चुनाव आयोग ने पश्चिम बंगाल में तार्किक विसंगति के नाम पर 27 लाख, 10 हजार नागरिकों के नाम मतदाता सूची से हटा दिए हैं। इन नागरिक मतदाताओं को अंतिम समय तक वोट डालने का अधिकार नहीं मिला। सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर 19 न्यायाधिकरण भी बनाए गए। यह भी मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा नहीं कर पाए। लाखों की संख्या में मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो गए। यह सब लोकतांत्रिक, संवैधानिक संस्थाओं ने अधिकारों के नाम पर किया है। इस प्रक्रिया में इन लाखों मतदाताओं के अधिकार कहां चले गए। इसमें कौन सा तर्क है, और कौन सा वितर्क है? इसका जवाब कोई नहीं दे रहा है। जो ट्रिब्यूनल सुप्रीम कोर्ट आदेश पर बनाए गए थे, उन्हें मतदान के दो दिन पहले तक सुनवाई कर निर्णय देना था। सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में दो दिन पहले तक मतदाता सूची को अपडेट करने की जिम्मेदारी चुनाव आयोग को दी थी। याचिकाकर्ताओं को सुप्रीम कोर्ट में भरोसा दिलाया गया था, मतदाताओं के साथ न्याय होगा। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट, ट्रिब्यूनल सब जगह मतदाता घूमते रह गए। कहीं से भी न्याय नहीं मिला। लाखों मतदाताओं ने सुनवाई के लिए ट्रिब्यूनल में आवेदन लगाए। 21 अप्रैल तक मात्र 138 लोगों के नाम मतदाता सूची में जोड़े गए। चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति के पक्ष में जो तर्क सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में दिए थे, वह सब हवा-हवाई साबित हुए। 2002 की मतदाता सूची में जिन मतदाताओं के नाम थे, तार्किक विसंगति के नाम पर उनके भी नाम काट दिए गए। इसका क्या तर्क है, यह चुनाव आयोग नहीं बता पा रहा है। इसको देखते हुए यही कहा जा सकता है- समरथ को नहीं दोष गुसाईं। चुनाव आयोग ने तार्किक विसंगति के नाम पर पहले 60 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काट दिए। जिनके नाम कटे उसमें सारे गरीब- गुरवे थे, जो कई दिनों तक नाम जुड़वाने के लिए अपनी नौकरी, कारोबार, मजदूरी छोड़कर चक्कर लगाते रह गए। मतदाता सूची में नाम जुड़वाने के नाम पर उन्हें भूखा भी रहना पड़ा। मजदूरी पर नहीं जाने के कारण उनके परिवार के लोगों को खाने-पीने और आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा। जिस जनता के अधिकारों के लिए चुनाव आयोग, हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट व राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है, वह उनके अधिकारों की रक्षा करने में सफल नहीं हो पाए। तार्किक विसंगति के नाम पर सही मतदाता सूची को बनाने के नाम पर लाखों मतदाताओं के नाम जोड़ने की जगह काटे गए है। करोड़ों रुपए इसमें सरकारी खजाने से खर्च किए गए। कई राज्यों के न्यायिक अधिकारियों को चुनाव के काम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश से लगा दिया गया। इसका कोई फायदा ही नहीं हुआ। गरीब आखिर गरीब ही होता है। गलती कोई भी करे, गरीब के नसीब में यदि कष्ट लिखा हुआ है, तो कोई क्या कर सकता है। चुनाव आयोग ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिए तार्किक विसंगति की जो रूपरेखा तय की थी, उसका उपयोग केवल पश्चिम बंगाल में किया गया है। चुनाव आयोग और उसमें काम करने वाले लोगों ने डाटा एंट्री मे जो गलती की हैं, उनके द्वारा तैयार किए गए सॉफ्टवेयर की गलतियों का खामियाजा पश्चिम बंगाल के मतदाताओं को भोगना पड़ा है। इससे इनकार नहीं किया जा सकता है। सबसे बड़ी आशंका की बात यह है, बांग्लादेश में जब शेख हसीना का चुनाव हुआ था। वहां पर भी कुछ इसी तरह की स्थितियां बनी थीं। बांग्लादेश के चुनाव आयोग ने शेख हसीना की पार्टी को चुनाव जिताने के लिए जो मदद की थी, अब वही सब कुछ पश्चिम बंगाल में देखने को मिल रहा है। चुनाव आयोग द्वारा चुनाव में जिस तरह की क्रिया और प्रतिक्रिया की जा रही है। उसके परिणाम किस रूप में सामने आयेंगे कहना मुश्किल है। बांग्लादेश में भी बंगाली समुदाय और बंगाली संस्कृति के नागरिक थे। पश्चिम बंगाल में भी बंगाली हैं। बंगालियों का डीएनए एक तरह का है। यह आसानी से अपने ऊपर जुल्म बर्दाश्त नहीं कर पाते हैं। यह बंगालियों का इतिहास है। तार्किक विसंगति के नाम पर कुतर्क का जो खेल पश्चिम बंगाल में खेला गया है, उसकी परणति किस रूप में होगी इसका पता तो भविष्य में ही चलेगा। ईएमएस / 23 अप्रैल 26