- इनपुट लागत में तेजी से बढ़ोत्तरी और मार्जिन पर दबाव के कारण उत्पादन प्रभावित नई दिल्ली (ईएमएस)। पश्चिम एशिया में गहराते संकट का असर अब सीधा मरीजों की जेब पर पड़ने वाला है। पेट्रोल-एलपीजी की बढ़ती कीमतों से पहले ही जूझ रहे आम आदमी को अब जीवनरक्षक दवाओं के लिए भी अधिक कीमत चुकानी पड़ सकती है। सरकार ने कैंसर की दवाओं, एंटीबायोटिक्स और इंजेक्शन सहित कई जरूरी औषधियों की कीमतों में लगभग 10 से 20 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी का प्रस्ताव किया है, जिसका मुख्य कारण वेस्ट एशिया में जारी तनाव के चलते दवाओं की मैन्युफैक्चरिंग लागत में भारी उछाल आना है। यह कदम फिलहाल एक अल्पकालिक समाधान के तौर पर उठाया जा रहा है, जिसकी अवधि लगभग तीन महीने तक सीमित रखने पर चर्चा हो रही है। सरकार का उद्देश्य है कि दवा उद्योग को मौजूदा संकट से राहत मिले, लेकिन उपभोक्ताओं पर लंबे समय तक बोझ न पड़े। हालांकि, मरीजों के लिए यह एक बड़ा झटका होगा, जो पहले से ही महंगाई की मार झेल रहे हैं। दवाओं की लागत में यह उछाल मुख्य रूप से खाड़ी देशों से सॉल्वेंट्स की आपूर्ति में बाधा के कारण आया है। ये सॉल्वेंट्स दवा निर्माण प्रक्रिया में जरूरी रसायनों को घोलने, शुद्ध करने और प्रोसेस करने में उपयोग होते हैं। ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी तनाव के कारण इन रसायनों की आवक कम हो गई है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में इनकी कीमतें आसमान छू रही हैं। दवा कंपनियों का कहना है कि इनपुट लागत में तेजी से बढ़ोत्तरी और मार्जिन पर दबाव के कारण उनका उत्पादन प्रभावित हो रहा है। उद्योग संगठनों जैसे ओपीपीआई और आईपीए ने सरकार से मूल्य समायोजन की मांग की है, ताकि त्पादन को बनाए रखा जा सके। कुछ उद्योग समूहों ने तो 50 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की मांग भी रखी थी। दवा निर्माताओं ने चेतावनी दी है कि यदि कीमतों में वृद्धि नहीं की गई, तो कई आवश्यक दवाओं का उत्पादन आर्थिक रूप से घाटे का सौदा बन जाएगा और उन्हें उत्पादन रोकना पड़ सकता है। इससे बाजार में दवाओं की कमी हो सकती है। विशेषज्ञों के अनुसार यदि यह स्थिति दो से तीन महीने तक बनी रहती है, तो दवा उत्पादन पर व्यापक असर पड़ सकता है। सरकार ऐसे प्रावधानों की जांच कर रही है जिनके तहत असाधारण परिस्थितियों में दवा कीमतों में बदलाव किया जा सकता है। मंजूरी मिलने पर यह बढ़ी हुई कीमत सीधे खुदरा बाजार में लागू होगी। सतीश मोरे/17अपैल ---