क्षेत्रीय
22-Apr-2026
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मुंबई, (ईएमएस)। मुंबई में अवैध फेरीवालों के बढ़ते कब्जे और प्रशासन की निष्क्रियता पर बॉम्बे हाई कोर्ट ने कड़ी नाराज़गी जताई है। अदालत ने साफ कहा कि जब पुलिस और महानगरपालिका ही फेरीवालों को अप्रत्यक्ष संरक्षण दे रहे हों, तो आम नागरिक आखिर न्याय के लिए कहाँ जाए? कोर्ट में सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति अजय गडकरी और न्यायमूर्ति कमल खाता की खंडपीठ ने राज्य सरकार को कड़े शब्दों में फटकार लगाई। अदालत ने कहा कि अवैध फेरीवालों पर कार्रवाई के बाद वे दोबारा उसी जगह न लौटें, यह सुनिश्चित करना पुलिस की जिम्मेदारी है। इस संबंध में क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे, इसका विस्तृत जवाब अगले सप्ताह पेश करने का आदेश दिया गया है। सुनवाई के दौरान महानगरपालिका और पुलिस एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते नजर आए। महानगरपालिका के वकील ने कहा कि कार्रवाई के बाद फेरीवालों को रोकना पुलिस का काम है, जबकि सरकारी वकील ने तर्क दिया कि पुलिस कार्रवाई के समय महानगरपालिका अधिकारी का मौजूद रहना जरूरी है। इस पर अदालत ने दोनों पक्षों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि इसी टालमटोल की वजह से फेरीवालों का मनोबल बढ़ रहा है। अदालत ने यह भी पूछा कि जब पुलिस नियमित गश्त करती है, तो फिर पुलिस थानों के सामने तक फेरीवालों का जमावड़ा कैसे लग जाता है? अगर ऐसी स्थिति है तो गश्त का क्या मतलब रह जाता है? दरअसल यह मामला गोरेगांव पश्चिम इलाके से जुड़ा है, जहां गोरेगांव व्यापारी संघ ने याचिका दायर की है। याचिका में कहा गया है कि गोरेगांव रेलवे स्टेशन और आसपास के क्षेत्रों में अवैध फेरीवालों ने सार्वजनिक जगहों पर कब्जा कर लिया है, जिससे लोगों के चलने तक की जगह नहीं बची। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि कई बार शिकायत के बावजूद न तो पुलिस और न ही महानगरपालिका कोई ठोस कार्रवाई करती है। यहां तक कि कार्रवाई से पहले ही फेरीवालों को सूचना मिल जाती है, जिससे वे बच निकलते हैं। कुछ मामलों में फेरीवालों द्वारा लोगों के साथ मारपीट की घटनाएं भी सामने आई हैं। इन गंभीर आरोपों को देखते हुए हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और प्रशासन को कड़ी चेतावनी दी है और स्पष्ट किया है कि कानून व्यवस्था बनाए रखने में किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। - संजय/संतोष झा-२२ अप्रैल/२०२६/ईएमएस