क्षेत्रीय
22-Apr-2026
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मुंबई, (ईएमएस)। एक ग्रंथपाल को सेवानिवृत्ति लाभ न देने के मामले में दाखिल याचिका पर समय पर जवाब न देना ठाणे महानगरपालिका के आयुक्त को भारी पड़ गया। इस मामले में बॉम्बे हाई कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाते हुए आयुक्त के खिलाफ जमानती वारंट जारी कर दिया। हालांकि, इस कार्रवाई के बाद ठाणे मनपा प्रशासन तुरंत सक्रिय हुआ और आयुक्त की ओर से वकील ने अदालत में पेश होकर बिना शर्त माफी मांगी। वकील ने कोर्ट को आश्वासन दिया कि जल्द ही याचिका पर आवश्यक जवाब दाखिल कर दिया जाएगा। आयुक्त की ओर से दिए गए इस माफीनामे को स्वीकार करते हुए हाई कोर्ट ने अपने पहले के आदेश को वापस लेते हुए जमानती वारंट रद्द कर दिया। दरअसल यह मामला एक लाइब्रेरियन (ग्रंथपाल) की याचिका से जुड़ा है, जिसमें उसने अपने पेंशन से संबंधित मुद्दे पर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। अदालत ने एक महीने पहले ही ठाणे महानगरपालिका और संबंधित शिक्षण संस्था को जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया था, लेकिन इसके बावजूद न तो जवाब पेश किया गया और न ही सुनवाई के दौरान कोई वकील कोर्ट में मौजूद रहा। इस पर न्यायमूर्ति रविंद्र घुगे और न्यायमूर्ति हितेन वेनेगेवकर की खंडपीठ ने गहरी नाराज़गी जताई। सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति घुगे ने व्यंग्यात्मक अंदाज़ में कहा, “हम अभी आपको एक न्यायिक ‘जादू’ दिखाते हैं। अभी कोर्ट में कोई मौजूद नहीं है, लेकिन हमारे आदेश के 30 मिनट के भीतर कोई न कोई हाज़िर हो जाएगा।” इसके बाद अदालत ने सुबह के सत्र में ठाणे मनपा आयुक्त और संबंधित संस्था के प्रमुख के खिलाफ 15 हजार रुपये के जमानती वारंट जारी करने का आदेश दे दिया। अदालत के इस कड़े कदम का असर तुरंत देखने को मिला। दोपहर के सत्र में ठाणे मनपा के वकील कोर्ट में उपस्थित हुए और अनुपस्थिति के लिए बिना शर्त माफी मांगी। उन्होंने स्वीकार किया कि यह उनकी गलती थी। इसके बाद हाईकोर्ट ने अपना पूर्व आदेश वापस ले लिया। अदालत ने इस दौरान यह भी टिप्पणी की कि आम नागरिकों के मामलों को प्रशासन द्वारा इतनी हल्के में लेना गंभीर चिंता का विषय है। न्यायपालिका पर लोगों का भरोसा बना रहे, इसके लिए जरूरी है कि प्रशासन अपनी जिम्मेदारियों को गंभीरता से निभाए। बहरहाल यह मामला इस बात का उदाहरण बन गया कि अदालत अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर प्रशासन को जवाबदेह बनाने में कितनी सख्ती दिखा सकती है। - संजय/संतोष झा-२२ अप्रैल/२०२६/ईएमएस