इस फैसले से भारत को होगा फायदा, चीन आक्रमता पर लगेगी लगाम नई दिल्ली,(ईएमएस)। जापान ने अपनी दशकों पुरानी शांतिवादी नीति में बड़ा बदलाव कर अन्य देशों को घातक हथियारों के निर्यात की अनुमति दे दी है। यह निर्णय जापान के युद्धोत्तर संवैधानिक ढांचे से महत्वपूर्ण बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है, जिसे ढांचे ने लंबे समय तक केवल आत्मरक्षा तक सीमित रखा था। इस कदम के पीछे बदलते वैश्विक और क्षेत्रीय सुरक्षा परिदृश्य की बड़ी भूमिका है, विशेष रूप से चीन की बढ़ती सैन्य आक्रामकता और उत्तर कोरिया की उकसाने वाली गतिविधियां प्रमुख है। बदलते घटनाक्रम में जापान को अहसास होने लगा कि अब अमेरिका के भरोसे रहना ठीक नहीं है। इस लिए जापान ने अपनी 75 साल पुरानी रणनीति में व्यापाक बदलाव किए है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जापान ने 1947 में नया संविधान अपनाया था, जिसमें अनुच्छेद 9 के तहत युद्ध करने के अधिकार का त्याग किया गया। यह संविधान अमेरिका के प्रभाव में तैयार हुआ था। युद्ध के दौरान हिरोशिमा और नागासिकी पर परमाणु हमलों और व्यापक विनाश के बाद जापान ने शांतिवाद को अपनी राष्ट्रीय नीति बना लिया था। 1951 की सुरक्षा संधि के तहत उसकी सुरक्षा काफी हद तक अमेरिका पर निर्भर रही, और 1954 में गठित आत्मरक्षा बलों की भूमिका भी सीमित रखी गई। हालांकि, समय के साथ बदलते परिदश्य को देखते हुए जापान ने अपनी नीतियों में धीरे-धीरे बदलाव करना शुरू किया। 2009 में सामूहिक आत्मरक्षा के अधिकार की नई व्याख्या की गई, जिससे वह अपने सहयोगियों की रक्षा में भाग ले सकता है। 2015 में विदेशी सैन्य अभ्यासों में भागीदारी को आसान किया गया और 2022 में लंबी दूरी की मिसाइलों के अधिग्रहण के जरिए प्रति आक्रमण क्षमता विकसित करने की दिशा में कदम उठाया गया। इतना ही नहीं जापान ने रक्षा बजट में भी उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। 2024 में जापान ने जीडीपी के 1 प्रतिशत की सीमा समाप्त की और 2027 तक 2 प्रतिशत तक बढ़ाने का लक्ष्य रखा। 2026 तक उसका रक्षा बजट लगभग 52 अरब डॉलर तक पहुंच गया है, जो बीते वर्षों की तुलना में बड़ी छलांग है। यह वृद्धि उसकी नई रणनीतिक प्राथमिकताओं को दिखाती है। बात दें कि जापान के पास अत्याधुनिक सैन्य तकनीक है, जिसमें उन्नत पनडुब्बियां, युद्धपोत, वायु रक्षा प्रणाली और निगरानी उपकरण शामिल हैं। अब हथियार निर्यात की अनुमति मिलने से वह वैश्विक रक्षा बाजार में एक प्रमुख खिलाड़ी बन सकता है। इस बदलाव से न केवल उसकी अर्थव्यवस्था को बल मिलेगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसकी रणनीतिक भूमिका भी बढ़ेगी। इस बदलाव का असर जापान के पुराने मित्र भारत जैसे देशों पर भी पड़ेगा। भारत और जापान पहले से ही क्वाड समूह के सदस्य हैं, जिसमें अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया भी शामिल हैं। यह समूह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संतुलन बनाए रखने का प्रयास करता है। भारत और जापान के बीच रक्षा सहयोग लगातार मजबूत हो रहा है, जिसमें संयुक्त सैन्य अभ्यास, तकनीकी सहयोग और सह-उत्पादन शामिल हैं। भारत के “मेक इन इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” अभियानों ने रक्षा उत्पादन में नई संभावनाएं पैदा की हैं। इसके बाद जापानी कंपनियां भारत में निवेश कर उत्पादन कर सकती हैं और वैश्विक बाजार तक पहुंच बना सकती हैं। इससे दोनों देशों को आर्थिक और सामरिक लाभ मिल सकता है। सामरिक दृष्टि से यह निर्णय एशिया-प्रशांत क्षेत्र में शक्ति संतुलन को प्रभावित करेगा। इससे चीन के प्रभाव को चुनौती मिल सकती है और क्षेत्रीय प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। साथ ही, जापान और अमेरिका के संबंध और मजबूत हो सकते है। जापान का यह कदम केवल नीति परिवर्तन नहीं, बल्कि एक बड़े रणनीतिक बदलाव का संकेत है। इसके प्रभाव आने वाले वर्षों में वैश्विक राजनीति, सुरक्षा व्यवस्था और आर्थिक साझेदारियों में स्पष्ट रूप से देखने को मिलने वाले है। आशीष/ईएमएस 25 अप्रैल 2026