लंदन (ईएमएस)। दुनिया की लगभग एक-तिहाई वयस्क आबादी हर रात पर्याप्त नींद नहीं ले पाती, लेकिन एक छोटा सा हिस्सा ऐसा है जिसके लिए यह समस्या है ही नहीं। दुनिया की आबादी के केवल 1 से 3 प्रतिशत लोगों को सामान्य लोगों की तरह 8 घंटे की नींद की आवश्यकता नहीं होती। इन्हें कम सोने वाले के रूप में जाना जाता है। ये लोग लगातार चार से छह घंटे की नींद लेकर भी हममें से बाकी लोगों की तरह ही अच्छा काम कर सकते हैं और पूरी तरह से सक्रिय रहते हैं। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि वैज्ञानिक अब इसके पीछे के असली कारण को समझने लगे हैं। विज्ञान यह मानता है कि एक दिन ऐसा आ सकता है जब दुनिया के ज्यादातर लोग ऐसा कर सकें। प्राकृतिक रूप से कम नींद आना कोई मानसिक स्थिति, आदत या इच्छाशक्ति का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक जैविक भिन्नता है। पिछले दो दशकों में शोधकर्ताओं ने जीन के एक छोटे समूह की पहचान की है जो इन कम सोने वाले व्यक्तियों में पाया जाता है और उन्हें स्वस्थ रहने में मदद करता है। शुरुआती सुरागों में एक डीईसी2 नामक जीन से मिला, जो ऑरेक्सिन नामक एक मस्तिष्क रसायन के स्तर को विनियमित करने में मदद करता है। ऑरेक्सिन वह रसायन है जो मस्तिष्क की चेतनता या जागृति को बढ़ाता है। ऑरेक्सिन की बहुत कम मात्रा से नार्कोलेप्सी जैसी गंभीर नींद संबंधी समस्या हो सकती है, लेकिन जो लोग कम सोते हैं, वे इसका अधिक उत्पादन करते हैं, जिससे वे बहुत कम आराम में भी सतर्क और ऊर्जावान रहते हैं। ऑरेक्सिन का निर्माण मस्तिष्क के हाइपोथैलेमस में होता है, और यह सतर्कता, एकाग्रता तथा नियमित नींद चक्र को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। वैज्ञानिकों ने चूहों पर इस पर प्रयोग किया। जब शोधकर्ताओं ने चूहों में ऑरेक्सिन इंजेक्ट किया, तो पाया गया कि इससे वे चूहे कम सोने लगे, लेकिन उनकी फुर्ती या सतर्कता में कोई बदलाव नहीं आया। उनमें कोई थकावट या दूसरी दिक्कत नजर नहीं आई, जो आमतौर पर नींद की कमी के कारण होती है। जब भी वैज्ञानिकों ने ऑरेक्सिन को चूहों में इंजेक्ट किया, परिणाम यही मिला: उनके नींद के चक्र छोटे हो गए, और इसका कोई गलत असर उन पर नहीं दिखा। सलाहकार न्यूरोलॉजिस्ट और नींद विशेषज्ञ प्रोफेसर गाय लेस्चज़िनर के अनुसार, अब तक जो जानकारी है, उससे पता चलता है कि प्राकृतिक रूप से कम नींद आना पूरी तरह से आनुवंशिक है, इसमें कोई गड़बड़ वाली बात नहीं। ऐसे लोग अपनी कम नींद से होने वाली मुश्किलों के कारण शायद ही कभी डॉक्टर के पास जाते हैं, क्योंकि उन्हें कम नींद से कोई विकार होता ही नहीं। जिन लोगों में यह होता है, उन्हें अक्सर एहसास नहीं होता कि वे असामान्य हैं, बल्कि कई बार तो पूरा परिवार कई पीढ़ियों से ऐसा कर रहा होता है, जिसके लिए यह सामान्य सी बात होती है। यह सत्य है कि ऐसे लोग दुनिया में दुर्लभ हैं, अनुमानित रूप से एक से चार लाख लोग ही ऐसे हैं जो चार घंटे में दुरुस्त रहते हैं। लेकिन विज्ञान अब उनके बारे में तेजी से समझ रहा है और इस जानकारी का उपयोग नींद संबंधी विकारों से ग्रस्त सामान्य लोगों के लिए नई दवाएं विकसित करने में कर रहा है। साइंस हालांकि यह भी कहती है कि ऐसे दुर्लभ लोगों में डीईसी2, एडीआरबी1, एनपीएसआर1 या एसआईके3 (एसआईके3) में जीन म्यूटेशन होते हैं। ये म्यूटेशन नींद-जागृति चक्र को प्रभावित करते हैं, जिससे शरीर सोते समय ज्यादा कुशलता से काम करता है और जागने वाले न्यूरॉन्स ज्यादा सक्रिय रहते हैं। साइंस इन म्यूटेशन से प्रेरित दवाएं बना रही है जो सामान्य लोगों की नींद की गुणवत्ता में सुधार कर सकेंगी और नींद संबंधी विकारों का इलाज करेंगी। सुदामा/ईएमएस 26 अप्रैल 2026