आपाधापी और भागम-भाग, तनाव और अवसाद की इस दुनिया में आदमी अक्सर जीता है अधूरी सी ज़िंदगी, किसी अधूरी कविता की तरह, जिसके छंद बिखरे पड़े हों। कुछ कमी सी लगती रहती है उसे, हर पल, हर क्षण, मानो पूर्णता कहीं दूर खड़ी हो। काश कि... के सहारे दिन काटता है आदमी, भ्रम के भँवर में डूबता-उतराता, भीतर से अशांत, बाहर से मुस्कुराता। पर सत्य यह है कि पूर्णता किसी बाज़ार में नहीं बिकती, न वस्तुओं के अंबार में मिलती है, न दूसरों की प्रशंसा में। पूर्णता तो छिपी है अपने ही मन के शांत सरोवर में, जहाँ संतोष की लहरें उठती हैं। जब आदमी रुककर स्वयं को पढ़ता है, अपनों का हाथ थामता है, छोटी खुशियों को जीता है, तब अधूरी कविता भी पूर्ण गीत बन जाती है। जीवन का अर्थ सब पा लेना नहीं, जो है उसे प्रेम से जी लेना है। मन में दीप जले तो समझो- पूर्णता बाहर नहीं, तुम्हारे भीतर ही रहती है। ( फ्रीलांस राइटर, कॉलमिस्ट व युवा साहित्यकार) .../ 25 अप्रैल /2026