देश में भ्रष्टाचार के खिलाफ सख्ती के दावे सरकारें करती है। नियम एवं कानून भी बना दिये जाते है। भ्रष्ट्राचार और गबन जैसे मामलों में अक्सर जांच एजेंसियों की कार्यशैली के सामने आरोपियों पर कोई कार्यवाही नहीं हो पाती है। केंद्र की सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टीगेशन और राज्य स्तर पर लोकायुक्त आर्थिक अपराध अनुसंस्थान और पुलिस जैसी संस्थाएं मौजूद होने के बावजूद, बड़ी संख्या में मामलों का अंत “खत्मा” या सबूतों के अभाव में आरोपियों के बरी होने से होता है। हाल ही में भोपाल डिस्ट्रिक्ट कोर्ट द्वारा लोकायुक्त की जांच पर सवाल उठाते हुए 35 मामलों में खात्मा आवेदन को अस्वीकार कर दिया है, जो जांच और न्याय व्यवस्था की खामियों को उजागर करता है। ऐसे उदाहरण नए नहीं हैं। हजारों मामलों में यहीं देखने को मिलता है। वर्षों पहले उजागर हुआ व्यापम स्कैम हो या राष्ट्रीय स्तर पर चर्चित 2जी स्पेक्ट्रम केस लंबी जांच, भारी खर्च होने के बाद भी अंततः अदालत में कमजोर साक्ष्य के आधार पर आरोपी बरी हो जाते है। जनता के भरोसे को गहरा आघात पहुंचता है। यह प्रवृत्ति संकेत देती है, जांच की गुणवत्ता, साक्ष्य संकलन और अभियोजन की तैयारी में गंभीर कमियां हैं। यहां एक सवाल यह भी उठता है। राजनैतिक दलों द्वारा एक दूसरे के ऊपर गंभीर आरोप लगाये जाते है। राजनैतिक लाभ-हानि के आधार पर झूठे मुकदमें भी दर्ज हो जाते है। जाँच में पर्याप्त सबूत नहीं होने तथा काल्पनिक आरोप होने से त्वरित रूप से राजनैतिक लाभ लेने के लिये सरकारी खजाने से अरबों रूपया इस खेल में सरकारों द्वारा खर्च कर दिये जाते है। सवाल यह है कि जब जांच एजेंसियां लापरवाही या अक्षमता दिखाती हैं, तो उनके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती? इसका एक कारण संस्थागत एवं व्यक्तिगत जवाबदेही का अभाव है। जांच अधिकारी अक्सर राजनीतिक दबाव, संसाधनों की कमी या कानूनी जटिलताओं का हवाला देते हैं। सरकारें इन विफलताओं को “प्रक्रियागत” कहकर टाल देती हैं। दूसरी ओर, न्यायालय का दायरा मुख्यतः प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर निर्णय देना होता है। फैसले में अदालतें जांच की गुणवत्ता पर टिप्पणी तो कर देती हैं, फैसलों में जाँच एजेंसी के अधिकारी को दंडित करना सीमित परिस्थितियों में ही संभव हो पाता है। फिर भी, यह तर्क व्यवस्था की खामियों को ढंक नहीं सकता है। हर साल अरबों रुपये जांच के नाम पर सरकारी खजाने से खर्च होते हैं। लेकिन यदि परिणाम “ढाक के तीन पात” ही रहे, तो यह न केवल आर्थिक बल्कि नैतिक नुकसान भी है। जरूरत है, जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता के साथ-साथ उनकी सख्त जवाबदेही तय करने की। फेल हुई जांचों की अनिवार्य समीक्षा, दोषी अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई, और अभियोजन तंत्र को मजबूत करना वर्तमान समय की मांग है। जब तक जांच राजनैतिक आधार और सरकार की मनमर्जी से चलेगी, यह केवल औपचारिकता बनी रहेगी, भ्रष्टाचार पर अंकुश संभव नहीं है। न्याय केवल फैसला आने से नहीं, बल्कि प्रभावी और निष्पक्ष जांच के बाद गुण एवं दोष के आधार पर न्यायालय के फैसले आते हैं। उसके बाद ही जनता को नियम-कानून पर विश्वास होता है। वर्तमान स्थिति में आम जनता का विश्वास नियम-कानून और न्यायालयों के प्रति घट रहा है। यह चिंता का विषय है। ईएमएस / 16 अप्रैल 26