लेख
25-Apr-2026
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देश में इस समय एसआईआर केंद्रीय चुनाव आयोग, राज्य चुनाव आयोग केंद्र सरकार और राज्य सरकारोंके चुनाव अ‎धिकारों को लेकर देशभर में चर्चा का विषय बनकर सामने आ रहे हैं। लोकसभा और विधानसभा के चुनाव कराने की जिम्मेदारी केंद्रीय चुनाव आयोग की होती है। लोकसभा और विधानसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए केंद्रीय चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने 22 से अधिक राज्यों में एसआईआर के माध्यम से मतदाता सूची के शुद्धिकरण का अभियान चला रखा है। अभी तक जिन राज्यों में एसआईआर हुई है, उन राज्यों में लगभग 5.50 करोड़ मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से काट दिए गए हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग ने उन्हें मतदान योग्य नागरिक नहीं माना है। जिस तरह से अभी तक एसआईआर के माध्यम से मतदाताओं के नाम काटे जा रहे हैं, उसके अनुसार एसआईआर का काम पूर्ण होने पर लगभग 10 करोड़ मतदाताओं के नाम कटना तय माना जा रहा है। इसी बीच राज्य चुनाव आयोग द्वारा भी नगरीय निकायों और पंचायत चुनावों के लिए अलग से मतदाता सूची तैयार की जाती है राज्य स्तर की मतदाता सूची और केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा तैयार की गई मतदाता सूची में बड़े राज्यों में करोड़ों मतदाताओं का अंतर है। इस बात को सबसे पहले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उजागर करते हुए कहा था, राज्य की मतदाता सूची में जो नाम दर्ज हैं, उनके नाम केंद्रीय मतदाता सूची में क्यों नहीं हैं। यही सवाल पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी भी लगातार उठाती आ रही हैं। हाल ही में मध्य प्रदेश में नगरीय निकाय एवं पंचायत के चुनाव की तैयारी शुरु हो गई है। म.प्र. के राज्य चुनाव आयुक्त ने कहा है, 2027 में होने वाले चुनाव पुराने परिसीमन के आधार पर ही चुनाव संपन्न कराए जाएंगे। हाल ही में केंद्रीय चुनाव आयोग के आदेश पर जो परिसीमन हुआ था। वह मतदाता सूची राज्य चुनाव आयोग मान्य नहीं कर रहा है। जिस तरह की स्थिति देश में चुनावों को लेकर बन रही है, उसमें केंद्रीय चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग की मतदाता सूची को लेकर विवाद की स्थिति बन रही है। राज्य सरकारों और राज्य चुनाव आयोग राज्य की तैयार मतदाता सूची से ही चुनाव कराना चाहती हैं। यदि ऐसा नहीं हुआ तो संपूर्ण राज्य में जगह-जगह मतदाता विरोध में खड़े हो जाएंगे। राज्यों में स्थानीय संस्थाओं के प्रतिनिधियों का चुनाव होता है। ऐसी स्थिति में राज्यों की राजनै‎तिक एवं कानून व्यवस्था की स्थिति प्रभावित हो सकती है। जिस तरह के हालत अभी देखने को मिल रहे हैं। उसके बाद यह कहने में संकोच नहीं है, भारत एक देश है। इसके बाद भी केंद्रीय चुनाव आयोग और राज्य चुनाव आयोग की मतदाता सूची अलग-अलग है। केंद्रीय चुनाव आयोग के नियम कानून और निर्देश पर राज्यों के चुनाव आयोग काम करते हैं। केंद्रीय चुनाव आयोग जिन्हें मतदाता नहीं मान रहा है। राज्य का चुनाव आयोग उन्हें मतदाता मानता है। नागरिकता तय करने का अधिकार केंद्रीय गृह मंत्रालय को है। केंद्रीय गृह मंत्रालय चुप है। अब नागरिकता और मतदाता के मतदान का अधिकार तय करने का काम केंद्रीय चुनाव आयोग कर रहा है। इसको लेकर ‎जिस तरह की अपरा तफरी सारे देश में मची हुई है, उसमें अब न्यायपालिका भी चर्चाओं में आ गई है। 10 महीने से ज्यादा हो गए बिहार ‎विधानसभा चुनाव के पहले एसआईआर की या‎चिका पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई चल रही है। न्यायपालिका अभी तक केंद्रीय चुनाव आयोग द्वारा जो एसआईआर कराई जा रही है। वह संवैधानिक है या नहीं इसका फैसला अभी तक सुप्रीम कोर्ट नहीं कर पाया है। सारी याचिकाएं लंबित पड़ी हुई हैं। इसी बीच राज्यों के चुनाव भी हो रहे हैं, एसआईआई भी हो रही है। स्वतंत्र भारत के इतिहास में यह स्थिति पहली बार सं‎‎विधान और लोकतां‎त्रिक व्यवस्था के लागू होने पर देखने को मिल रही है। देश में पहली बार सुप्रीम कोर्ट ने अपने ही जजों को एसआईआर के काम में लगा ‎दिया है। ‎जिससे न्यायपालिका खुद पार्टी बनती हुई नजर आ रही है। यह स्थिति राजनीतिक प्रशासनिक और कानून व्यवस्था के लिए आगे चलकर बड़ी चुनौती बन सकती है। ‎जिस तरह से मतदाताओं के अ‎धिकारी पर केंची चलाई जा रही है, संवैधा‎निक एवं प्रशास‎निक ‎जिम्मेदारी ‎जिनके उपर है वह नाग‎रिकों के जब मौ‎लिक अ‎धिकार खत्म ‎किये जा रहे हों, उस समय वह चुप बैठकर तमाश देखें, इसकी कल्पना ‎किसी ने नहीं की थी। न्यायपा‎लिका ‎जिस तरह सरकार के दबाव में तारीख पर तारीख, आधे-अधूरे ‎निर्णय देकर अपना पल्ला झाड़ती हुई नजर आती है, इससे आम जनमानस के बीच न्यायपा‎लिका की साख कमजोर होती जा रही है। कानून का राज तभी तक रहता है जब तक जनता कानून मानती है। कानून पर ‎विश्वास नहीं होगा तो जनता भीड़तंत्र और अराजकता के कानून को मानने लगती है। सरकार और न्यायपा‎लिका को अपनी ‎जिम्मेदारी और जवाबदेही तय करने की जरुरत है। एसजे/ 25 अप्रैल /2026