लेख
18-Apr-2026
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(जन्मोत्सव पर विशेष) दरअसल धर्म को सरल और बेहद कम शब्दों में इस तरह भी समझा कि समाज द्वारा स्वीकृत वो मान्यताएं हैं जिस पर चलकर मनुष्य कितना भी शक्तिशाली हो जाए किसी दूसरे का अहित नहीं कर सकता है तथा संतुलित व मर्यादित रहता है। वह धर्मनीति ही है जो मानवता का बोध कराने, अत्याचार, अनाचार, साधु-संतों के उत्थान के लिए भगवान का अनेकों रूप बनवाती है ताकि दुष्टों का संहार, विश्व कल्याण के साथ धर्म, जो मनुष्य को उसकी सीमाओं में रखता है की रक्षा की जा सके। भगवान परशुराम ऐसे ही धर्मपरायण थे, जो क्रोध के वशीभूत होकर अनाचारियों के लिए किसी काल से कम न थे। परशु पराक्रम का प्रतीक है। राम सत्य सनातन का पर्याय है। इस प्रकार परशुराम का अर्थ पराक्रम के कारक और सत्य के धारक हुआ। भगवान वासुदेव नारायण के छठवें अवतार परशुराम को शस्त्र एवं शास्त्र का प्रतीक माना जाता है। भगवान परशुराम का शस्त्र एवं शास्त्र पर समान रूप से अधिकार था, उनके जैसा पराक्रमी शायद ही कोई हुआ है। भगवान परशुराम माता रेणुका और ऋषि जमदग्नि के चौथे संतान थे। उन्हें भार्गव के नाम से भी पुकारा जाता है। परशुराम जी का जन्म अक्षय तृतीया के दिन हुआ था, इसलिए प्रत्येक वर्ष अक्षय तृतीया के दिन परशुराम जन्मोत्सव मनाया जाता है। वैशाख मास के शुक्ल पक्ष के तृतीया तिथि को पुनर्वसु नक्षत्र के रात्रि प्रथम पहर में श्रेष्ठ ग्रहों से युक्त मिथुन राशि पर राहु के स्थित रहते मां रेणुका गर्भ से भगवान परशुराम का अवतरण हुआ था, जानकार बताते हैं कि इस तिथि को प्रदोष व्यापिनी के रूप में ग्रहण करना चाहिए क्योंकि भगवान परशुराम का प्राकट्य काल प्रदोष काल ही है। भगवान परशुराम का जन्म भगवान श्रीराम से पहले हुआ था, परशुराम भगवान विष्णु के छठवें अवतार थे जबकि श्रीराम सातवें। दोनों का मिलन मिथिला नरेश राजा जनक के द्वारा आयोजित स्वयंवर के दौरान शिव धनुष भंग प्रसंग में दिखता है। भगवान परशुराम का जीवन अन्याय, अत्याचार और अधर्म के विरुद्ध संघर्ष की एक अमर गाथा है। परशुराम जी का व्यक्तित्व भारतीय संस्कृति में शास्त्र और शस्त्र के अद्भुत समन्वय का परिचायक है। भगवान परशुराम के शौर्य का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उनके आगमन से ही आततियों के जेहन में भय व्याप्त हो जाता था एवं जनता निर्भय हो जाती थी। उन्हें किसी जातिगत खांजे में डालना सबसे बड़ी भूल होगी क्योंकि वे भले की किसी जाति में अवतार लिया हो लेकिन वे सामाजिक समता, मानव कल्याण और सर्व सुलभ न्याय के प्रतीक बिंदु हैं। इतिहास गवाह है कि जब–जब आसुरी शक्ति प्रबल होने से मानव समुदाय उनकी कुकर्मों, अनीतियों, अन्याय और अत्याचार से दुखी हुए तो स्वयं भगवान अवतरित होकर उन्हें कठोर दंड दिया। परशुराम जी के जीवन चरित्र पर नजर डालें तो पता चलता है कि उन्होंने अनेकों बार आसुरी शक्तिओं को निर्मूल किया। उनका शौर्य सूर्य की भांति तेज, सुमेरू पर्वत की तरह अडिग था। वे अपने मन की गति से कहीं भी आ जा सकते थे। उन्होंने अधर्मियों का नाश कर शाश्वत मानवीय मूल्य की स्थापना की साथ ही उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन तपस्या और जनकल्याण के लिए समर्पित किया। महेंद्र पर्वत पर उनका तप और ऋषि कश्यप को अपनी समस्त पृथ्वी दान कर देना उनके त्याग और निष्काम कर्म का सर्वोच्च उदाहरण है। जानें कैसे कहलाये जमदाग्नि पुत्र परशुराम बचपन में भगवान परशुराम का नाम राम था। बचपन में उनके माता–पिता उन्हें राम कहकर पुकारते थे। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार कहा जाता है। जब वह बड़े हुए तो पिता ने उन्हें भगवान शिव की अराधना करने के लिए कहा। पिता की आज्ञा से भगवान शिव की तपस्या में लीन हो गये। उनकी घनघोर तपस्या से देवाधिदेव महादेव काफी प्रसन्न हुए और उन्हें आसुरी शक्ति को नाश कर धर्म की संस्थापना करने का आदेश दिया। इस दौरान भगवान शिव ने उन्हें परशु (फरसा) नामक शस्त्र दिया, यह परशु उन्हें बहुत प्रिय था तबसे उनके नाम के आगे परशु लग गया और वे परशुराम हो गये। उन्होंने अपने पराक्रम से असुरों का नाश किया। असुर जाति उनके नाम से ही भयभीत हो जाते थे। कलियुग में कल्कि को शिक्षा देंगे परशुराम भगवान परशुराम को शौर्य और पराक्रम का अवतार माना जाता है। मान्यता है कि परशुराम जी अनादिकाल तक इस सृष्टि में विराजमान रहेंगे। उन्हें त्रेता युग के राम के काल में देखा और द्वापर युग के कृष्ण काल में भी। उन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण को सुदर्शन चक्र उपलब्ध करवाया था। वे सृष्टि के अंत तक पृथ्वी पर तपस्यारत रहेंगे और कल्कि अवतार में कल्कि को भी शिक्षा देंगे। सनातनी पौराणिक कथाओं में उल्लेख है कि महेन्द्रगिरि पर्वत पर भगवान परशुराम की तप की जगह थी और अंतिम वे उसी पर्वत पर कल्पांत तक के लिए तपस्या के लिए चले गये थे। युवाओं के लिए प्रेरणा परशुराम जयंती युवाओं के लिए अनुशासन और धर्म का पालन करने का दिन है। उनका जीवन हमें सिखाता है कि आत्म-सम्मान की रक्षा के लिए शौर्य का होना आवश्यक है, लेकिन उस शौर्य को धर्म के मार्ग पर चलना चाहिए। वे यह संदेश देते हैं कि धर्म की विजय निश्चित है। सर्व समाज को संदेश भगवान परशुराम एक चिरंजीवी (अमर) अवतार हैं। वे आज भी हमारे बीच न्याय की भावना के रूप में विद्यमान हैं। इस पावन अवसर पर हमें उनके द्वारा दिखाए गए मार्ग पर चलने और एक समतामूलक, न्यायप्रिय समाज के निर्माण की शपथ लेनी चाहिए। साथ ही भगवान परशुराम को किसी एक जाति में बाधना उचित नहीं है, क्योंकि वह किसी जाति विशेष के नहीं बल्कि सर्व समाज के आराध्य हैं। उन्होंने सर्व समाज को दिशा देने का काम किया था। उन्होने कहा कि भगवान परशुराम त्याग की प्रतिमूर्ति थे। उन्होंने बुराइयों का डटकर विरोध करते हुए एक संगठित समाज की स्थापना की। ( लेखक आध्यात्मिक चिंतक एवं सर्व ब्राह्मण महासंघ के युवा अध्यक्ष हैं) ईएमएस / 18 अप्रैल 26