लेख
26-Apr-2026
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आम आदमी पार्टी (आप) के सांसदों के इस्तीफे और उनके भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने से “लोटस अभियान” को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। विशेष रूप से पंजाब, जहां आप की सरकार है, पंजाब की राजनीति के लिये यह बहुत बड़ा परिवर्तन है। पंजाब में भाजपा लंबे समय से अपनी जमीन मजबूत करने की कोशिश कर रही है। शिरोमणि अकाली दल के साथ मिलकर भाजपा 5 दशक से अपना झंडा गाड़ना चाहती थी, लेकिन वह आज तक सफल नहीं हो पाई। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल, इंडियन नेशनल कांग्रेस और आप आदमी पार्टी की पैठ हैँ। कांग्रेस में पिछले दशक में काफी तोड़-फोड़ हुई है। अब आप नेताओं में दल-बदल शुरू हुआ है। पंजाब में आम आदमी पार्टी के 7 सांसदों का इस्तीफा इस बात का संकेत है। आने वाले समय में पंजाब की राजनीति में बड़े राजनीतिक बदलाव होने जा रहे हैं। पंजाब सरकार इस संकट में गिर भी सकती है। अरविन्द केजरीवाल की नजर पंजाब के बाद गुजरात पर बनी हुई है। अगले वर्ष पंजाब और गुजरात में चुनाव होना है। गुजरात में केजरीवाल सीधे प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती दे रहे हैं। भाजपा इसे चुनौती मानकर आम आदमी पार्टी को पंजाब में उलझाकर गुजरात में केजरीवाल और आप को रोकना चाहती है। वहीं पंजाब में भाजपा कब्जा करना चाहती है। ताकि वह अन्य राज्यों में आम आदमी पार्टी और इंडिया गठबंधन के विस्तार को रोक सके। भाजपा ने यह राजनीतिक सक्रियता ऐसे समय में बढ़ाई है, जब बंगाल और तमिलनाड़ु सहित कई राज्यों में चुनावी प्रक्रिया जारी है। उनके परिणाम जल्द आने वाले हैं। भाजपा ने नारी वंदन अधिनियम के तहत महिलाओं को 33 फीसदी आरक्षण के नाम पर महिलाओं को लुभाने की राजनीति शुरू कर दी है। प. बंगाल और तमिलनाडु के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने इसे मुख्य चुनावी मुद्दा बनाकर प्रचारित किया है। पंजाब भी उसी क्रम में शामिल है। भाजपा महिलाओं को आगे करके आक्रामक राजनीति शुरू कर दी है। ऐसे समय पर लोटस अभियान को संचालित करना अगली चुनावी रणनीति का हिस्सा है। विश्लेषकों का मानना है, सांसदों के इस्तीफे और महिला आरक्षण जैसे मुद्दों को जोड़कर भाजपा 2027 में होने वाले विधानसभा चुनाव एवं 2029 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में भाजपा जुट गई है। विपक्षी दलों और इंडिया अलायंस में शामिल विपक्षी दलों के बढ़ते आक्रामक रुख के बीच भाजपा अपने प्रभुत्व को बनाए रखने, विपक्षी दलों में फूट डालने के लिए हर संभव रणनीति को अपना रही है। साल 2027 में सात राज्यों के विधानसभा चुनाव हैं। 2029 के लोकसभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए पार्टी अभी से संगठनात्मक और राजनीतिक स्तर पर अपनी पकड़ मजबूत करने लोटस अभियान एवं जांच एजेंसियों के माध्यम से खुद को उन राज्यों में मजबूत करना चाहती है, जहां उसका प्रभाव ना के बराबर है। एक बड़ा प्रश्न है कि क्या इस तरह की रणनीतियां लोकतांत्रिक मूल्यों और संस्थाओं की निष्पक्षता और राजनीति में विपरीत असर नहीं डालती हैं? विपक्ष आरोप लगाता रहा है, संवैधानिक संस्थाएं सरकार के प्रभाव में काम कर रही हैं। भाजपा इन आरोपों को खारिज करती है। लोटस अभियान के कारण भाजपा की साख में निरंतर गिरावट देखने को मिल रही है। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में भारत की राजनीति में लोटस अभियान अब लगातार चलने वाली प्रक्रिया बन चुकी है। पिछले 12 वर्षों में जितने भी दल बदल हुए हैं, उसमें दल-बदल करने वाले सभी राजनैतिक दलों के नेता भाजपा में गए हैं। लोटस अभियान की तहत से कई सरकारें गिराई गई हैं। पिछले 15 वर्षों में जिस बड़े पैमाने पर दल-बदल का लाभ भाजपा को मिला है, इसके पहले यह स्थिति भारतीय राजनीति में कभी देखने को नहीं मिली थी। पिछले 12 वर्षों में एक चुनाव खत्म होते ही भाजपा अगले चुनाव की तैयारी शुरू कर देती है। भारतीय जनता पार्टी 2047 तक सत्ता में बने रहने की रणनीति पर काम कर रही है। नारी वंदन अधिनियम को इसी से जोड़कर देखा जा रहा है। जिन राज्यों में भाजपा का कोई प्रभाव नहीं है। उन राज्यों में येन-केन-प्रकारेण भाजपा 2029 के पहले सत्ता में आना चाहती है। लोकसभा चुनाव में 400 सीट लाने का जो लक्ष्य भाजपा 2024 के लोकसभा चुनाव में पूरा नहीं कर पाई वह 2029 में भाजपा पूरा करना चाहती है। विपक्ष और भाजपा इस समय बहुत आक्रामक है। भाजपा के लिए अभी जो अनुकूलता है। सारी संवैधानिक संस्थाओं में भाजपा और सरकार की मजबूत पकड़ है। इससे ज्यादा अनुकूलता भविष्य में नहीं मिल सकती है। इस अवसर का लाभ भाजपा हर हालत में उठाना चाहती है। सत्ता पक्ष और विपक्ष के पास अपने अस्तित्व को बचाए रखने के लिये करो या मरो के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा है। जिसके कारण भारत की राजनीति महाभारत के युद्ध की तरह हो गई है। जिसमें योद्धाओं का एक ही लक्ष्य है। किसी भी तरह जीत हासिल करो। प्रेम और युद्ध में सब जायज है। जो जीतेगा वही सिकंदर बनेगा। ईएमएस / 26 अप्रैल 26