टर आर्बन सरकार का भय संवैधानिक संस्थाओं, मीडिया और आम जनता पर था। सरकार जिसके कारण स्थिति बड़ी तेजी के साथ खराब होने लगी थी, उसके खिलाफ इस चुनाव के पहले सभी विपक्षी दल एकजुट हो गए। उन्होंने एक जुटता के साथ प्रधानमंत्री आर्बन के खिलाफ चुनाव लड़ा। जनता नाराज थी। इस चुनाव में 78 फ़ीसदी मतदाताओं ने अपने मताधिकार का उपयोग करते हुए दो तिहाई बहुमत के साथ विपक्ष को चुनाव जिता दिया। इस चुनाव में युवाओं ने सबसे ज्यादा वोट दिया। हंगरी का यह चुनाव भ्रष्टाचार आर्थिक ठहराव, लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर होने, मंहगाई, टेक्स, बेरोजगारी और जनता की नाराजगी को केंद्र में रखकर लड़ा गया था। न्यायालयों से नागरिकों को न्याय नहीं मिल रहा था। इन सभी मुद्दों पर जनता ने इस बार विरोध में निर्णायक वोट दिया। हंगरी के मतदाताओं ने इस चुनाव में पीटर मग्यार के पक्ष में मतदान करके उन्हें दो तिहाई बहुमत से चुनाव जिताया है। वह युवा हैं, पिछले कई वर्षों से राजनीति में सक्रिय बने हुए थे। चुनाव परिणाम आने के बाद उनके शपथ ग्रहण की प्रक्रिया शुरू हो गई है। विपक्ष पहली बार हंगरी में एकजुट होकर लड़ा। जिसके कारण मत-विभाजन नहीं हो सका। हंगरी की यह तानाशाह सरकार जिसके शासनकाल में भ्रष्टाचार और नागरिक अधिकारों की कटौती के साथ-साथ जिस तरह से नागरिकों प्रताड़ित किया जा रहा था। उनकी समस्याओं और मांगों पर ध्यान नहीं दिया जा रहा था। एक ही झटके में जनता ने अपनी ताकत सरकार को बता दी, अब वहां एक युवा प्रधानमंत्री बनने जा रहा है। पिछले 16 वर्षों में जो कुछ हंगरी में हुआ है, वही सब भारत में भी होता हुआ दिख रहा है। अति सर्वत्र वर्जयते की तर्ज पर हंगरी के चुनाव परिणाम इस बार देखने को मिले हैं। तानाशाह शासक द्वारा सत्ता में रहते हुए जो भी ताकत कानून के जरिये बटोरी थी, उसे जनता ने एक ही झटके में समाप्त कर दिया है। जिस तरह के बदलाव अब सारी दुनिया के देशों में देखने को मिल रहे हैं। उसमें लोकतांत्रिक देशों में जो तानाशाही प्रवृत्ति बढ़ रही थी। ऐसा लग रहा है, अब उसमें रोक लगना शुरू हो गई है। श्रीलंका, नेपाल, बांग्लादेश के बाद अब हंगरी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की ओर जा रहा है। यह आशा की एक नई किरण है। पिछले कई दशकों में नागरिकों ने अधिकार के साथ रहना सीख लिया है। ऐसी स्थिति में उन्हें ज्यादा समय तक गुलाम बनाकर नहीं रखा जा सकता है। हंगरी के चुनाव परिणाम से यह स्पष्ट होता हुआ दिख रहा है। ईएमएस / 15 अप्रैल 26