ज़रा हटके
23-Apr-2026
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लंदन (ईएमएस)। अत्यधिक स्क्रीन टाइम बच्चों में वर्चुअल ऑटिज्म नामक एक गंभीर स्थिति को जन्म दे रहा है, जो उनके तंत्रिका तंत्र और सामाजिक विकास पर गहरा और नकारात्मक असर डाल रही है। यह कोई जन्मजात विकार नहीं है, बल्कि डिजिटल उपकरणों के बेतहाशा इस्तेमाल से पैदा हुई एक समस्या है, जिससे बच्चे बाहरी दुनिया से कटकर एक आभासी संसार में सिमटते जा रहे हैं। यह कहना है हेल्थ विशेषज्ञों का। आज के डिजिटल युग में, बच्चों को व्यस्त रखने के लिए माता-पिता द्वारा मोबाइल, टैबलेट और टेलीविजन जैसे गैजेट्स का सहारा लेना एक आम चलन बन गया है। हालांकि, विशेषज्ञ अब इस आदत को लेकर गंभीर चेतावनी दे रहे हैं। विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, जब बच्चे घंटों तक निर्जीव स्क्रीन से चिपके रहते हैं, तो वे बाहरी मानवीय संवेदनाओं से खुद को पूरी तरह अलग कर लेते हैं। यह अलगाव उनके सामाजिक विकास में बाधा डालता है, जिससे वे लोगों से बातचीत करने, आँखों में आँखें डालकर संवाद करने या भावनात्मक प्रतिक्रिया देने में हिचकिचाते हैं। उनकी दुनिया केवल गैजेट्स के भीतर ही सीमित होकर रह जाती है। उनका कहना है कि बच्चों की रुचि किताबों से हटकर अब पूरी तरह से गैजेट्स की ओर स्थानांतरित हो रही है, जहाँ वे चीजों को अलग तरीके से सीख रहे हैं। हालांकि, यह भी स्वीकार किया गया कि यह बदलाव बच्चों को वास्तविक दुनिया से दूर कर सकता है और उनके सामाजिक कौशल को गंभीर रूप से प्रभावित कर सकता है। जब बच्चा मानवीय संवेदनाओं की बजाय निर्जीव स्क्रीन से जुड़ जाता है, तो वह बाहरी दुनिया से कटकर वर्चुअल दुनिया में सिमटा रह जाता है, जिससे उसका बौद्धिक विकास भी ठीक से नहीं हो पाता है। वर्चुअल ऑटिज्म के संकेतों को पहचानना माता-पिता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। विशेषज्ञों ने बताया कि यदि आपका बच्चा किसी से आँखें नहीं मिलाता, बार-बार बुलाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं देता, या अपने गैजेट में पूरी तरह लीन रहता है, तो यह वर्चुअल ऑटिज्म की ओर इशारा कर सकता है। ऐसे बच्चे बाहरी दुनिया से कटकर एक आभासी दुनिया में कैद हो जाते हैं, जिससे उनका बौद्धिक और भावनात्मक विकास रुक जाता है। उनमें सहानुभूति, संवाद कौशल और सामाजिक संपर्क स्थापित करने की क्षमता कम होने लगती है, जो उनके भविष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकती है। यह स्थिति उनकी सीखने की क्षमता और भावनात्मक बुद्धिमत्ता को भी प्रभावित करती है। इस गंभीर समस्या से अपने बच्चों को बचाने के लिए माता-पिता को सक्रिय भूमिका निभानी होगी। सबसे पहला कदम है स्क्रीन टाइम को सख्ती से नियंत्रित करना और उसके लिए स्पष्ट नियम बनाना। बच्चों के साथ गुणवत्तापूर्ण समय बिताना, उनसे बातें करना, उन्हें कहानियां सुनाना और उनके साथ विभिन्न खेलों में शामिल होना बेहद जरूरी है। उन्हें आउटडोर गेम्स और शारीरिक गतिविधियों में शामिल करना चाहिए, जिससे उनका दिमाग ही नहीं बल्कि शरीर भी स्वस्थ और सक्रिय रहे। सुदामा/ईएमएस 23 अप्रैल 2026